जीवन व समाज की विद्रुपताओं, विडंबनाओं और विरोधाभासों पर तीखी नजर । यही तीखी नजर हास्य-व्यंग्य रचनाओं के रूप में परिणत हो जाती है । यथा नाम तथा काम की कोशिश की गई है । ये रचनाएं गुदगुदाएंगी भी और मर्म पर चोट कर बहुत कुछ सोचने के लिए विवश भी करेंगी ।

भ्रष्टाचार लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
भ्रष्टाचार लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 11 जून 2017

समाजवाद ने संन्यास ले लिया है

            


साभार - oneindia.com
   जो कभी अभूतपूर्व हुआ करते थे, वे अब भूतपूर्व हो चुके हैं । जिस समाजवादी स्टाइल में वे मोदक-मेवा के मनमोहक रसभोग उड़ाया करते थे, उस पर अब मुसीबतों की मार-ही-मार है । वे भी क्या दिन थे, जब समाजवाद की माला जपकर सब-कुछ को अपना बना लिया जाता था । समाजवाद ने बहुत कुछ दिया उन जैसे नेताओं को । मूँछ को समाजवादी घी लगाकर ऐंठते ही पहचान और मुस्कान के अनगिनत रास्ते खुल जाया करते थे । गुंडे, महागुंडे, परम गुंडे, चरम गुंडे, धरम गुंडे, बेशरम गुंडे, ज्ञानी गुंडे, अभिमानी गुंडे-सभी सम्मोहित होकर समाजवादी सैल्यूट ठोंकने लगते थे । पुलिस कहाँ जाने वाली थी ! उसके सामने बस दो ही विकल्प थे । या तो नेता गुंडों अथवा गुंडे नेताओं को सैल्यूट दो या फिर अपनी कनपटी पर उनके सैल्यूट की मार लो । एक चीज बहुत अच्छी हुआ करती थी । पुलिस के पास आराम था और गुंडों के पास काम । इस सैलूटा-सैलूटी के अलावा पुलिस आजाद थी सुखकारक समाजवादी नींद को उड़ाने के लिए ।
   इधर लालबत्ती की धमक और नेतागिरी की चमक चौंधियाती थी आम जन को, उधर उनके मन में समाजवाद जपना पराया माल अपना की प्यास उन्हें व्याकुल-पथ पर अग्रसर करती थी । लोग पीठ पीछे उन्हें ताने मारा करते थे । आम जन को अपने देश में यही एक मौलिक अधिकार हासिल है । ताने का उल्टा नेता ही होता है, इसीलिए वह तानों का बुरा नहीं मानता । यह ताने ही थे, जिनकी बदौलत वे नेता से घाघ नेता और इस तरह एक महान नेता बन सके ।
   महान नेता बनने के लिए कुछेक बेमिसाल गुणों का होना परम आवश्यक होता है । सबसे पहले तो उनके पास उच्च समाजवादी विचार थे । जिसका कोई नहीं होता, उसके समाजवादी होते हैं । यही समाजवादी विचारधारा उन्हें गुंडों का साथ देने और गुंडई करने के लिए उकसाती थी । पुलिस और गुंडों में समानता देख पाना केवल उनके ही नजरिए से सम्भव था । वैसे भी उच्च विचार ऐसे विभेदों को कहाँ मानता है ! पुलिस की तो कोई माई-बाप है, लेकिन गुंडे तो अनाथ हैं । एक अनाथ की पीठ पर अगर समाजवादी अपना हाथ न रखें, तो आप ही बताइए कि कौन रखेगा ।
   इसके साथ उनके पास चरित्र की महानता थी । कोई भी काम व्यक्तिगत स्वार्थ के अधीन होकर नहीं किया । बलात्कार हो या किसी की हत्या, लूट-खसोट हो या अपहरण-फिरौती-सब कुछ समाजवाद के लिए किया । यहाँ तक कि किन्हीं खास भैंसों को गुम कराना और उन्हें ढूँढने के लिए पुलिस को लगाने के पीछे भी एक समाजवादी मकसद ही था । बेटे को हीरो बनाना और बाप को जीरो बनाना भी समाजवादी हित के लिए किया गया । इस महान ऐतिहासिक घटना के दौरान उन्होंने भी अपने बाप को जमकर लानत-मलामत भेजा । गालियों का एक पूरा कंटेनर ही उस बाप के हवाले कर दिया ।
   लोग कहते हैं कि कानून और पुलिस के हाथ बहुत लम्बे होते हैं । पर समाजवाद का चमत्कार देखिए कि उसके सामने कानून बौना हो जाता है और पुलिस मौनी । ऐसे संकट की स्थिति में समाजवादी नेता आगे आता है और अपने हाथों को लम्बा करता है । इतना लम्बा करता है कि परती जमीन, ऊसर जमीन, उर्वर जमीन, रेल की जमीन, सरकार की जमीन, जलाशयों की जमीन, नदी-नालों की जमीन, बागों की जमीन, इधर की जमीन-उधर की जमीन-सब कुछ उसके हाथ की जद में आ जाते हैं । अपने अभूतपूर्व समय में उन्होंने भी जमकर अपने हाथों को लम्बा बनाया और कानून को हाथ लम्बा करने की अच्छी-खासी नसीहत दी ।
साभार - Puneet Agrawal
   उन दिनों का समय और आज का समय । आज घर में कदम रखते ही तूफान का सामना हो गया । पत्नी क्रोधायमान थी और प्रतिष्ठा की अग्नि में धू-धूकर जल रही थी । तूफान को थामने की गरज से उन्होंने पूछा, ‘अरे क्या हुआ भागवान, क्यों आसमान को हिलाने पर तुली हुई है?’
   ‘आज तो आसमान हिलकर रहेगा ।’ पत्नी ने चीखते हुए जवाब दिया, ‘सुना तुमने, पड़ोसियों की ऐसी मजाल हो गई कि हमारे पप्पू को पीट दिया । अभी निकलो घर से और उन नामुरादों पर ऐसा बान मारो कि...उनकी लात का जवाब अपने लात से दो ।’
   ‘नहीं कर सकता भागवान ।’ उन्होंने समाजवादी दर्द को पीने की कोशिश करते हुए कहा, ‘उस समय लातों की केवल आउटगोइंग हुआ करती थी, पर अब समय बदल गया है । आउटगोइंग भेजा, तो उधर से लातों की इनकमिंग हो जाएगी...वह भी फ्री में ।’ कहने के साथ ही उनका शरीर तो शरीर, रुह तक काँपने लगी थी ।
   ‘और हमारे भाई का क्या,’ पत्नी ने एक और गुस्से को आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘अपनी मेहनत को वह यूँ ही सस्ते में छोड़ दे? उन जवाहरबागों की जमीन कोई कैसे वापस ले सकता है? उसकी अब तक रक्षा करने वाली पुलिस कहाँ है आखिर?’
   एक और दर्द जाग उठा जैसे सीने में । बेवफा से क्या उम्मीद की जाए आखिर । बुरे वक्त में तो परछाईं भी साथ छोड़ जाती है । पुलिस काम पर लौट आई है । वह अब हमारी क्यों सुनेगी भला !
   पुलिस के काम पर लौटने का मतलब ही है कि समाजवाद ने संन्यास ले लिया है । अब उसके संन्यास को तोड़ने के लिए उसी आम जन से चिरौरी ही एकमात्र रास्ता है, जिससे उसके नाम पर छल किया गया ।

रविवार, 4 जून 2017

पप्पू भइया की जीत किधर है

चित्र साभार- Cosmo Times
   आज रोज जैसा नजारा नहीं है किले के बाहर । हमेशा मंथर गति से चलने वाला निकटतम आस-पास का परिवेश आज कुछ गतिमान है । न केवल कुछ ज्यादा लोग चले आए हैं, बल्कि अभी भी चले आ रहे हैं । दोपहर होते-होते अर्द्ध-निद्रा को प्राप्त हो जाने वाले टिकट-क्लर्क अभी भी मुस्तैदी से डटे हुए हैं और टिकट-वितरण कर रहे हैं । उधर गाइड अपनी-अपनी जानकारियों को सिरे से सँजो रहे हैं, ताकि बेहतर प्रस्तुति की जा सके । किला तो आँखों में है, लेकिन उसके इतिहास को कुछ ऐसे बताया जाए कि वह भी आँखों के प्रत्यक्ष सामने दिखाई दे । किले के अहाते से सटे दुकानदार अपनी पुरानी चीजों को नया बनाने के लिए उन्हें चमकाने की जुगत में लगे हुए हैं ।
   अचानक किले के बाहर कुछ झंडे दिखाई देने लगे थे । सच्चा, अच्छा और चमचा कार्यकर्ता वही होता है, जो अपने नेता की आहट को दूर से पहचान ले । नेता गुपचुप आए, पर ऐसे कार्यकर्ताओं के लिए तो सारे सूचना-उपग्रह एक साथ जाग उठते हैं । वातावरण में गर्मी पहले से विद्यमान थी और इनकी उपस्थिति ने उसे और बढ़ाना शुरु कर दिया था । पर्यटकों को अब भरोसा होने लगा था कि मजमा अच्छा जमेगा आज । तभी तीन-चार चमचमाती गाड़ियों की एक कतार किले के निकट सरकती दिखाई दी । अरे यह क्या, कभी खुद को अभूतपूर्व मानने वाले पप्पू भइया हैं यह तो ! चेहरे का नूर हो चुका है काफूर । रुतबा और शानो-शौकत भी उनके भूतपूर्व हो चुके हैं, ठीक उन्हीं की तरह । दो-चार सुरक्षा-गार्ड हैं साथ में । इसके अलावा पत्नी और बच्चे ।
   दो-चार खास आदमियों को अपने लेकर पप्पू भइया तेजी से किले के अंदर चले गए । उनके आने की सूचना पर किले का प्रशासन तो अलर्ट था ही, अब कुछ और अलर्ट हो गया । मैं भी चौकन्ना हो गया था । आखिर तो भइया अपनी पर आ ही गए । कभी जनता की नजरों से छिपाकर मौज करने वाले आज यूँ मस्ती के मूड में हैं । कुछ काम-धन्धा तो अब रहा नहीं, ऐसे में मौज-मस्ती ही बड़ा सहारा होती है । मैं लपका उनके पीछे । कैमरामैन मेरे पीछे । कुछ-एक फोटो उनके मिल जाए, तो मजा आ जाए । लोगों को चैनलों पर दिखाए जा रहे ऐसे फोटो बहुत पसंद आते हैं । एक गाइड के सपोर्ट से मैं सीधे पप्पू भइया तक जा पहुँचा । वह उस बड़े कमरे के एक कोने में कुछ ढूँढ रहे थे । जरूर किसी मस्ती की तलाश कर रहे होंगे-मैंने सोचा । फिर आगे बढ़कर पूछा, ‘कुछ खो गया लगता है आपका । मस्ती या किसी सुकून की तलाश तो...’
चित्र साभार- patrika.com
   मुझ पर नजर पड़ते ही पप्पू भइया ने अपने पलक-पाँवड़े बिछा दिए मेरी राहों में । कभी एक इंटरव्यू के लिए भाव खाने वाले आज मुझे टनों भाव दे रहे थे । समय सचमुच बहुत बलवान होता है । वह मेरे हाथ को अपने हाथों में लेते हुए बोले, ‘ठीक फरमाया आपने । परिवार के साथ मौज-मस्ती ट्रिप पर ही निकला हूँ, पर दिल में एक काँटा चुभा हुआ है । हम पहलवानों को शत्रुओं ने धूल चटा दी । इस दिल में उसी हार का काँटा है । आखिर वे जीत कैसे सकते हैं । हमारी जीत को उन लोगों ने छीन लिया है । हमें उसी जीत की तलाश है । जहाँ देखता हूँ, बस हार-ही-हार दिखती है । जीत कहीं दिखाई नहीं देती । जरूर शत्रुओं ने कहीं छिपा दिया है उसे ।’
   अब मुझे चौंकना और सतर्क होना ही चाहिए था । किले में तो लोग इतिहास को ढूँढने आते हैं । जीत भी तो इतिहास बन चुकी है पप्पू भइया के लिए ।...तो वे किसी सीक्रेट मिशन पर हैं । खुला खेल इलाहाबादी वाली बात नहीं है यहाँ पर । ‘क्या आप मेरी जीत को ढूँढने में मेरी मदद करेंगे?’ उनके स्वर में याचना का भाव था ।
   याचक को यूँ ही छोड़ देना शोभा नहीं देता । ‘क्यों नहीं, मगर उस जीत की कोई फोटो...’ मैंने उन्हें अपनी तरफ से राहत दान करते हुए कहा ।
   ‘अफसोस, वही नहीं है । वह मेरे सपने में कई बार आई थी, लेकिन तकनीकी गड़बड़ी के कारण उसका स्नैप-शॉट नहीं ले सका ।’ कहते-कहते उनका चेहरा मुरझा उठा था ।
   ‘तो अब आप उसे कहाँ खोजेंगे?’ मैंने उनकी भविष्य की योजनाओं में झाँकने की कोशिश करते हुए पूछा ।
चित्र साभार- economictimes.indiatimes.com
   ‘किलों के बाद राजमहलों और आलीशान बंगलों की बारी है । उसके बाद सभी गुप्त तहखानों-तिजोरियों को खंगालूँगा । हर बड़ी जगह पर मुझे दस्तक देना है ।’ उनके चेहरे से संकल्प के भाव बाहर आने को आतुर दिखे ।
   ‘पर श्रीमान, आप किसान के खेत-खलिहान, गरीब की झोपड़ी या किसी मेहनतकश मजदूर की रोटी-प्याज के बीच में उसे क्यों नहीं ढूँढते?’
   ‘हद करते हैं आप भी ।’ वह तनिक गुस्से में आते हुए बोले, ‘हमारी जीत की चोरी एक हाई-प्रोफाइल घटना है और आप उसे इन लो-प्रोफाइल जगहों पर...शत्रु इतना नासमझ भी नहीं है कि जीत को बिना सुरक्षा के छोड़ दे ।’
   ‘तो फिर एक जगह है मेरी निगाह में ।’ मैंने अपने दिमाग की नसों को संकुचित करते हुए कहा ।
   ‘हाँ, बताइए तो, इतनी देरी किस बात के लिए ।’ वह अधीरज हो उठे थे हमारी बात सुनते ही । वरना अभी पल भी कितना बीता था ।
   ‘स्विस बैंक या उसके जैसे दूसरे बैंक । उन सुरक्षित जगहों पर भी तलाश करनी चाहिए, जहाँ विजय माल्या या ललित मोदी जैसे लोग छिपे हुए हैं । वैसे अपने शत्रु देशों को भी निगाह में रखना चाहिए । आतंकवादियों के ठिकानों में भी ताक-झाँक उचित होगा ।’
   ‘ठीक कहा आपने । अब मुझे अपने परिवार के साथ विदेशी ट्रिप पर निकल जाना चाहिए । वहाँ के किलों को भी तो देखना है हमें ।’ और इतना कहते-कहते वे किसी जासूस की तरह अपने काम में लग गए थे । चलो अच्छा ही है । पाँच वर्ष का लम्बा वक्त काटने के लिए यह बहाना भी क्या बुरा है गालिब !

रविवार, 28 मई 2017

गरीब-गुरबा पर सीबीआई की रेड

                  

 
चित्र साभार- cariblah.wordpress.com
      अचानक जैसे ही टीवी चैनलों ने ब्रेकिंग न्यूज चलाना शुरू किया, मेरे कुछ पल के आराम को ब्रेक लग गया । ब्रेकिंग न्यूज आ रही थी कि चालू नेता के अलग-अलग ठिकानों पर सीबीआई की रेड हुई है । कई लोग यह समझने की भूल कर सकते हैं कि अगर नेता चालू है, तो यह तो होना ही था उसके साथ । मगर यह भूल स्वीकार नहीं । अरे भई, चाल-चरित्र से वह चालू है या नहीं, यह लेखा-जोखा तो उसके वोटर समझें । मैं तो इतना जानता हूँ कन्फर्म कि वह नाम से चालू है । वैसे भी अगर नाम से काम का गठजोड़ होता, तो कई दारोगा चोर नहीं बने होते और सिंकिया सिंह नामी पहलवान बन खम नहीं ठोंकते ।
      कैमरामैन को लेकर मैं तत्काल ही निकल पड़ा चालू नेता के आलीशान मकान की तरफ । नेताजी के चेहरे पर हवाइयाँ उड़ रही थीं, पर हमें देखते ही वह हवा-हवाई हो गई । गिरगिट की तरह जो रंग नहीं बदल सकता, वह चालू के स्तर का नेता भी नहीं बन सकता । यहाँ तो हमारा सामना चालू नेता से ही था । कछु सूँघ लिया है का कि चप्पल रगड़ते चले आए हमरे आवास पर? अरे, हमका भी तो बतलाइए ।’ हवाई के स्थान पर अब नरमाई आ गई थी चेहरे पर उनके । वह हमें इशारा करते हुए अपने शानदार कान्फ्रेंस हॉल की ओर बढ़ गए ।
   अंदर पहुँचकर एक कुर्सी पर बैठते ही मैंने पूछा, ‘क्या सचमुच आपको नहीं पता कि आपके गुप्त ठिकानों पर सीबीआई की रेड हुई है?’
   ‘हम कछु नहीं जानते ।’ उन्होंने अपना चेहरा दूसरी तरफ करते हुए कहा, हम तो आपके मुँह से सुन रहे हैं । मगर यह रेड हुई किस बात के लिए है?’
   ‘आपके हजारों करोड़ की बेनामी संपत्ति को लेकर यह सब किया गया है । आरोप है कि आपने अपना काला धन भी जमके सफेद किया है ।’
   ‘का, इतना सब हो गया हमरे साथ !’ वह आश्चर्य के लिए आँखें चौड़ी करते हुए चीखकर बोले, ‘और हमको अब खबर हो रही है । इ तो सरासर धोखा है हमरे साथ । पिछली सरकार तो कछु करने से पहले हमरी अनुमति लिया करती थी । इ लोग हमको बिना बताए कर दिए । सचमुच अहंकारी सरकार है यह ।’
   ‘आप अपनी बेनामी संपत्तियों के बारे में क्या कहना चाहेंगे?’ मैंने इस पर उनकी राय जानने की कोशिश की ।
   ‘इ तो सरासर साजिश है हमरे खिलाफ । हम फासीवादी ताकतों के खिलाफ बोलता हूँ, एही लिए इ साजिश रची गई है । सरकार हमरा मुँह बंद करना चाहती है ।’
   ‘आपका मतलब है कि सरकार साजिश करके आपको संपत्तिवान बनाना चाहती है । वास्तव में आपके पास कोई संपत्ति नहीं है ।’
   ‘हाँ एतना ही नहीं,’ उन्होंने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘इ गरीब-गुरबा के ऊपर हमला है । हम गरीब-गुरबा का नेता हूँ । हम पर हमला... मतलब गरीब-गुरबा पर हमला ।’
   ‘यहाँ तो सीधे-सीधे आपके ऊपर रेड पड़ी है । गरीब कहाँ से आ गया बीच में?’ मैंने उनकी बात काटने की कोशिश करते हुए कहा ।
   ‘आप तो जबरजोरी किए जा रहे हैं ।’ उनके चेहरे पर क्रोध के भाव थे । वह तमतमाते हुए बोले, ‘आप तो हमरे और गरीब-गुरबा के बीच में दरार डालना चाहते हैं, पर हम बता देना चाहता हूँ कि कोई भी सफल नहीं होगा । हम गरीब-गुरबा का नेता था, हूँ और हमेशा रहूँगा ।’
   ‘चलिए, किसी भी एक गरीब का नाम बताइए, जिसकी आपने सेवा की हो और वह उसके बाद से गरीब नहीं रहा हो ।’ शायद मेरे शब्दों से चुनौती के भाव उभर आए थे ।
   ‘क्या कहा आपने?...गरीब नहीं रहा ! यही तो मंशा है सरकार की । वह चाहती है कि गरीब नहीं रहे । वह गरीबों को मारकर हमको मारना चाहती है । पर हम चालू हूँ । जब तक समोसे में आलू रहेगा, भरोसे में तब तक ये चालू रहेगा ।’
   ‘आप गरीब-गरीब करते हैं, नसीब-नसीब की भी तो बात करिए । कहाँ उनका नसीब और कहाँ आपका । उनका भोजन तो जगजाहिर है, पर आपके छप्पन भोग...’
चित्र साभार- twitter.com
   ‘इ तो एकदम्मे पोपट वाली बात हुई । कौन बनाया पत्रकार आपको?’ कुछ पल रुककर फिर बोले, ‘गरीब-गुरबा जिस-जिस व्यंजन के लिए लार टपकाता है, हम उसी-उसी व्यंजन को खाता हूँ । इ सुनकर उ लोग संतोष प्राप्त करता है । आज नेता खा रहा है, कल उ लोगन के नसीब होगा ।’
   इतना कहते हुए वे उठकर अपनी गोशाला की ओर बढ़ गए । हम लोग भी उनके पीछे-पीछे । वह एक गाय की पूँछ पकड़ते हुए बोले, ‘आपको सबूत चाहिए ना । हम गोबर की सौगंध खाकर कहता हूँ कि हमरा कोई सम्पत्ति नहीं । हम का करूँगा सम्पत्ति बनाकर । गरीब-गुरबा ही हमरा सम्पत्ति है ।’
   ‘मगर आप साबित क्या करना चाहते हैं गाय और गोबर से? जरा खुलके बताइए प्लीज ।’
   ‘गाय-गोबर से गरीब का नजदीकी नाता है और हमरा तो आप इ सब देख ही रहे हैं ।’ घूमते हुए कैमरे की नजर गाय के ऊपर पड़ते ही वह आगे बोले, ‘जिस प्रकार कोई कम्पनी होलोग्राम चिपकाती है अपने असली माल पर, उसी तरह गोबर और इ सानी-पानी हमरा होलोग्राम है । हम एक बार फिर कहता हूँ कि सरकार ने गरीब-गुरबा पर हमला किया है ।’

   हम सरकार का पक्ष जानने और सबूत की पड़ताल के लिए सीबीआई के दफ्तर का रुख करते हैं ।

रविवार, 21 मई 2017

कोई लौटा दे बीते हुए दिन


चित्र साभार - cartoon baotinforum.com
   पहलू-दर-पहलू बदलने के बाद भी मुझे नींद नहीं आई थी । अंततः बिस्तर छोड़कर कमरे से बाहर निकल आया था । इधर मेरे कदम तेज हुए थे, उधर तेज हवा का झोंका आकर टकराया था मेरे बदन से । अगले ही पल मैं पार्क में था । नींद आँखों में नहीं थी, लेकिन उसका आलस-तंत्र बरकरार था अब तक । फूलों से टकराकर आती हवा ने इस तंत्र को पलक झपकते ध्वस्त कर दिया । मैं एक बेंच की ओर बढ़ा । यह क्या, बेंच पर कोई पहले से ही मौजूद था । वह एकदम निकट आने पर ही नजरों में समाने लायक था । ऐसा होने के पीछे उस रोशनी का कुसूर था, जो उस जगह पर नहीं पहुँच रही थी ।
   थोड़ा और निकट आया, तो आश्चर्य कम झटका ज्यादा लगा । वहाँ मौजूद प्राणी और कोई नहीं, छाया बहिनजी थीं । उनका दावा था कि ईश्वर ने किसी और को नहीं, बल्कि केवल उन्हें भेजा है अपने लोगों पर शासन करने के लिए । अतः यह लोगों का दायित्व है कि वह उन्हें ही वोट देकर सत्ता तक पहुँचने में उनकी मदद करे । वह साक्षात ईश्वर की छाया हैं, अतः कम से कम अपने राज्य में सत्ता का सुख लूटने का ठेका भगवान ने केवल उन्हें ही प्रदान कर रखा है ।
   एक आश्चर्य और हुआ । बहिनजी तो मौजूद थीं, किन्तु छाया नदारद थी उनकी । अनगिनत छायाओं के आवरण में रहने वाली के पास इस वक्त कोई छाया नहीं थी । मुझे समझ में नहीं आया कि लानत-मलामत इस रोशनी की हठधर्मिता को भेजूँ या वक्त के तमाशे को । वह मुझे देखकर थोड़ी भयभीत-सी हुईं । कारण उनको घेरे रहने वाला सुरक्षा-दस्ता वहाँ नहीं था और सामने एक आम आदमी खड़ा था । वह चिल्लातीं, इसके पहले ही मैं पीछे हटते हुए बोला, 'आप सुरक्षित हैं, क्योंकि एक आम आदमी आपके साथ है ।'
   ' क्या खाक साथ है ।' वह पहले से ही तैयार बैठी थीं शायद, इसीलिए यह सुनते ही उबल पड़ीं । चीखते हुए बोलीं, 'वह साथ होता, तो आज मैं इस एकान्त में पड़ी होती? आज तो बिस्तर में मेरी नींद भी मेरे साथ नहीं है ।'
   मेरी नजर उनके बदन पर लदे सोने और हीरे पर जा फँसी थी । एक नजर उनकी जूतियों से भी रू--रू होकर चली आई थी । मुझे एहसास हुआ कि सोने आदमी के 'सोने' की गारंटी नहीं होते, अन्यथा बहिनजी अपने आलीशान बंगले में जबर्दस्त मुलायम बिस्तर पर इस वक्त नींद के मजे लूट रही होतीं । मुझे यह देखकर भी दुख का एहसास हुआ कि बदन के हीरे तो जुगनुओं की तरह चमक रहे थे, किन्तु उनके चेहरे की चमक गायब थी ।
   'मैं कुछ समझा नहीं ।' वास्तव में उनके मन की बात को पकड़ नहीं पाया था मैं । अतः बेंच के एक तरफ बैठते हुए मैंने पूछा, 'आप कहना क्या चाहती हैं?'
   'पिछले हर चुनाव में मुझे हार का मुँह देखना पड़ रहा है । मैं कुछ भी करती हूँ, लेकिन हार मेरे ही गले में आकर गिरती है । ऐसा क्यों होता है?'
   हार भी तो आपको बहुत पसंद है । वह नोटों का हार...आप रंग में होती थीं, आम आदमी दंग होता था । यह मेरे मुँह से निकलते-निकलते रह गया । उनके सुनते ही आपे से बाहर होने के पूरे आसार थे । रात के इस सन्नाटे में मैं कोई खतरा मोल नहीं ले सकता था । बहिनजी के सामने तो दिन में भी खतरा है । मैंने उन्हें राहत देने की नीयत से कहा, 'हो सकता है विपक्षियों ने आपके लोगों को भरमा दिया हो या वे लोग वोट के समय जागते-जागते रह गए हों ।'
   'एकदम नहीं । मुझे लगता है कि जिस हद तक उन्हें मूर्ख बनाना चाहिए था, उस हद तक मैं नहीं बना पाई । उन्हें बनाने की कोशिशों में कुछ कमी रह गई ।' कहते-कहते उनके चेहरे पर अफसोस के भाव उभर आए थे । अंदर उनके मन में एक अज्ञात भय भी समा रहा था कि कहीं मूर्ख बनाने के दिन लदने तो शुरु नहीं हो गए !
   'लोकतंत्र में बनाना...' मैंने मूर्ख सा मुँह खोलते हुए पूछा ।
   'बनाना पड़ता है, तभी सारे आम अपनी मुट्ठी में होते हैं । सत्ता को आम आदमी यूँ ही नहीं देता ।'
   उनकी बात मुझे नागवार गुजरी थी, क्योंकि मैं भी एक आम आदमी हूँ । लोग झूठ तो नहीं बोलते कि आम आदमी समझदार होता है और वह मूर्ख कतई नहीं बनता कभी-चाहे वह खुद कोशिश करे या कोई और उसे बनाए ।
   'आज तो यह है कि सत्ता दूर-दूर जा रही है, तो कुछ और भी पीछे छूट रहा है ।' मुझे चुप देख उन्होंने खुद ही बात आगे बढ़ाई थी । कुछ पल रुक कर बोलीं, 'आज संगी-साथी भी मेरा साथ छोड़ चले हैं । जिन्होंने मेरे आशीर्वाद से सत्ता की मलाई जम कर खाई, अब वह भी मीडिया में आँखें तरेरने लगे हैं ।'
   'यही माया है बहिनजी । मैं तो कहता हूँ कि निकल जाइए इस माया के जाल से । माया खुद जीती है, पर औरों को ठीक से जीने नहीं देती ।'
   'आपके कहने का मतलब कि मैं संन्यास ले लूँ? अपनी आज तक की मेहनतों को यूँ ही समर्पण कर दूँ? छाया को उससे', हाथ ऊपर उठाकर, 'आदेश मिला है कि वह अपने लोगों पर शासन करे । छाया उस आदेश की अवमानना नहीं कर सकती ।'
   'तो फिर इतने सालों तक प्रतीक्षा...एकान्त-राग भी आपको संन्यास की ओर ले जाएगा । आपके छोड़ चले साथी आपको इस ओर धकेलें, आप खुद ही...'
   'मैं समझी नहीं आपका मतलब?'
   'सीधा सा है ।' मैंने जवाब दिया, ' आप अपने बंगले को 'माया-आश्रम' नाम दे दीजिए । शेष आपके चेले-चपाटी कर देंगे । यहाँ किसी को मूर्ख बनाना नहीं पड़ता । लोग खुद ही मूर्ख बने चले आते हैं । वहाँ तो आम आदमी शीश झुकाता था, यहाँ तो सत्ता वाले भी झुकते हैं । यहाँ की सत्ता अधिक बलवान है, परन्तु मौन रहकर काम करती है ।'

   बहिनजी असमंजस में दिखाई पड़ती हैं । हालांकि अब उन्हें एहसास होने लगा है कि पुराने दिन अब नहीं लौटने वाले । कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन की याचना करने से तो यही अच्छा है कि दूसरे विकल्प को चुन लिया जाए । कम से कम इज्जत तो बची रह जाएगी । वह मेरी पीठ पर हाथ रखती हैं और उठकर आगे बढ़ जाती हैं । मैं उधर उन्हें बढ़ते हुए देखता हूँ, इधर रात तेजी से आगे बढ़ती है ।        

मंगलवार, 16 मई 2017

नीले सियार का भ्रष्टाचार

  
   पत्रकार-वार्ता में इस वक्त जबर्दस्त भीड़ है । पत्रकारों की संख्या तो उंगलियों पर गिनने लायक है, किन्तु मंत्रियों-सभासदों की ढेर लगी हुई है । वही पत्रकार बुलाए गए हैं, जो प्रश्न पूछते समय दिमाग का इस्तेमाल ज्यादा न करते हों । गड़े मुर्दे उखाड़ने वाले पत्रकार तो कतई नहीं बुलाए गए हैं । वास्तव में महाराज और उनकी पार्टी का प्रचार-प्रसार करने वाले फ्रैंडली पत्रकारों को ही निमंत्रण दिया गया है । इसके बावजूद पत्रकारों का क्या भरोसा ! अगर वे मौखिक रूप से उखड़ या बिदक गए, तो उन्हें, जरूरत पड़ने पर, शारीरिक रूप से मर्यादा की परिभाषा को समझाने के लिए पर्याप्त लोगों का होना तो सदैव ही नियम के अनुकूल रहा है । ऐसे में लोग अगर अपने हों, तो भरोसे का बैरोमीटर ऊँचा से ऊँचा बना रहता है ।
   पत्रकारों का संयम अभी जवाब देने को तैयार नहीं हुआ है, इसलिए भी नीले सियार का आगमन अभी नहीं हो सका है । मंत्री इंतजार में हैं कि कब खदबदाहट शुरु हो । चावल जब पकता है, तभी इसमें मिठास आती है । वरना तो कच्चा-ही-कच्चा । स्वाद व सेहत को गच्चा नहीं दे सकता, कोई भी यूँ ।
   पानी पी-पीकर पत्रकार अब थकने लगे हैं । उबासियों के दौर चलना शुरु होते ही मंत्री सजग हो जाते हैं । एक मिस कॉल की देरी और नीले सियार मंच पर । उनके साथ उप महाराज भी हैं, किसी साए की तरह उनके पीछे-पीछे । माइक पहले उप महाराज ही सम्भालते हैं । उनकी आवाज गूँजती है । वह कहते हैं, ‘देखिए, महाराज की तबियत थोड़ी नासाज है । खाँसी को लगता है अब काशी भेजना ही पड़ेगा । अक्सर आ जाती है किसी पाकिस्तानी आतंकवादी की तरह । पत्रकार वार्ता के ऐन पहले ही उसने हमला बोल दिया । उसके हमले से निपटने में थोड़ा वक्त लग गया । क्षमा चाहेंगे, इसीलिए थोड़ा विलम्ब हो गया ।’
   कानाफूसी शुरु हो जाती है पत्रकारों के बीच । मन में शिकायत व कटुता की जगह प्रशंसा के भाव उभर आते हैं । नीले सियार के माइक पकड़ते ही खबरी खरगोश हाथ उठाता है, किन्तु उन्हें बोलता देख बैठ जाता है । वह कहते हैं, ‘आज इस पत्रकार वार्ता में हम चाहते हैं कि उन सभी आरोपों को उठाया जाए, जो लोगों के बीच कानाफूसियों की शक्ल में अक्सर दिखाई दे रही हैं । हमारे ऊपर लग रहे सभी आरोप मूर्खतापूर्ण हैं और आज हम इसे साबित कर देंगे । कृपया पूछने की शुरुआत की जाए ।’
   इशारा पाते ही खबरी खरगोश फिर खड़ा हो जाता है और पूछता है, ‘महाराज, आपके ऊपर लगा यह आरोप कितना सही है कि आप नंबर एक नौटंकीबाज हैं?’
   प्रश्न सुनकर नीले सियार के चेहरे पर हँसी-सी आती है । वह उसी तरह जवाब देते हैं,’ देखिए, जनता ने हमें जिताया है । हम महाराज उन्हीं की बदौलत हैं । कर्ज है उनका हमारे ऊपर...वोटों का कर्ज । इस कर्ज के बोझ को हम जनता को खुशहाल बनाकर ही उतार सकते हैं । नौटंकी देखने-दिखाने से उसे प्रसन्नता प्राप्त होती है, तनाव दूर होता है जीवन का । अतः नौटंकी दिखा-दिखाकर हम लगातार उसका मनोरंजन करते रहेंगे । जनता के हित के लिए हमें अपने ऊपर लगाया जा रहा यह आरोप स्वीकार है ।’
   दूसरा प्रश्न एक और पत्रकार खरगोश की तरफ से उछलता है, ‘आप लोगों के ऊपर यह भी आरोप है कि आप लोग कभी भी, कहीं भी, किसी पर भी थूक देते हैं और थूककर आगे निकल लेते हैं ।’
   ‘थूकना कोई शौक नहीं है हमारा ।’ नीले सियार गम्भीर स्वर में बोलते हैं, ‘हम थूककर लोगों को उनकी औकात दिखाना चाहते हैं । लोग हम पर थूकें, इससे पहले ही हम उन पर थूक देते हैं । अटैक इज द फर्स्ट डिफेंस...यू नो । किसी को भी थूकने का हम मौका देना नहीं चाहते । इसीलिए थूकने को हमने अपनी स्टेट पॉलिसी का हिस्सा बना रखा है ।’
   ‘आप लोगों के ऊपर यह भी आरोप है कि आप लोग भ्रष्टाचार में लिप्त हैं, जबकि ईमानदारी का नगाड़ा बजाकर ही आप लोग सत्ता में आए थे ।’ इस बार एक और कोने से प्रश्न उछला ।
   ‘समाज की धारणा है कि आम जन ही घूस देता है । खुशी से दे या नाखुशी से, पर देना उसे ही है । यही उसकी नियति है । हम इस नियति को बदलना चाहते हैं । हम आम जन के प्रतिनिधि हैं, इसलिए घूस लेने और भ्रष्ट आचरण करने की जिम्मेदारी हमारे कंधों पर ही आती है । जिसे आप भ्रष्ट आचरण कहते हैं, असल में वह हमारा सत्य आचरण है । हमारे भ्रष्टाचार के पीछे हमारी नेक भावना है और लोगों को इसे इसी रूप में देखने की आदत डालनी होगी । दरअसल हम कोई भी काम इस नेक भावना से परे जाकर नहीं करते ।’
   नीले सियार को इत्मीनान है कि अब सभी तक उनकी बात पहुँच जाएगी...वह भी सही अर्थ और कलेवर के साथ । कई चैनलों ने तो अब तक ब्रेकिंग न्यूज झोंकना भी शुरु कर दिया होगा ।

शनिवार, 24 सितंबर 2016

समाजवाद का प्रहसन

                    
                          दृश्य-एक
   ( स्थान- दरबार-ए-खास । महाराज सियार सिंहासन पर चिपके हुए हैं । मुट्ठियां हत्थों पर कसी हुई हैं । सामने आसनों पर महाराज के अपने लोग विराजमान हैं । सभी की आँखें बाहर की ओर लगी हुई हैं । तभी खबरी खरगोश दरबार में प्रवेश करता है, बहैसियत सरकारी अखबार के प्रतिनिधि के रूप में ।)
खबरी खरगोश- महाराज की जय हो । खबर उड़ी है महाराज कि आपने दो मंत्रियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया है । चुनाव के ठीक पहले क्या इसे उचित कदम माना जा सकता है?
महाराज- बेशक, इसे उचित कदम न मानना मूर्खता होगी । उचित कदम के लिए हर समय उचित होता है । भ्रष्टाचार को किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जा सकता । जो भ्रष्ट हैं, उन्हें जाना होगा बाहर ।
खबरी- पर वे मंत्री तो पिछले चार साल से भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे हुए थे, कार्रवाई अब जाके क्यों?
महाराज- कार्रवाई समाजवाद का तकाजा थी । समाजवाद बेसब्र नहीं है । उसमें धीरज धारण किए रखने की अपूर्व क्षमता है । उसने धैर्यपूर्वक भ्रष्टाचार को देखा और अंततः कार्रवाई कर दी ।
खबरी- ( कैमरा की ओर मुखातिब होकर ) तो देखा आपने समाजवाद और महाराज की सक्रियता ! महाराज न्यायप्रिय व्यक्ति हैं । उन्होंने भ्रष्टाचार को भी भरपूर मौका दिया फलने-फूलने और अपनी सफाई देने का । इतने दयालु और न्यायप्रिय व्यक्ति पर क्या निष्क्रियता का आरोप उचित है?
    (इस कथन के साथ ही पर्दा गिरता है ।)
                         दृश्य- दो
   ( स्थान- राजपिता सियार का महल । राजपिता अपने आसन पर चिंता-भाव के साथ बैठे हुए हैं । चचा सियार खड़े-खड़े फुफकारते साँप हो रहे हैं । अपने और पराए-दोनों बेचैनी के आलम में जमीन पकड़े हुए हैं, ताकि वे समाजवाद को किसी भी सूरत में उसमें समाने से रोक सकें ।)
खबरी खरगोश- चचा सियार, आपके दो आदमी बाहर हो गए हैं । बाहर वे बालू को हथेलियों में बाँधे जा रहे हैं और इधर आपका भी बोरिया-बिस्तर बँध गया । आपके विभाग छीनकर आपको भी बेरोजगार कर दिया गया है । क्या आप अब भी...?
चचा सियार- देखिए, हम समाजवादी लोग विभाग के चक्कर में नहीं पड़ते । चूँकि समाजवाद पर खतरा आन पड़ा है, इसलिए हमें बाकी पदों से इस्तीफा देना ही होगा । राजपिता के सामने हमने इस्तीफे का प्रस्ताव कर दिया है ।
खबरी- ( राजपिता की ओर मुड़कर ) क्या आप इस्तीफे को स्वीकार करने जा रहे हैं? इसके बाद समाजवाद का क्या होगा? क्या आप मानेंगे कि एक बार फिर समाजवाद खतरे में है?
राजपिता- समाजवाद पर कोई खतरा नहीं है । जहाँ तक इस्तीफे की बात है, उसे हम कतई स्वीकार नहीं करेंगे । इसी में समाजवाद की भलाई है ।
   ( राजपिता और चचा सियार के बीच कुछ देर खुसर-पुसर होती है । तनाव दोनों के चेहरों से अचानक गायब हो जाता है । खुसर-पुसर के प्रतिफल के रूप में जो फॉर्मूला निकलकर आता है, उसे खबरी खरगोश को थमा दिया जाता है । इसी के साथ पर्दा गिरता है ।)
                      दृश्य- तीन
   स्थान- महाराज सियार का दरबार-ए-खास । महाराज के चेहरे पर हल्के मुस्कान के छींटे दिखाई दे रहे हैं । मंत्रीगण भी कुछ राहत की अवस्था में हैं ।)
खबरी खरगोश- महाराज, सुना है कि आप बर्खास्त मंत्रियों को जल्द ही बहाल करने वाले हैं?
महाराज- हमने तो बहाल कर भी दिया । मीडिया ही खबर चलाने में पीछे रह गई । (यह कहते हुए महाराज ठठाकर हँसते हैं ।)
खबरी- पर इससे तो समाजवाद को बहुत नुकसान होगा । एक तरह से आपने भ्रष्ट आचरण को गोद में लाकर बिठा दिया ।
महाराज- समाजवाद कोई फूस की झोपड़ी नहीं है, जिसे कोई भी गिरा दे । यह तो सोने का मजबूत महल है, जिसे हमने मेहनत से बनाया है ।
खबरी- उस वक्त भ्रष्ट मंत्रियों को बाहर करना समाजवाद के हित में था, तो आज उन्हें अंदर लेना किसके हित में है?
महाराज- समाजवाद के हित में । इसका हित तो हम समाजवादी ही बेहतर समझ सकते हैं । कोई भी वाद समाज-निरपेक्ष नहीं होता । बर्खास्त करना भी समाजवाद के हित में था और बहाल करना भी उसी के हित में है ।
   ( खबरी खरगोश समाजवाद की इस नई व्याख्या को दर्शकों तक पहुँचाने के लिए कैमरे की ओर मुँह करता है । उधर पर्दा भी गिरना शुरु हो जाता है ।)
                       दृश्य- चार
   (स्थान- राजपिता सियार का महल । राजपिता महाराज सियार से पार्टी के अध्यक्ष की माला छीनकर चचा सियार को पहना रहे हैं । चचा और उनके चेले-चपाटी गद्गद् अवस्था में खड़े हैं ।)
खबरी खरगोश- आखिर इस माला का हस्तांतरण क्यों?
राजपिता सियार- दरअसल महाराज सियार के गले में कई मालाएँ हो गई थीं, जिनके बोझ से वह असंतुलित हो रहे थे । उनके संतुलन को बहाल करने के लिए एक-आध मालाएँ इधर करना अनिवार्य हो गया था । अब उनके कदम भी नहीं लड़खड़ाएंगे और इधर बोझ के कारण चचा सियार भी ज्यादा नहीं उछलेंगे ।
खबरी- (चचा सियार की ओर मुड़कर) माला की जिम्मेदारी निभाने के लिए आप क्या करने वाले हैं?
चचा सियार- हमने तो कर भी दिया । महाराज के करीबी भ्रष्ट लोगों को उनके पदों से हटाने का हुक्म अभी-अभी ही भेजा है । वे लोग जमीनों पर कब्जा किए बैठे थे । इस कारण समाजवाद का बहुत नुकसान हो रहा था ।
खबरी- अब चुनाव में किसकी चलेगी?
चचा- देखिए, परीक्षा महाराज की है, तो हमारी भी है, बल्कि पार्टी के अध्यक्ष की वजह से बड़ी परीक्षा हमारी है । अतः हमारी ही ज्यादा चलेगी ।
   (चचा सियार मजबूत कदमों से मंच के दाहिनी ओर रुख करते हैं । उनके साथ समर्थक नारे लगाते हुए आगे बढ़ते हैं । पर्दा गिरता है ।)
                    दृश्य- पाँच
   (स्थान- दरबार-ए-खास । एक-दूसरे से नजरें चुराने वाले महाराज और चचा एक-दूसरे को मुस्कुराकर देखते हुए खड़े हैं । दोनों की सेनाएँ होली-मिलन के माफिक सट कर खड़ी हैं ।)
खबरी खरगोश- कल तक आप लोग एक साथ होने पर भी अलग-अलग उत्तर-दक्षिण दिशाओं को देखा करते थे । आज दोनों एक-दूसरे को...!
महाराज- उसके लिए भी समाजवाद ही मुख्य कारण था । हम उसे हर दिशा में फैलाना चाहते थे, इसीलिए हमारी नजरें अलग-अलग दिशाओं में जमी हुई थीं । समाजवाद की खातिर हमें बहुत कुछ करना होता है ।
चचा सियार- अब हमारे रास्ते एक हैं । लक्ष्य एक है । चुनाव को बेधना जरूरी है । हमारे बीच जो कुछ भी हुआ, उसके मूल में समाजवाद की ही चिंता थी । आज यहाँ खड़े हैं, तो केवल उसी की खातिर ।
खबरी- पर वे पिछले दिनों के प्रहसन...?
महाराज- मीडिया गम्भीर होती, तो उसे सब कुछ प्रहसन नहीं दिखाई देता । मीडिया की इस बात के लिए हम भला क्या कर सकते हैं !

खबरी- (कैमरे की तरफ मुड़कर) तो देखा आपने । जिसे आप नाटक समझ रहे थे, वह दरअसल समाजवाद की जोर-आजमाइश थी...अपने अस्तित्व के विस्तार के लिए  कैमरा-पर्सन छछूँदर के साथ मैं खबरी खरगोश...(और पर्दा गिरता चला जाता है ।)

मंगलवार, 5 जुलाई 2016

मैं हूँ आम सियार

                   
   जंतर-मंतर आश्चर्य से मुँह फाड़े खड़ा था । आँखें बेहिसाब चौड़ी होती गई थीं । जिधर से देखो, उधर से सियार चले आ रहे थे । धरती के अंदर और आसमान को छोड़कर दिशाओं का कोई कोना बाकी नहीं था । खेलम-खेल थी, मेलम-मेल थी, रेलम-पेल थी, जेलम-जेल थी, ठेलम-ठेल थी । हर कोई एक जगह पकड़ने को आतुर । जिन्हें जगह मिल गई, वे बैठ गए थे । जिन्हें नहीं मिली, वे खड़े-खड़े ही धरती को पैरों तले रौंद रहे थे ।
   सामने मंच पर बैठे आठ-दस नेता टाइप सियार अचानक खड़े हो गए थे । वे जोर-जोर से हाथ हिलाकर सबको शांत करने की कोशिश करने लगे । सबके शांत होते ही मुख्य नेता सियार उठ खड़ा हुआ । गले में अच्छी तरह मफलर लपेटने के बाद वह चार-पाँच बार खाँसा । गला साफ होने के बाद उसने सभी से सियार-वंदना की अपील की । पूरा जंतर-मंतर हुआँ-हुआँ की मधुर ध्वनि से गूँज उठा ।
   ‘भाइयों,’ वंदना खत्म होते ही नेता सियार बोला, ‘जीवन के हर क्षेत्र में, हर कार्य-व्यापार में, रोजमर्रा के हर व्यवहार में हमें दिक्कतों का सामना है । हर जगह वह कौन है, जिसके कारण हमें बार-बार दौड़ना पड़ता है, चप्पलों को घसीटना पड़ता है, फिर भी हाथ खाली-के-खाली रह जाते हैं ।’
   ‘कौन है वह?’ भीड़ में से आवाज आई ।
   ‘अच्छा प्रश्न किया किसी सियार दोस्त ने ।’ नेता सियार चहक उठा था । वह बोला, ‘भ्रष्टाचार है वह, जिससे हर सियार त्रस्त है ।’
   ‘उसे मार डालो...मार डालो ।’ भीड़ ऐसे हिलने लगी, जैसे कई शांत लहरें अचानक विक्षुब्ध हो उठी हों ।
   ‘मार तो डाला जाए, पर यह तो पता चले कि वह रहता कहाँ है ।’ एक दूसरा नेता उठकर बोला और भीड़ को शांत करने लगा । जैसे ट्यूब से हवा निकल गई हो, भीड़ फिर चिपक कर बैठ गई ।
   तभी मुख्य नेता सियार ऐलान करते हुए बोला, ‘ठीक एक पखवाड़े बाद अगली शाम को हम फिर यहीं मिलेंगे । निश्चय ही इस अवधि में भ्रष्टाचार का पता हमारी मुट्ठी में होगा ।’
   एक पखवाड़े बाद वाली शाम थी आज । सियारों की संख्या भी दोगुनी थी और उत्साह भी दोगुना । ‘क्या मिला ठिकाना? हमें भी तो पता चले कौन-सी है उसकी गुफा ।’ भीड़ से आवाज आई, शायद वह तनिक भी ताकने के मूड में नहीं थी ।
   ‘हाँ-हाँ, पता चल गया है ।’ मुख्य नेता सियार उठते हुए बोला, ‘वह सत्ता के गलियारे में रहता है । लकड़बग्घों और भेड़ियों के बंगले उसके आश्रय-स्थल हैं । उसे अक्सर खिड़कियों से झाँकते देखा जा सकता है ।’
   ‘तो देर किस बात की, उसे मार डालो...मार डालो ।’ एक हल्ला-सा उठा और भीड़ बेकाबू होने लगी ।
   ‘भाइयों-भाइयों,’ हाथ के इशारे से बैठने को कहता हुआ नेता बोला, ‘इतना आसान नहीं है उसे मारना । वह बड़े-बड़े लोगों के शरणागत है । उसे मारने के लिए  घमासान करना होगा और इस काम के लिए हमें चुनावी रण-क्षेत्र में उतरना होगा । सत्ता के गलियारों तक पहुँचना होगा । क्या आप सब चुनावी रण-क्षेत्र के लिए हमें योद्धा चुनने को तैयार हैं?’
   ‘हाँ-हाँ, आप लोग ही योद्धा होंगे ।’ भीड़ ने एक स्वर से हामी भरी थी ।
   मंच पर बैठे सारे नेता सियार चुनावी रण-क्षेत्र से होते हुए सत्ता के गलियारे में पहुँच गए । भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए ताकत की जरूरत होती है और ताकत इकट्ठा करने के लिए उन्होंने अपना-अपना वेतन कई-कई गुना बढ़ा लिया । अब टक्कर की लड़ाई थी । भ्रष्टाचार मजबूत था, तो ये भी कम मजबूत नहीं थे । ये रोज-रोज उसे आँखें दिखाने लगे । वह भी इन्हें घूरता रहा और इसी आँख-मिलाई में दो साल गुजर गए ।
   जंतर-मंतर एक बार फिर गुलजार हुआ । ‘भ्रष्टाचार का क्या हुआ’ जैसे प्रश्नों पर मुख्य नेता सियार गरजते हुए बोला, ‘भ्रष्टाचार बहुत ढीठ है दोस्तों, वह कई रूपों में मौजूद है, पर हम उसे छोड़ेंगे नहीं । हमने अंग्रेजों के डिवाइड एण्ड रूल की तरह एक पॉलिसी बनाई है-डिवाइड एण्ड किल । हम भ्रष्टाचार के कुछ रूपों को अपनी तरफ मिला लेंगे और उन्हें कमजोर करके मार डालेंगे । क्या इस पॉलिसी से सभी सियार सहमत हैं?’
   भीड़ ने सिर हिलाया । सहमति पाकर एक नेता सियार हाथ लहराते हुए बोला, ‘हम आम सियार थे, आम सियार हैं और सदा आम सियार बने रहेंगे ।’ नेताओं की ऐसी भावना सुनकर भीड़ गद्गद हो तालियाँ पीटने लगी ।

   जल्दी ही कुछ नेता सियारों के बंग्लों में भ्रष्टाचार दिखाई देने लगता है । आम सियार खुश हैं कि नेता सियारों के सिर पर अभी भी मैं हूँ आम सियार’ की टोपी सजी हुई है ।
Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...

लोकप्रिय पोस्ट