जीवन व समाज की विद्रुपताओं, विडंबनाओं और विरोधाभासों पर तीखी नजर । यही तीखी नजर हास्य-व्यंग्य रचनाओं के रूप में परिणत हो जाती है । यथा नाम तथा काम की कोशिश की गई है । ये रचनाएं गुदगुदाएंगी भी और मर्म पर चोट कर बहुत कुछ सोचने के लिए विवश भी करेंगी ।

नेता लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
नेता लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

गुरुवार, 16 फ़रवरी 2017

काम बोलता है...

                              
    पिछली बार भइया जी जब सत्ता में आए थे, तो अपने सारे नेताओं को निर्देश निर्गत किया था कि वे प्रत्येक कम से कम एक महंगी गाड़ी अवश्य ही हस्तगत कर लें । पूछने पर बताया था कि ऐसा दो कारणों से नितांत आवश्यक था । एक, नेता से लेकर आम जनता तक यह संदेश जाए कि सत्ता कोई सस्ती आइटम गर्ल नहीं है, जिसे कोई भी नचा ले । दो, विकास को रफ्तार दिया जा सके । गाड़ियाँ और गाड़ियों में नेता विकास के ज्वलंत उदाहरण हैं । इस बार उनका सपना है कि विकास को चौगुनी मात्रा और चौगुनी रफ्तार से जनता तक लेकर जाया जाए । इसके लिए जरूरी है कि कम से कम चार महंगी नई गाड़ियाँ एक नेता को प्राप्त हों । विकास जब नंगी आँखों से दिखाई देता है, तभी जनता यकीन करती है ।
    भइया जी का दावा है कि उन्होंने काम इतना किया है कि गणेश जी की कलम भी लिखते-लिखते थक जाए । काम बोले तो...विकास, विकास और केवल विकास । जिधर देखिए, उधर विकास की नदी प्रवाहित हो रही है । यह अलग बात है कि प्रकृति प्रदत्त नदियाँ या तो सूख रही हैं, या विकास की गंदगी से जूझ रही हैं, या जिनके प्रवाह येन-केन-प्रकारेण बाधित हो रहे हैं ।
    हम भी भइया जी के काम को खुर्दबीन से खोजते हुए उनके शानदार बंगले तक पहुँच गए । हमें देखते ही वह खदबदा उठे । कैमरे की नजर अपने ऊपर महसूस करते ही बोले, ‘सुना है कि हमारे सारे विरोधी बह गए हमारे विकास की दरियाओं में?’
    ‘कौन सी विकास की बात करते हैं आप?’ हमने पूछा, ‘हम तो ढूँढ़ते आ गए आपके घर तक, पर हमें तो कुछ नहीं दिखा ।’
    ‘कमाल करते हैं आप भी । चारों तरफ हमारा ही काम बिखरा पड़ा है । क्या उन कामों ने आपसे कुछ नहीं कहा?’ वह थोड़ा आक्रामक होते हुए बोले ।
    ‘रास्ते में तो हमें कोई काम नहीं मिला । इसीलिए हम जानना चाहते हैं कि आपने कौन-कौन सा काम किया?’ हमने माइक उनके मुँह के आगे कर दिया ।
    ‘जब काम हजार हों, तब उन्हें गिनवाने की गलती कोई समझदार इंसान कर सकता है भला? न हम उतना बोल पाएंगे, न आप उतना सुन पाएंगे ।’
    ‘चलिए, मान लेता हूँ कि यह संभव नहीं है । पर दस काम तो आप निश्चय ही गिनवा देंगे ।’ मैंने उनके आगे हथियार...मतलब माइक डालते हुए कहा ।
    ‘अपने मुख मियाँ मिठ्ठू बनना हम नहीं चाहते ।’ वह आत्म-मुग्ध होते हुए बोले, ‘हम अपने मुख से अपने काम का बखान क्यों करें, जब हमारा काम खुद बोल रहा हो । आप आँख बंद करके देखिए, हमारा काम हर तरफ दिखाई दे रहा है । कान बंद करके सुनिए, उसी की गूँज है चारों ओर ।’
    आँख बंद करते ही हमें अँधेरे के सिवा कुछ भी दिखाई नहीं दिया । अँधेरे से डर या डिस्टर्ब होकर हमने आँखें खोल दीं और पुनः काम पर चले आए । अपने काम को बढ़ाते हुए उनके काम के बारे में पूछा, ‘आप बताना नहीं चाहते, तो न सही । कम से कम दो काम तो गिनवा दीजिए, जो आपकी नजर में बहुत ऊँचा स्थान रखते हों ।’
    ‘देखिए, मेरे काम मेरी संतानों के समान हैं । कोई भी आदमी केवल दो की गिनती करवाकर बाकी को नालायक या नाजायज नहीं कह सकता । उसके लिए तो उसकी सभी संतान समान महत्व के होते हैं । अतः हम अपने दो कामों को गिनवाने की भूल कतई नहीं कर सकते । वैसे भी काम करने वाला इन गिनतियों के फेर में नहीं पड़ता ।’
    हम उनकी भावनाओं की कद्र करते हुए उनके द्वारा किए गए केवल दो कामों से पुनः पीछे हट गए और उन्हें उनकी महानता का लाभ देते हुए केवल एक पर आ टिके । मुख पर मुस्कान लाकर हमने पूछा, ‘कोई बात नहीं । आप केवल एक काम का नाम बता दीजिए, जो आम जनता की नजरों में भी काम ही हो ।’
    एक सुनते ही वह अनेक हो गए । वह इतनी जोर से हम पर चिल्लाए कि उनके  ही आदमी चारों तरफ । मैं एक, वह अनेक । हथियार ही हथियार । उनके हाथों में काम, मेरे मुँह में राम । वह मेरी आँखों में आँखें डालते हुए बोले, ‘एक...केवल एक काम पूछकर हमारा अपमान करने की तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई? क्या तुम्हें अभी भी सुनाई नहीं दे रही हमारे कामों की आवाज?’
    शायद पहली बार मुझे उनके बोलते काम दिखाई दिए थे । मैंने उनसे झूठ नहीं कहा कि उनके काम सचमुच बोलते हैं । मेरी आँखों में आगे के कामों के चित्र तथा कानों में उनकी आवाजें सिमटने लगे थे । शक काफूर हो चला था । अब उसका स्थान यकीन लेता गया था...चौगुनी रफ्तार से ।

मंगलवार, 10 जनवरी 2017

नेता तो सेफ हैं...

                
    चाय की अड़ी पर इस समय भी तीन लोग अड़े हुए थे । सामने की सड़क लगभग वीरान हो चुकी थी । कभी-कभार इक्के-दुक्के लोग ही आते-जाते दिख जाते थे । कोयले की अतिरिक्त खुराक न मिलने के कारण अंगीठी अब ठंडी हो चली थी, पर शीशे के गिलासों में उड़ेली गई चाय पूरी तरह गरम थी । जो बात बटेसर के पेट में पिछले कई दिनों से खदबदा रही थी, गरम चाय पड़ते ही वह भाप बन गई और मुँह से उसके निकलने लगी, ‘इ जउन नोटबंदी का फइसला रहा, उ एकदम्मे फुस्स साबित हुआ कउनो फुसफुसिया पटाखा के माफिक ।...है कि ना?’
    ‘इ बटेसरा तो हरदम्मे फुसफुसाय रहता है ।’ लुटई पहलवान से रहा न गया । चाय का एक घूँट भरते हुए वह बोले, ‘एकरा कान पर बम्मो फटे, तो फुस्से सुनाई देता है । अरे उ कश्मीर में पत्थर चलना बंद हो गया और इधर नक्सली भाई लोग गोली चलाना छोड़कर नोट चलाने में लग गए । इ कउनो कम धमाका है कि इन लोगन की बोलतिए बंद हो गया ।’
    ‘एक और बात हुई है ।’ पंडित तोताराम भी उछल पड़े बहस में । चाय का आखिरी घूँट सुड़कते हुए बोले, ‘दाग धुल गया है नेताओं का ।’
    ‘का बात बोले पंडिज्जी...नोटबंदी कउनो बैतरणी रही कि पाप धुल गया ।’ इस बार दुकान स्वामी चनेसर की आवाज आई । वह सामान को समेटने में लगा हुआ था ।’
    ‘नोटबंदी का इतना बड़ा झमेला हुआ, कोई नेता पकड़ा गया क्या? जो भी पकड़े गए, वे नेता नहीं थे । तुम्हीं बताओ बटेसर, इसका क्या मतलब निकलता है?’
    ‘मतलब तो जरूरे कछु निकलना चाहिए ।’ बटेसर अपना कान खुजाते हुए बोला, ‘आप ही काहे नाहीं बताय देते पंडिज्जी ।’
    ‘मतलब तो एकदम साफ है । नेताओं के पास दो नंबर की कोई कमाई नहीं । होती तो पकड़े नहीं जाते? लोगों ने नाहक ही उन्हें दागदार मान रखा है ।’
    ‘ना-ना, इ बात तो कउनो मूरख भी नहीं मानेगा ।’ लुटई पहलवान खम ठोंकते हुए बोले, ‘नेता लोग बहुते पहुँचे हुए जीव हैं । बटेसरा के इ बात तो माननी पड़ेगी कि इन लोगन ने नोटबंदी को एकदम्मे फुस्स कर दिया ।’
    ‘पहलवान की बात को मानना मेरे लिए संभव नहीं है, क्योंकि नेताओं की बिरादरी कितनी भी चतुर क्यों न हो, सौ-पचास नेता तो जरूर लपेटे में आ जाते । का कहते हो बटेसर?’ पंडित जी ने अपने पक्ष को मजबूत करने के लिए बटेसर को निहारा ।
    ‘बटेसरा से का पूछते हैं? हम जवाब देते हैं आपको ।’ लुटई पहलवान लगभग तैयार बैठे थे जवाब देने के लिए । वह बोले, ‘आमे आदमी पकड़ में आता है । जउन पकड़ में ना आए, नेता वही होता है । आपने इन्हें आम आदमी मानने की गलती कर दी ।’
    ‘फिर भी क्या आप लोगों को अजीब नहीं लगता, जो लुटई पहलवान कहे जा रहे हैं? अगर नेता काला-काला कर रहे होते, तो इस धुलाई अभियान में कोई-न-कोई दाग तो अवश्य छोड़ जाते । मगर ऐसा हुआ क्या? इसलिए मैं नहीं मानता कि जहाँ नेता होता है, वहाँ दाग भी होता है । कम से कम नोटबंदी ने इस झूठे आरोप को सदा के लिए नकार दिया है । अब निश्चिंत होकर कहा जा सकता है कि यह देश नेताओं के हाथ में सुरक्षित है ।’
    पंडित जी के चेहरे को देखकर लुटई पहलवान को ऐसा लगा, जैसे वे अपने ही तर्क पर मुग्ध हो उठे हों । वह भी कुछ कम न थे । नहले पर दहला मारते हुए बोले, ‘हमारी समझ से तो नोटबंदी का सबक ये है कि देश और उसकी व्यवस्था नेताओं के हाथों सुरक्षित हो या न हो, किन्तु नेता देश और उसकी व्यवस्था के हाथों अवश्य सुरक्षित हैं ।’
    ‘का बात कहा पहलवान ! आपने तो पंडिज्जी का मुँहे बंद कर दिया ।’ इतना कहते ही चनेसर अपनी दुकान को बंद करने लगा था ।

शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2016

सेफ्टी-जूते और स्टार्ट-अप

                   

   शाम को पार्क में टहलते हुए शुक्ला जी मिल गए । आज रोज की तरह उनकी चाल में वह तेजी नहीं थी । सामना होते ही मैंने पूछा, ‘क्या बात है मान्यवर, आप तो जैसे पैसेन्जर ट्रेन हो लिए हैं आज?’
   उन्होंने मुझे ध्यान से देखते हुए कहा, ‘कोई बात नहीं है बन्धु । बस यूँ ही थोड़ा ध्यान भटक गया था ।’
   ‘कोई बात तो जरूर है, वरना आपकी ट्रेन तो किसी भी हाल्ट को धकेलते हुए आगे निकल जाती है ।’ मैंने बात को निकलवाने की एक और कोशिश की ।
   ‘बात तो ठीक है आपकी ।’ वह स्वीकार करते हुए बोले, ‘एक चीज है, जो मुझे चिंतित किए जा रही है ।’
   ‘ऐसा क्या?’ मैंने उनकी चिंता के साथ अपनी चिंता को जोड़ते हुए कहा, ‘क्या कोई पारिवारिक समस्या आन खड़ी हुई है?’
   ‘अरे नहीं-नहीं । मैं तो युवाओं की बात सोच रहा था ।’ उन्होंने अपने मन को थोड़ा खोलते हुए कहा ।
   ‘क्यों, युवाओं को क्या हो गया है भला ! भले-चंगे तो दिखते हैं मुझे ।’ मैंने अपने अनुभव को साझा करते हुए कहा ।
   ‘भले-चंगे दिखते जरूर हैं, पर उनकी अपनी चिंताएँ भी हैं । युवा चिंताग्रस्त रहें, यह देश के लिए चिंतित करने वाली बात है । है कि नहीं?’ कहते हुए उन्होंने अपनी नजरें मेरे चेहरे पर गड़ा दीं ।
   ‘बेशक, किन्तु उनकी चिंता है क्या?’
   ‘रोजगार की चिंता । चलिए, पहले आराम से किसी बेंच पर बैठते हैं, फिर इस पर सोच-विचार करते हैं ।’ कहते हुए वह एक बेंच की ओर बढ़ गए । मैं भी उनके पीछे-पीछे हो लिया ।
   ‘हाँ, रोजगार की चिंता तो है ही ।’ बेंच पर बैठते हुए मैंने बात को आगे बढ़ाई ।
   ‘सिर्फ रोजगार की ही चिंता नहीं है । चिंता यह भी है कि कौन सा उद्योग-धंधा किया जाए ।’
   अब जाके बात पूरी तरह समझ में आई थी मेरे । मैंने अपनी चिंता रखते हुए कहा, ‘पर हम लोग क्या कर सकते हैं । इस पर तो सरकार को सोचना चाहिए ।’
   ‘सरकार तो सोच ही रही है, बल्कि यूँ कहें कि उसने तो सोच भी लिया है ।’ वह तनिक आश्वस्त होते हुए बोले, ‘स्टार्ट-अप कार्यक्रम आखिर उसी ने तो शुरु किया है । इसके बावजूद युवाओं के सामने समस्या यह है कि वे कौन सा उद्योग शुरु करें...कौन सी ऐसी चीज बनाएँ, जिसकी देश में अच्छी डिमांड हो या निकट भविष्य में हो जाए ।’
   ‘यह तो सचमुच सोचने वाली बात है ।’ मैंने अपने चेहरे पर गम्भीरता के कुछ बादलों को जमाते हुए कहा ।
   ‘पर मैंने तो सोच भी लिया है । आज नेताओं को लेकर जिस तरह घृणा और गुस्सा बढ़ता जा रहा है, उसे ध्यान में रखते हुए कुछ चीजों की डिमांड भविष्य में खूब बढ़ने वाली है ।’
   ‘मैं कुछ समझा नहीं । आप बात को स्पष्ट तो कीजिए ।’
   ‘वही तो बता रहा हूँ । भविष्य में स्याही और जूते की डिमांड जबर्दस्त रूप से बढ़ने वाली है ।’ उन्होंने अपनी बात पर जोर देते हुए कहा ।
   ‘मगर स्याही और जूते ही क्यों?’ ‘वो इसलिए कि इनसे दोहरा लाभ है । नेताओं पर स्याही और जूते फेंक देने मात्र से फेंकने वाले का आक्रोश पिघल जाता है । वह चोट पहुँचाने के लिए ऐसा नहीं करता, बल्कि पोतना और उछालना ही उसकी नीयत होती है । लेकिन दिक्कत यह है कि आज न तो वैसी स्याही है और न ही जूते ।’
   ‘क्यों, दोनों तो मौजूद हैं बाजार में ।’ मैंने उन्हें याद दिलाने की कोशिश की ।
   ‘मौजूद हैं, मगर उद्देश्य की समुचित पूर्ति नहीं करते । अब बॉल-प्वाइंट पेन का जमाना है । उसकी स्याही निकालकर पोतने में खतरा यह है कि वह जितनी नेता को पोतती है, उससे कहीं अधिक पोतने वाले को पोत डालती है । इसलिए इस काम को अंजाम देने के लिए ‘सेफ्टी स्याही’ की जरूरत है ।’
   ‘चलिए मान लिया, पर जूतों की क्या कमी है? एक खोजिए, दस मिलते हैं ।’
   ‘बेशक मिलते हैं, पर वे उछलने के बाद हिंसा के दूत बन जाते हैं । ऊपर से उनकी बनावट ऐसी है कि उछलते हैं दिल्ली के लिए, किन्तु हवा के प्रतिरोध के चलते लक्ष्य-संधान करते हैं मुम्बई में । जूते ऐसे होने चाहिए, जो सटीक लक्ष्य-संधान करें । इसलिए ‘सेफ्टी-शू’ का निर्माण एक चोखा धंधा है आने वाले समय में ।’

   ‘सचमुच, काफी चिंतन किया है आपने इस मसले पर । युवाओं को निश्चय ही इस पर विचार करना चाहिए । आखिर उनके भविष्य का सवाल जो ठहरा ।’ कहते हुए मैं बेंच से उठ खड़ा हुआ । वह भी तेज गति से मेरे पीछे लपके । अब हम दोनों समान चाल से पार्क की दूसरी ओर बढ़ रहे थे ।

शुक्रवार, 2 सितंबर 2016

सोने-सा दिल है आपका

               
   दरबार-ए-आम आज बतकहियों, कहकहों, हँसी-ठहाकों से गुंजायमान है । हर वर्ग की जनता उपस्थित है । जिसे होना चाहिए, वह तो है ही; जिसका होना जरूरी नहीं, वह भी मौजूद है । सभी के दिलों में जोश व उत्साह की लहरें हिलोरें मार रही हैं, वहीं दरबार-ए-आम की हवा में गर्व की खुश्बू फैली हुई है । सभी को फख्र है अपने खिलाड़ियों पर...उन खिलाड़ियों पर, जो अभी ताजा-ताजा गोलंपिक से लौटे हैं । वे खिलाड़ी ही इस वक्त दरबार-ए-आम के मंच पर अपने लिए निर्धारित सीटों पर बैठे हुए हैं । कोई फर्जीवाड़ा न हो, इसके लिए उन्हीं खिलाड़ियों को मंच पर चढ़ने दिया गया है, जिनके हाथ में सबूत के तौर पर गोलंपिक के टिकट मौजूद हैं । मंच पर इन खिलाड़ियों के अलावा मंत्रीगण, नेता, अधिकारी, खेल-संघों के पदाधिकारी, प्रशिक्षक और वे सभी लोग उपस्थित हैं, जिनकी बदौलत खिलाड़ियों ने हार को चूमा और उनकी इस उपलब्धि पर पूरा वन-राज्य झूमा । गौरव के उन क्षणों को पुनः जीना किसी भी जीवंत राज्य के लिए एक अनिवार्य तत्व होता है । उस क्षण को पुनः महसूस करने तथा हारे हुए खिलाड़ियों को प्रोत्साहित करने के लिए ही यह आयोजन किया गया है ।
   सभी आने के इच्छुक आ चुके हैं तथा आवश्यक तैयारिय़ां भी मुकम्मल हो चुकी हैं । अब बस महाराज सियार की कमी है । अनगिनत निगाहें उन्हीं की राह पर लगी हुई हैं । तभी खबरी खरगोश दौड़ते हुए दरबार-ए-आम में प्रवेश करता है और महाराज के आने की इत्तला देता है । तत्काल सभी सावधान की मुद्रा में आ जाते हैं । उधर प्रधानमंत्री व अन्य मंत्रीगण अगवानी के लिए विशाल दरवाजे की तरफ बढ़ते हैं ।
   उपस्थित वन समुदाय पर सरसरी निगाह डालकर महाराज सियार मंच की ओर प्रस्थान करते हैं । बीच-बीच में हाथ हिला-हिलाकर वह अभिवादन का जवाब भी देते जाते हैं । उपस्थित लोग महाराज की इस अदा पर झूम-झूम उठते हैं । अगले कुछ सेकेंडों के बाद महाराज मंच पर दिखाई देते हैं । परिचय प्राप्त करने और हाथ मिलाने के बाद वह अपने सिंहासन पर आसीन हो जाते हैं ।
   इधर नगाड़ा मंत्री तुरंत माइक को सम्भालते हुए कहना शुरु करते हैं, ‘महाराज की आज्ञा हो, तो खेल के लिए आयोजित इस जश्न का आगाज किया जाए । दीप के प्रज्ज्वलन के लिए हम हुजूर की कृपा के आकांक्षी हैं ।’
   महाराज धीरे-धीरे मंच के एक कोने की तरफ बढ़ते हैं । दीप-प्रज्ज्वलन में विशिष्ट लोग उनका साथ देते हैं । इसके बाद उन्हें दो शब्द कहने के लिए माइक पर आने की प्रार्थना की जाती है । वह हुंआ-हुंआ के दो शब्द निकालकर कहना शुरु करते हैं, ‘खुशी का मौका है और हमारे लिए तो यही बड़ी बात है कि हमारे खिलाड़ी बहादुरीपूर्वक हार गए । जीतो तो ऐसा न लगे कि जीत में कुछ कमी रह गई । हारो तो ऐसे हारो कि जीतने वाले को यह न लगे कि हराया, लेकिन मजा नहीं आया । जीतने वाला चैम्पियन होता है और हमारे लिए फख्र की बात है कि हमारे खिलाड़ी चैम्पियनों से हारे । आप लोगों की हार ही हमारे लिए जीत है । भगवान करे कि आप लोग यूँ ही हारते रहें और वन-राज्य का सिर ऊँचा बनाए रखें ।’
   महाराज के इतना कहते ही तालियों की गड़गड़ाहट से दरबार-ए-आम हिलने लगता है । तालियां इस बात पर और ज्यादा बजती हैं कि महाराज की महानता देखिए कि उन्होंने हार को भी किस खूबसूरती से जीत करार दे दिया । उनकी खिंची लाइन सभी के लिए एक गाइड लाइन सी बन जाती है । अगले ही क्षण राजपुरोहित को दो शब्द कहने का मौका मिलता है । राजपुरोहित लंगूर अपनी माला को फेरते हुए खिखियाते हैं और फिर गम्भीर स्वर में अपनी बात को आगे रखते हैं, ‘हमें खुशी है कि हमारे खिलाड़ी संतोष के साथ लौटे हैं । पदक-वदक, सोना-चाँदी-सब फीके हैं संतोष के सामने । सोना-चाँदी तो कभी भी आ जावे है, लेकिन संतोष बड़ी मुश्किल से आवे है । आपने सोना-चाँदी के पदक जीतने वालों को छोटा साबित कर दिया है, क्योंकि आप लोगों के पास सबसे बड़ा पदक है-संतोष का पदक ।’
   एक बार फिर दरबार-ए-आम तालियों की गड़गड़ाहट का गवाह बनता है । अगले ही क्षण खेल मंत्री माइक को पकड़ बोलना शुरु करते हैं, ‘खिलाड़ियों, आपकी हार से सारा राज्य गौरवान्वित है । हारना और उसे बर्दाश्त करना सबके वश की बात नहीं होती । यह आपका संयम और संस्कार है । वास्तव में हारने वाला ही सच्चा चैम्पियन है । जब कोई हारने को तैयार होता है, तभी किसी की जीत पक्की होती है । हारना त्याग है । जीत में यह बात कहाँ !’
   अब गृहमंत्री की बारी आती है । वह खिलाड़ियों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए कहते हैं, ‘आप लोगों ने हारकर अच्छा ही किया । अगर जीत जाते, तो खेल-संघ बेवा हो जाते । सभी पदाधिकारी इसी बात के लिए लड़ मरते कि यह जो पदक आए हैं, यह केवल उन्हीं के परिश्रम के फल हैं ।’
   समापन के लिए खेल-संघ के एक पदाधिकारी माइक को लपकते हैं, ‘सज्जनों, खेल में हार-जीत महत्व नहीं रखता । महत्व रखता है केवल भाग लेना, इसीलिए हम अनासक्त भाव से भाग लेते हैं । हम भाग लेने के लिए ही वर्षों से जा रहे हैं । आगे भी पूरे गर्व तथा बहादुरी के साथ जाते रहेंगे ।’

   इसके बाद खिलाड़ियों को अपने-अपने हारने की उच्चता के अनुसार हार-रत्न, हार-भूषण एवं हार-श्री से सम्मानित किया जाता है । सम्मानित करने के बाद महाराज के आदेश पर दरबार-ए-आम में जश्न के जाम छलकने लगते हैं ।

शुक्रवार, 26 अगस्त 2016

बाढ़...फिर आना इस देश

                   
   साधो, वर्षा ऋतु आते ही हमारे यहाँ धर्म-कर्म कुछ ज्यादा ही बढ़ जाते हैं । आम जन-किसान पूजा-पाठ-हवन और यज्ञादि करने लगते हैं । प्रयोजन ऊपर वाले को रुष्ट होने से रोकना होता है, ताकि वह नीचे वालों की इच्छाओं को पुष्ट एवं संतुष्ट करता रहे । वर्षा की इतनी आपूर्ति वह अवश्य कर दे कि ‘भूखे भजन न होंहि गोपाला’ कहने की नौबत न आए । पेट भी भर जाए और भजन भी चलता रहे । उधर बड़े-बड़े अफसर और नेतागण बड़े-बड़े पंडितों के माध्यम से बड़े-बड़े यज्ञों के आयोजन करवाते हैं । उनका प्रयोजन कुछ हटके होता है । वर्षा हो तो इतनी हो कि चारों तरफ बाढ़ आ जाए और नहीं तो एकदम सूखा पड़ जाए । सूखे का सुख तो सूखा आने पर ही मिलता है । बाढ़ में जैसे पानी का बढ़ाव होता है, वैसे ही खुशनसीबों के घर में लक्ष्मी का पड़ाव होता है ।
   खुशनसीबी देखिए कि वर्षा ऋतु इस तरह आई है कि आमजन बाढ़ से बेहाल हैं और बहुत से जिम्मेदार लोग उनका हाल लेने के लिए बेहाल हैं । जहाँ दादुर मेघ-मल्हार की टर्र-पों में उलझे हुए हैं, वहाँ खुशनसीब मानव मन बाथ-रूम में सुलझे रूप में गा उठा है-आया सावन झूम के...भादो भी आना चूम के ।
   वैसे धुँआधार बारिश और बाढ़ के अनेकों फायदे हैं । बाढ़ जीव-जन्तुओं को यह सुनहरा मौका देती है कि वे अपने जीवन की एकरसता को छोड़कर कुछ दिन बहुरसता में व्यतीत कर सकें । कहाँ वे टेढ़े-मेढ़े बिल और घुटती साँसें और कहाँ पेड़ों-झाड़ियों का विराट विस्तार ! कुछ नसीब वाले जीव-जंतुओं को तो मानव घरों में भी प्रवेश करने का मौका मिल जाता है । पिकनिक का ऐसा महा-आयोजन वे भला किस हस्ती के बल पर कर सकते थे ! यह बाढ़ ही है, जो पेड़ों-झाड़ियों पर लटकाती, सावन-भादो के झूले झुलाती तथा मानव-घरों को बारीकी से निरखने का सुख प्रदान करती है ।
   आम जन बाढ़ के बड़प्पन को देख अपनी क्षुद्रता का अहसास नहीं करता । चारों तरफ जल प्रलय उसे उसकी निःसारता का बोध कराता है । भूख-प्यास की अनुभूति उसकी सहनशीलता को चट्टानी रूप प्रदान करती है । वह खुद को उन ऋषि-महर्षियों के समकक्ष पाता है, जो भूख-प्यास की पीड़ा को तज तपस्या में तल्लीन रहते हैं । आसमान से संभावित टपकने वाले खाने के पैकेटों के लिए टकटकी क्या किसी साधना से कम है? राहत के लिए जिम्मेदार लोगों के कोरे आश्वासन यही बयाँ करते हैं कि पूरा यह संसार असत्य है, तथा सत्य केवल ऊपर जाना है ।
   बाढ़ सबसे ज्यादा लाभ अपने को इज्जत से बुलाने वालों को देती है । निरीह आम जनों के हाथों में खाने के पैकेट के साथ सेल्फी का मौका खुशनसीब बन्दे को ही मिलता है । पूरा सोशल मीडिया उनकी महानता और उपकार के चर्चों से ऐंठने लगता है । कागजों पर राहत के घोड़े रेस लगाते हैं और धरातल पर आम जन भूख को फेस करते हैं । यह सत्य जितना बड़ा होता है, खुशनसीबों के मन की राहत भी उतनी ही बड़ी होती है । दीपावली के बहुत पहले ही लक्ष्मी घर में आ बिराजती हैं । वैसे भी लक्ष्मी पहले ही घर में चली आएं, तभी दिवाली की पूजा सार्थक बनती है । बाढ़ में दिवाली...यह चमत्कार हमारे यहाँ ही सम्भव है । इस चमत्कार को प्रणाम करते हुए किसी भी अन्य का यह अधिकार नहीं बनता कि वह बाढ़ या खुशनसीब लोगों को गालियाँ दे, चोर और भ्रष्ट कहे ।

   ढेर सारे लाभों को देखते हुए देश-हित में हमें बाढ़ की भयावहता को बढ़ाने के प्रयास में जुट जाना चाहिए, क्योंकि बाढ़ जितनी विकराल होगी, उससे मिलने वाले सुख उतने ही कमाल के होंगे । आइए, देश के सिर पर सवार बाढ़ से हाथ जोड़कर प्रार्थना करते हैं ।

मंगलवार, 23 अगस्त 2016

किस-किस को खुश करूँ रब्बा

               
   हमारे एक पड़ोसी की फितरत अजीब है । जिस काम का विरोध होता है, वही काम करने में उन्हें मजा आता है । लोगों ने उनके मोहल्ला विकास दल का सदस्य बनने का विरोध किया, वह बन गए । फिर उन्होंने उस दल का मुख्यमंत्री बनना चाहा । विरोध हुआ । कहा गया कि सबको साथ लेकर चलना उनके वश की बात नहीं । वह अड़ गए । विरोध उत्पन्न हुआ, तो सहानुभूति भी पैदा हुई । वह अच्छे मतों से मोहल्ला विकास दल का नेता अर्थात मुख्यमंत्री बन गए । उन्होंने बड़प्पन का परिचय दिया और सबको साथ लेकर चलने की घोषणा कर दी । अब सबका ध्यान होगा, सभी की इच्छाओं का सम्मान होगा ।
   लोगों ने कहा कि नया पद है, नया काम है, अतः शुरुआत प्रभु के स्मरण से होनी चाहिए । उनकी इच्छा का मान रखते हुए रामायण-पाठ का आयोजन कर दिया गया । उन्होंने स्वयं मोर्चा सम्भाला । वह यह काम किसी और पर नहीं छोड़ना चाहते थे । प्रभु का स्मरण हो और वह भी किसी और से करवाया जाए ! इस काम में काम का हस्तांतरण अर्थात आउटसोर्सिंग के पक्ष में वह कभी नहीं रहे । खुद ही पाठ कहना शुरू किया...हर संभव शुद्धि एवं शांति के साथ । दिन बीता, रात बीती । पाठ-समापन के साथ प्रसाद के वितरण की बेला, मगर लोगों का नहीं लगा मेला । एकाध को छोड़ कोई प्रसाद लेने नहीं आया ।
   ‘काहे भइया, प्रसाद लेने नहीं आए । कुछ गलत-वलत हो गया क्या?’ कोमल स्वर में पूछा था उन्होंने एक पड़ोसी से ।
   ‘जंगल में मोर नाचा, किसने देखा । बिना ध्वनि विस्तारक यंत्र के मंगल-गान हुआ, किसने सुना । जब कोई सुने, तब न आए प्रसाद लेने । किसी को लगा ही नहीं कि आपके यहाँ कुछ हुआ है ।’ यह सिर्फ पड़ोसी की बात नहीं थी, बल्कि पूरे मोहल्ले का प्रतिनिधि कथन था । प्रसाद तो पहुँच गया सभी के हाथों में, पर मन की बात नहीं पहुँची किसी के मन तक ।
   दो दिनों के बाद खूब धूम-धड़ाके के साथ फिर शुरू हुआ रामायण का पाठ । ढेर सारे ध्वनि विस्तारक यंत्रों ने ऐसा समाँ बाँधा कि कुछ लोग वाह-वाह, तो कुछ लोग आह-आह कर उठे । दिन को मजा, रात को सजा । रोगी-बुजुर्ग तो क्या, ढीठ नौजवान तक सो नहीं पाए । उधर रामायण में तीर सनन-सनन चल रहे थे और वीर कट-कट के गिर रहे थे, इधर अपने घरों में दुबकी ऑडियंस नींद-रक्षा के लिए त्राहि-त्राहि के विगुल बजाए जा रही थी । उधर कितने वीरों ने क्या किया, पता नहीं, पर इधर के कई वीर सुबह होने के पहले ही समर्पण कर चुके थे ।
   इधर सूरज फूटा, उधर लोगों का गुस्सा । ‘धर्म हो रहा है या अधर्म । कान में धर्म की बातें डाली जा रही हैं या खौलता शीशा । हद हो गई । जबर्दस्ती शरबत पिलाए जा रहे है । आपको धर्म-कर्म करना है, कीजिए, पर दूसरों का श्राद्ध-कर्म क्यों किए जाते हैं ।’ इस आतंक के बीच कुछेक मोहल्ले के वीर अभी भी डटे हुए थे । रात की गगन-भेदी आवाजें असफल रही थीं उनके मर्म को बेधने में । मुकाबले में मजा आया था । काश ! ऐसी चिंग्घाड़ू चीजें अक्सर होतीं, पर एक बात की शिकायत उनके पास भी थी । केवल पीली धोती धारण कर लेने से बंदा धर्मात्मा नहीं हो जाता । धर्म के लिए दिल खोलना पड़ता है ।
   ‘मैं समझा नहीं कि दिल को कैसे खोला जाता है ।’ उन्होंने पूछ ही लिया था आखिर एक मोहल्ला-वीर से ।
   ‘भई, आप जैसे कंजूस-मक्खीचूस यह बात नहीं समझ सकते ।’ उसने ताना मारते हुए कहा था, ‘धर्म-कर्म क्या अकेले करने की चीज है । पाठ वाचक दल को बुला लिया होता । शानदार ढंग से धर्म-कर्म होता । उन्हें रोजगार मिलता, वह भी तो धर्म ही होता । धर्म एक, रास्ते हजार ।’
   पड़ोसी ने सोचा कि हमें तो वही करना है, जो लोगों को अच्छा लगे । चलो, यह भी करके देखते हैं । अगला ही हफ्ता महा-आयोजन का गवाह बना । झाँझ-मजीरा और ढोलक की थाप पर वाचक दल ने सभी मोर्चे सम्भाल लिए । सोमरस और भांग के संयुक्त प्रभाव ने कहर बरपाना शुरु कर दिया । पूरा मोहल्ला साँसें रोके देख-सुन रहा था और इधर धर्म कुलांचे भरता हुआ आकाश के चरण चूम रहा था । पड़ोसी को प्रसन्नता थी कि यह आयोजन अवश्य ही सभी लोगों को आह्लादित करेगा ।
   पर अफसोस, बोलने वाले फिर निकल आए अगली भोर के साथ । ‘क्या ऐसे भी होता है प्रभु का स्मरण ...मानो प्रभु पर ही धावा बोल दिया हो । प्रभु को मंजूर हो तो करो, पर हमें तो जिंदा छोड़ दो ।’
   किसी और ने कहा, ‘राम-राम, कितना धिक्पुरुष है यह । प्रभु को भी पैसे का अहंकार दिखा रहा है । भाड़े की सेना से प्रभु को खरीदने चला है ।’

   पड़ोसी बेचारा मायूस था । लोगों ने जो कहा, उसने किया । इसके बावजूद आरोप, शिकायत, ताना-तंज...आखिर कैसे खुश किया जाए लोगों को अचानक उसे ऐसा आभास होने लगा, जैसे वह देश का ‘वर्तमान’ प्रधानमंत्री बन गया हो ।

मंगलवार, 5 जुलाई 2016

मैं हूँ आम सियार

                   
   जंतर-मंतर आश्चर्य से मुँह फाड़े खड़ा था । आँखें बेहिसाब चौड़ी होती गई थीं । जिधर से देखो, उधर से सियार चले आ रहे थे । धरती के अंदर और आसमान को छोड़कर दिशाओं का कोई कोना बाकी नहीं था । खेलम-खेल थी, मेलम-मेल थी, रेलम-पेल थी, जेलम-जेल थी, ठेलम-ठेल थी । हर कोई एक जगह पकड़ने को आतुर । जिन्हें जगह मिल गई, वे बैठ गए थे । जिन्हें नहीं मिली, वे खड़े-खड़े ही धरती को पैरों तले रौंद रहे थे ।
   सामने मंच पर बैठे आठ-दस नेता टाइप सियार अचानक खड़े हो गए थे । वे जोर-जोर से हाथ हिलाकर सबको शांत करने की कोशिश करने लगे । सबके शांत होते ही मुख्य नेता सियार उठ खड़ा हुआ । गले में अच्छी तरह मफलर लपेटने के बाद वह चार-पाँच बार खाँसा । गला साफ होने के बाद उसने सभी से सियार-वंदना की अपील की । पूरा जंतर-मंतर हुआँ-हुआँ की मधुर ध्वनि से गूँज उठा ।
   ‘भाइयों,’ वंदना खत्म होते ही नेता सियार बोला, ‘जीवन के हर क्षेत्र में, हर कार्य-व्यापार में, रोजमर्रा के हर व्यवहार में हमें दिक्कतों का सामना है । हर जगह वह कौन है, जिसके कारण हमें बार-बार दौड़ना पड़ता है, चप्पलों को घसीटना पड़ता है, फिर भी हाथ खाली-के-खाली रह जाते हैं ।’
   ‘कौन है वह?’ भीड़ में से आवाज आई ।
   ‘अच्छा प्रश्न किया किसी सियार दोस्त ने ।’ नेता सियार चहक उठा था । वह बोला, ‘भ्रष्टाचार है वह, जिससे हर सियार त्रस्त है ।’
   ‘उसे मार डालो...मार डालो ।’ भीड़ ऐसे हिलने लगी, जैसे कई शांत लहरें अचानक विक्षुब्ध हो उठी हों ।
   ‘मार तो डाला जाए, पर यह तो पता चले कि वह रहता कहाँ है ।’ एक दूसरा नेता उठकर बोला और भीड़ को शांत करने लगा । जैसे ट्यूब से हवा निकल गई हो, भीड़ फिर चिपक कर बैठ गई ।
   तभी मुख्य नेता सियार ऐलान करते हुए बोला, ‘ठीक एक पखवाड़े बाद अगली शाम को हम फिर यहीं मिलेंगे । निश्चय ही इस अवधि में भ्रष्टाचार का पता हमारी मुट्ठी में होगा ।’
   एक पखवाड़े बाद वाली शाम थी आज । सियारों की संख्या भी दोगुनी थी और उत्साह भी दोगुना । ‘क्या मिला ठिकाना? हमें भी तो पता चले कौन-सी है उसकी गुफा ।’ भीड़ से आवाज आई, शायद वह तनिक भी ताकने के मूड में नहीं थी ।
   ‘हाँ-हाँ, पता चल गया है ।’ मुख्य नेता सियार उठते हुए बोला, ‘वह सत्ता के गलियारे में रहता है । लकड़बग्घों और भेड़ियों के बंगले उसके आश्रय-स्थल हैं । उसे अक्सर खिड़कियों से झाँकते देखा जा सकता है ।’
   ‘तो देर किस बात की, उसे मार डालो...मार डालो ।’ एक हल्ला-सा उठा और भीड़ बेकाबू होने लगी ।
   ‘भाइयों-भाइयों,’ हाथ के इशारे से बैठने को कहता हुआ नेता बोला, ‘इतना आसान नहीं है उसे मारना । वह बड़े-बड़े लोगों के शरणागत है । उसे मारने के लिए  घमासान करना होगा और इस काम के लिए हमें चुनावी रण-क्षेत्र में उतरना होगा । सत्ता के गलियारों तक पहुँचना होगा । क्या आप सब चुनावी रण-क्षेत्र के लिए हमें योद्धा चुनने को तैयार हैं?’
   ‘हाँ-हाँ, आप लोग ही योद्धा होंगे ।’ भीड़ ने एक स्वर से हामी भरी थी ।
   मंच पर बैठे सारे नेता सियार चुनावी रण-क्षेत्र से होते हुए सत्ता के गलियारे में पहुँच गए । भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए ताकत की जरूरत होती है और ताकत इकट्ठा करने के लिए उन्होंने अपना-अपना वेतन कई-कई गुना बढ़ा लिया । अब टक्कर की लड़ाई थी । भ्रष्टाचार मजबूत था, तो ये भी कम मजबूत नहीं थे । ये रोज-रोज उसे आँखें दिखाने लगे । वह भी इन्हें घूरता रहा और इसी आँख-मिलाई में दो साल गुजर गए ।
   जंतर-मंतर एक बार फिर गुलजार हुआ । ‘भ्रष्टाचार का क्या हुआ’ जैसे प्रश्नों पर मुख्य नेता सियार गरजते हुए बोला, ‘भ्रष्टाचार बहुत ढीठ है दोस्तों, वह कई रूपों में मौजूद है, पर हम उसे छोड़ेंगे नहीं । हमने अंग्रेजों के डिवाइड एण्ड रूल की तरह एक पॉलिसी बनाई है-डिवाइड एण्ड किल । हम भ्रष्टाचार के कुछ रूपों को अपनी तरफ मिला लेंगे और उन्हें कमजोर करके मार डालेंगे । क्या इस पॉलिसी से सभी सियार सहमत हैं?’
   भीड़ ने सिर हिलाया । सहमति पाकर एक नेता सियार हाथ लहराते हुए बोला, ‘हम आम सियार थे, आम सियार हैं और सदा आम सियार बने रहेंगे ।’ नेताओं की ऐसी भावना सुनकर भीड़ गद्गद हो तालियाँ पीटने लगी ।

   जल्दी ही कुछ नेता सियारों के बंग्लों में भ्रष्टाचार दिखाई देने लगता है । आम सियार खुश हैं कि नेता सियारों के सिर पर अभी भी ‘मैं हूँ आम सियार’ की टोपी सजी हुई है ।
Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...

लोकप्रिय पोस्ट