जीवन व समाज की विद्रुपताओं, विडंबनाओं और विरोधाभासों पर तीखी नजर । यही तीखी नजर हास्य-व्यंग्य रचनाओं के रूप में परिणत हो जाती है । यथा नाम तथा काम की कोशिश की गई है । ये रचनाएं गुदगुदाएंगी भी और मर्म पर चोट कर बहुत कुछ सोचने के लिए विवश भी करेंगी ।

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मंगलवार, 10 जनवरी 2017

नेता तो सेफ हैं...

                
    चाय की अड़ी पर इस समय भी तीन लोग अड़े हुए थे । सामने की सड़क लगभग वीरान हो चुकी थी । कभी-कभार इक्के-दुक्के लोग ही आते-जाते दिख जाते थे । कोयले की अतिरिक्त खुराक न मिलने के कारण अंगीठी अब ठंडी हो चली थी, पर शीशे के गिलासों में उड़ेली गई चाय पूरी तरह गरम थी । जो बात बटेसर के पेट में पिछले कई दिनों से खदबदा रही थी, गरम चाय पड़ते ही वह भाप बन गई और मुँह से उसके निकलने लगी, इ जउन नोटबंदी का फइसला रहा, उ एकदम्मे फुस्स साबित हुआ कउनो फुसफुसिया पटाखा के माफिक ।...है कि ना?’
    ‘इ बटेसरा तो हरदम्मे फुसफुसाय रहता है ।’ लुटई पहलवान से रहा न गया । चाय का एक घूँट भरते हुए वह बोले, ‘एकरा कान पर बम्मो फटे, तो फुस्से सुनाई देता है । अरे उ कश्मीर में पत्थर चलना बंद हो गया और इधर नक्सली भाई लोग गोली चलाना छोड़कर नोट चलाने में लग गए । इ कउनो कम धमाका है कि इन लोगन की बोलतिए बंद हो गया ।’
    ‘एक और बात हुई है ।’ पंडित तोताराम भी उछल पड़े बहस में । चाय का आखिरी घूँट सुड़कते हुए बोले, ‘दाग धुल गया है नेताओं का ।’
    ‘का बात बोले पंडिज्जी...नोटबंदी कउनो बैतरणी रही कि पाप धुल गया ।’ इस बार दुकान स्वामी चनेसर की आवाज आई । वह सामान को समेटने में लगा हुआ था ।’
    ‘नोटबंदी का इतना बड़ा झमेला हुआ, कोई नेता पकड़ा गया क्या? जो भी पकड़े गए, वे नेता नहीं थे । तुम्हीं बताओ बटेसर, इसका क्या मतलब निकलता है?’
    ‘मतलब तो जरूरे कछु निकलना चाहिए ।’ बटेसर अपना कान खुजाते हुए बोला, ‘आप ही काहे नाहीं बताय देते पंडिज्जी ।’
    ‘मतलब तो एकदम साफ है । नेताओं के पास दो नंबर की कोई कमाई नहीं । होती तो पकड़े नहीं जाते? लोगों ने नाहक ही उन्हें दागदार मान रखा है ।’
    ‘ना-ना, इ बात तो कउनो मूरख भी नहीं मानेगा ।’ लुटई पहलवान खम ठोंकते हुए बोले, ‘नेता लोग बहुते पहुँचे हुए जीव हैं । बटेसरा के इ बात तो माननी पड़ेगी कि इन लोगन ने नोटबंदी को एकदम्मे फुस्स कर दिया ।’
    ‘पहलवान की बात को मानना मेरे लिए संभव नहीं है, क्योंकि नेताओं की बिरादरी कितनी भी चतुर क्यों न हो, सौ-पचास नेता तो जरूर लपेटे में आ जाते । का कहते हो बटेसर?’ पंडित जी ने अपने पक्ष को मजबूत करने के लिए बटेसर को निहारा ।
    ‘बटेसरा से का पूछते हैं? हम जवाब देते हैं आपको ।’ लुटई पहलवान लगभग तैयार बैठे थे जवाब देने के लिए । वह बोले, ‘आमे आदमी पकड़ में आता है । जउन पकड़ में ना आए, नेता वही होता है । आपने इन्हें आम आदमी मानने की गलती कर दी ।’
    ‘फिर भी क्या आप लोगों को अजीब नहीं लगता, जो लुटई पहलवान कहे जा रहे हैं? अगर नेता काला-काला कर रहे होते, तो इस धुलाई अभियान में कोई-न-कोई दाग तो अवश्य छोड़ जाते । मगर ऐसा हुआ क्या? इसलिए मैं नहीं मानता कि जहाँ नेता होता है, वहाँ दाग भी होता है । कम से कम नोटबंदी ने इस झूठे आरोप को सदा के लिए नकार दिया है । अब निश्चिंत होकर कहा जा सकता है कि यह देश नेताओं के हाथ में सुरक्षित है ।’
    पंडित जी के चेहरे को देखकर लुटई पहलवान को ऐसा लगा, जैसे वे अपने ही तर्क पर मुग्ध हो उठे हों । वह भी कुछ कम न थे । नहले पर दहला मारते हुए बोले, ‘हमारी समझ से तो नोटबंदी का सबक ये है कि देश और उसकी व्यवस्था नेताओं के हाथों सुरक्षित हो या न हो, किन्तु नेता देश और उसकी व्यवस्था के हाथों अवश्य सुरक्षित हैं ।’
    ‘का बात कहा पहलवान ! आपने तो पंडिज्जी का मुँहे बंद कर दिया ।’ इतना कहते ही चनेसर अपनी दुकान को बंद करने लगा था ।

बुधवार, 9 नवंबर 2016

अंधेरा धमका रहा है

                   
   यहाँ स्थानान्तरित होकर आने के बाद मैंने अपने कार्य-क्षेत्र के पड़ोसियों पर एक जासूस की तरह निगाह दौड़ाई । पड़ोसियों से अभिप्राय अलग-अलग कार्यों के प्रभार वाले मेरे सहकर्मी । आपसी बातचीत के बाद मुझे सौ टका यकीन हो गया कि मुझसे अधिक योग्य, कर्मनिष्ठ, पदरक्षक और ईमानदार कोई नहीं है । मुझे यह कहने में भी हिचक नहीं है कि मैं एक किस्म के अहंकार से लद गया । कोई भी टक्कर में नहीं है दूर-दूर तक । मैं अंदर ही अंदर अपने को प्रशंसा का पात्र मानकर अपनी पीठ ठोंकने लगा तथा शाबाशियों के गुलदस्ते समेटने लगा ।
   आदमी जब किसी बात पर आत्मविभोर हो, तो समय निकलते देर नहीं लगती । एक माह बीत गया और कुछ पता ही नहीं चला । अचानक बड़े साहब आ धमके उस रोज । यहाँ से दो किलोमीटर दूर एक दूसरे अहाते में उनका दफ्तर था । आते ही लगभग छापामार शैली में उन्होंने मेरे टेबल पर धावा बोल दिया । जैसे-जैसे एक फाइल से दूसरी फाइल पर उनकी निगाह दौड़ने लगी थी, वैसे-वैसे उनके चेहरे का रंग भी बदलने लगा था । मुझे लगा कि मेरे लिए प्रशंसा के शब्द साहब के मुँह से निकलने में अब देर नहीं । मेरी छाती टाइट होने लगी और ललाट उन्नत अवस्था को प्राप्त हो गया । कान बेसब्र हो उठे । अपने सुनने से ज्यादा अड़ोसियों-पड़ोसियों को सुनाने की बेचैनी मन पर हथौड़े मार रही थी ।
   मगर साहब के मुँह से बस इतना निकला, ‘मेरे घर पर हाजिर होइए शाम को...सभी फाइलों के साथ ।’ इसके बाद वह पड़ोसियों की ओर मुड़ गए । आँखें फाइलों पर थीं और हाथ उनकी पीठ पर । ‘शाबाश-शाबाश के शब्द कई बार उछले हवा में । मेरे कानों में भी पहुँचे गर्मागर्म पिघले सीसे की तरह । मुझे ऐसा आभास हुआ, जैसे मेरे भीतर की ही कोई चीज मुझे चिढ़ाने के लिए व्यग्र हो उठी हो ।
   शाम ढलते-ढलते मैं पहुँच गया था साहब के घर । ड्राइंग रूम में कदम रखते ही मुझे जोर का झटका लगा । पहले से उछल रहा टेंशन और उछल गया । दो-एक पड़ोसी यहाँ भी मौजूद थे । पता नहीं साहब क्या करने वाले हैं । उनका दोपहर का मूड भाँपकर कोई अज्ञानी ही मानेगा कि मैं ‘सु-गति’ को प्राप्त होने वाला हूँ । अपनी दुर्गति तब ज्यादा अच्छी नहीं लगती, जब पड़ोसी इर्द-गिर्द ही मौजूद हों ।
   साहब के ड्राइंग रूम में आते ही पड़ोसी खड़े हो गए, पर मैं ऐसा नहीं कर सका । पड़ोसियों की तरह उठकर मैं साहब का स्वागत नहीं कर पाया, क्योंकि मैं अभी बैठा ही कहाँ था । पड़ोसियों की उपस्थिति ने मुझे बैठने ही नहीं दिया था । साहब का इशारा पाते ही मैं बैठ गया । कुछ देर चुप्पी छाई रही । पड़ोसी आनन्द के भाव में थे, किन्तु एक-एक पल का भाव मेरे ऊपर भारी पड़ रहा था । तभी गला साफ करते हुए साहब की आवाज उभरी, ‘हाँ तो सरमा जी, इतना तो आप समझ ही गए होंगे कि मैंने आपको क्यों बुलाया है । हमें आपके खिलाफ ढेरों शिकायतें मिली हैं ।’
   ‘मगर, मेरा कसूर...?’
   वह बीच में ही बोल उठे, ‘एक हो तो बताऊँ । ये लोग लगभग रोज ही हमारी बैठक में उपस्थित होते हैं, पर शायद आपको इन चीजों में यकीन नहीं है ।’
   ‘मैं कुछ समझा नहीं ।’ मैंने अपनी अज्ञानता दिखाई ।
   ‘अब इतने अज्ञानी तो आप नहीं दिखाई देते कि आपको मिलने-मिलाने का मतलब भी पता न हो । आज कोई लैला-मजनूँ का जमाना नहीं है । तब जितना वियोग होता था, उतना ही प्रेम बढ़ता था । आज योग से प्रेम बढ़ता है । जितना मिलते जाओ, प्रेम उतना ही गाढ़ा होता है ।’
   मुझे उनका इशारा समझ में आने लगा था, पर मुझे नहीं पता था कि शाम को साहब के घर पर जाकर ही नौकरी पूरी होती है । मैं अभी यही सब सोच रहा था कि उनकी फिर आवाज उभरी । वह मेरी आँखों में आँखें गाड़ते हुए बोले, ‘शाम को करते क्या हैं आप?’
   ‘कुछ खास नहीं जी ।’ मैं सकुचाते हुए बोला, ‘रेलगाड़ी की पटरियों के इधर-उधर रहने वाले भूखे-नंगे बच्चों को देख मेरा मन द्रवित हो उठता है । उन्हीं को घर का बचा-खुचा खाना देने जाता हूँ । रोज वे मेरी राह देखते हैं । कभी-कभार फटे-पुराने कपड़े भी...।’ कहते हुए मैंने अपना सिर नीचे कर लिया था ।
   भूखा अगले दिन फिर भूख की ही बात करेगा साहब ।’ इस बार एक पड़ोसी बीच में उछल पड़ा था, ‘हमें देश की बात करनी चाहिए ।’
   ‘इसीलिए तो रोज शाम को हमारा मिलना होता है ।’ यह दूसरे पड़ोसी की आवाज थी, ‘हम साहब के आशीर्वाद से स्प्राइट की घूँटों के बीच अपने विभाग से लेकर देश की विदेश नीति तक की चर्चा करते हैं । अर्थनीति, राजनीति, कूटनीति...किस नीति पर हम चर्चा नहीं करते ।’
   सचमुच पहली बार मुझे अपनी अयोग्यता का आभास हुआ । मैं दो-चार बच्चों पर अँटका हुआ हूँ और ये लोग पूरे देश को छान रहे हैं । तभी साहब ने अपनी भारी आवाज में बोलना शुरु किया, ‘आप अपने पद के अनुरूप योग्य दिखाई नहीं देते । किसी भी फंड का व्यय विवेक व मौलिकता की माँग करता है । फंड जारी करते समय  अधिकतम लाभ की प्राप्ति ही सरकार की मंशा होती है । काम आप कर रहे हैं, तो ये लोग भी करते हैं ।’ उनका इशारा पड़ोसियों की तरफ था । तनिक रुकते हुए पुनः बोले, ‘आप घिसी-पिटी राह पर चलकर सीमित लोगों के हित की बात सोच रहे हैं, किन्तु ये लोग स्वविवेक का प्रयोग करते हुए अधिकतम लोगों को लाभ पहुँचा रहे हैं । इनके काम में मौलिकता भी है और सरकार की मंशा का पोषण भी । समाज व देश के हित से क्या अपना हित अलग हो जाता है?’
   अब मुझे अपनी ईमानदारी पर भी शक होना शुरु हो गया था । एक तरफ जिन कुछ लोगों के लिए फंड आ रहा है, सिर्फ उन्हीं लोगों को लाभ पहुँचाना और दूसरी तरफ अधिक से अधिक लोगों को लाभ पहुँचाना ! अधिकतम लाभ का सिद्धान्त तो मैंने भी पढ़ा है अर्थशास्त्र में । कहीं मेरी ईमानदारी से कोई चूक तो नहीं हो रही?
   मुझे अंदर से हिलता हुआ मानकर एक पड़ोसी धक्का देने की नीयत से बोला, ‘जब आदमी स्वस्थ होगा, तभी समाज व देश स्वस्थ होगा । आप न खाकर या कम खाकर अंततः देश का ही नुकसान करेंगे ।’
   ‘आप फाइल रख जाइए । मैं उसे बाद में देखता हूं ।’ इस बार साहब की आवाज आई थी । वह मुझे एक अभिभावक की तरह समझाते हुए बोले, ‘मुझे उम्मीद है कि आप अपनी अयोग्यताओं का परित्याग अवश्य करेंगे । ज्ञान जहाँ से मिले, आदमी को ग्रहण कर लेना चाहिए ।’
   कुछ देर बाद मैं सड़क पर खड़ा था । बाहर फैल चुका अंधेरा मुझे अपने आगोश में समेटने के लिए तेजी से मेरी ओर बढ़ने लगा ।

शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2016

सेफ्टी-जूते और स्टार्ट-अप

                   

   शाम को पार्क में टहलते हुए शुक्ला जी मिल गए । आज रोज की तरह उनकी चाल में वह तेजी नहीं थी । सामना होते ही मैंने पूछा, ‘क्या बात है मान्यवर, आप तो जैसे पैसेन्जर ट्रेन हो लिए हैं आज?’
   उन्होंने मुझे ध्यान से देखते हुए कहा, ‘कोई बात नहीं है बन्धु । बस यूँ ही थोड़ा ध्यान भटक गया था ।’
   ‘कोई बात तो जरूर है, वरना आपकी ट्रेन तो किसी भी हाल्ट को धकेलते हुए आगे निकल जाती है ।’ मैंने बात को निकलवाने की एक और कोशिश की ।
   ‘बात तो ठीक है आपकी ।’ वह स्वीकार करते हुए बोले, ‘एक चीज है, जो मुझे चिंतित किए जा रही है ।’
   ‘ऐसा क्या?’ मैंने उनकी चिंता के साथ अपनी चिंता को जोड़ते हुए कहा, ‘क्या कोई पारिवारिक समस्या आन खड़ी हुई है?’
   ‘अरे नहीं-नहीं । मैं तो युवाओं की बात सोच रहा था ।’ उन्होंने अपने मन को थोड़ा खोलते हुए कहा ।
   ‘क्यों, युवाओं को क्या हो गया है भला ! भले-चंगे तो दिखते हैं मुझे ।’ मैंने अपने अनुभव को साझा करते हुए कहा ।
   ‘भले-चंगे दिखते जरूर हैं, पर उनकी अपनी चिंताएँ भी हैं । युवा चिंताग्रस्त रहें, यह देश के लिए चिंतित करने वाली बात है । है कि नहीं?’ कहते हुए उन्होंने अपनी नजरें मेरे चेहरे पर गड़ा दीं ।
   ‘बेशक, किन्तु उनकी चिंता है क्या?’
   ‘रोजगार की चिंता । चलिए, पहले आराम से किसी बेंच पर बैठते हैं, फिर इस पर सोच-विचार करते हैं ।’ कहते हुए वह एक बेंच की ओर बढ़ गए । मैं भी उनके पीछे-पीछे हो लिया ।
   ‘हाँ, रोजगार की चिंता तो है ही ।’ बेंच पर बैठते हुए मैंने बात को आगे बढ़ाई ।
   ‘सिर्फ रोजगार की ही चिंता नहीं है । चिंता यह भी है कि कौन सा उद्योग-धंधा किया जाए ।’
   अब जाके बात पूरी तरह समझ में आई थी मेरे । मैंने अपनी चिंता रखते हुए कहा, ‘पर हम लोग क्या कर सकते हैं । इस पर तो सरकार को सोचना चाहिए ।’
   ‘सरकार तो सोच ही रही है, बल्कि यूँ कहें कि उसने तो सोच भी लिया है ।’ वह तनिक आश्वस्त होते हुए बोले, ‘स्टार्ट-अप कार्यक्रम आखिर उसी ने तो शुरु किया है । इसके बावजूद युवाओं के सामने समस्या यह है कि वे कौन सा उद्योग शुरु करें...कौन सी ऐसी चीज बनाएँ, जिसकी देश में अच्छी डिमांड हो या निकट भविष्य में हो जाए ।’
   ‘यह तो सचमुच सोचने वाली बात है ।’ मैंने अपने चेहरे पर गम्भीरता के कुछ बादलों को जमाते हुए कहा ।
   ‘पर मैंने तो सोच भी लिया है । आज नेताओं को लेकर जिस तरह घृणा और गुस्सा बढ़ता जा रहा है, उसे ध्यान में रखते हुए कुछ चीजों की डिमांड भविष्य में खूब बढ़ने वाली है ।’
   ‘मैं कुछ समझा नहीं । आप बात को स्पष्ट तो कीजिए ।’
   ‘वही तो बता रहा हूँ । भविष्य में स्याही और जूते की डिमांड जबर्दस्त रूप से बढ़ने वाली है ।’ उन्होंने अपनी बात पर जोर देते हुए कहा ।
   ‘मगर स्याही और जूते ही क्यों?’ ‘वो इसलिए कि इनसे दोहरा लाभ है । नेताओं पर स्याही और जूते फेंक देने मात्र से फेंकने वाले का आक्रोश पिघल जाता है । वह चोट पहुँचाने के लिए ऐसा नहीं करता, बल्कि पोतना और उछालना ही उसकी नीयत होती है । लेकिन दिक्कत यह है कि आज न तो वैसी स्याही है और न ही जूते ।’
   ‘क्यों, दोनों तो मौजूद हैं बाजार में ।’ मैंने उन्हें याद दिलाने की कोशिश की ।
   ‘मौजूद हैं, मगर उद्देश्य की समुचित पूर्ति नहीं करते । अब बॉल-प्वाइंट पेन का जमाना है । उसकी स्याही निकालकर पोतने में खतरा यह है कि वह जितनी नेता को पोतती है, उससे कहीं अधिक पोतने वाले को पोत डालती है । इसलिए इस काम को अंजाम देने के लिए ‘सेफ्टी स्याही’ की जरूरत है ।’
   ‘चलिए मान लिया, पर जूतों की क्या कमी है? एक खोजिए, दस मिलते हैं ।’
   ‘बेशक मिलते हैं, पर वे उछलने के बाद हिंसा के दूत बन जाते हैं । ऊपर से उनकी बनावट ऐसी है कि उछलते हैं दिल्ली के लिए, किन्तु हवा के प्रतिरोध के चलते लक्ष्य-संधान करते हैं मुम्बई में । जूते ऐसे होने चाहिए, जो सटीक लक्ष्य-संधान करें । इसलिए ‘सेफ्टी-शू’ का निर्माण एक चोखा धंधा है आने वाले समय में ।’

   ‘सचमुच, काफी चिंतन किया है आपने इस मसले पर । युवाओं को निश्चय ही इस पर विचार करना चाहिए । आखिर उनके भविष्य का सवाल जो ठहरा ।’ कहते हुए मैं बेंच से उठ खड़ा हुआ । वह भी तेज गति से मेरे पीछे लपके । अब हम दोनों समान चाल से पार्क की दूसरी ओर बढ़ रहे थे ।

शुक्रवार, 26 अगस्त 2016

बाढ़...फिर आना इस देश

                   
   साधो, वर्षा ऋतु आते ही हमारे यहाँ धर्म-कर्म कुछ ज्यादा ही बढ़ जाते हैं । आम जन-किसान पूजा-पाठ-हवन और यज्ञादि करने लगते हैं । प्रयोजन ऊपर वाले को रुष्ट होने से रोकना होता है, ताकि वह नीचे वालों की इच्छाओं को पुष्ट एवं संतुष्ट करता रहे । वर्षा की इतनी आपूर्ति वह अवश्य कर दे कि ‘भूखे भजन न होंहि गोपाला’ कहने की नौबत न आए । पेट भी भर जाए और भजन भी चलता रहे । उधर बड़े-बड़े अफसर और नेतागण बड़े-बड़े पंडितों के माध्यम से बड़े-बड़े यज्ञों के आयोजन करवाते हैं । उनका प्रयोजन कुछ हटके होता है । वर्षा हो तो इतनी हो कि चारों तरफ बाढ़ आ जाए और नहीं तो एकदम सूखा पड़ जाए । सूखे का सुख तो सूखा आने पर ही मिलता है । बाढ़ में जैसे पानी का बढ़ाव होता है, वैसे ही खुशनसीबों के घर में लक्ष्मी का पड़ाव होता है ।
   खुशनसीबी देखिए कि वर्षा ऋतु इस तरह आई है कि आमजन बाढ़ से बेहाल हैं और बहुत से जिम्मेदार लोग उनका हाल लेने के लिए बेहाल हैं । जहाँ दादुर मेघ-मल्हार की टर्र-पों में उलझे हुए हैं, वहाँ खुशनसीब मानव मन बाथ-रूम में सुलझे रूप में गा उठा है-आया सावन झूम के...भादो भी आना चूम के ।
   वैसे धुँआधार बारिश और बाढ़ के अनेकों फायदे हैं । बाढ़ जीव-जन्तुओं को यह सुनहरा मौका देती है कि वे अपने जीवन की एकरसता को छोड़कर कुछ दिन बहुरसता में व्यतीत कर सकें । कहाँ वे टेढ़े-मेढ़े बिल और घुटती साँसें और कहाँ पेड़ों-झाड़ियों का विराट विस्तार ! कुछ नसीब वाले जीव-जंतुओं को तो मानव घरों में भी प्रवेश करने का मौका मिल जाता है । पिकनिक का ऐसा महा-आयोजन वे भला किस हस्ती के बल पर कर सकते थे ! यह बाढ़ ही है, जो पेड़ों-झाड़ियों पर लटकाती, सावन-भादो के झूले झुलाती तथा मानव-घरों को बारीकी से निरखने का सुख प्रदान करती है ।
   आम जन बाढ़ के बड़प्पन को देख अपनी क्षुद्रता का अहसास नहीं करता । चारों तरफ जल प्रलय उसे उसकी निःसारता का बोध कराता है । भूख-प्यास की अनुभूति उसकी सहनशीलता को चट्टानी रूप प्रदान करती है । वह खुद को उन ऋषि-महर्षियों के समकक्ष पाता है, जो भूख-प्यास की पीड़ा को तज तपस्या में तल्लीन रहते हैं । आसमान से संभावित टपकने वाले खाने के पैकेटों के लिए टकटकी क्या किसी साधना से कम है? राहत के लिए जिम्मेदार लोगों के कोरे आश्वासन यही बयाँ करते हैं कि पूरा यह संसार असत्य है, तथा सत्य केवल ऊपर जाना है ।
   बाढ़ सबसे ज्यादा लाभ अपने को इज्जत से बुलाने वालों को देती है । निरीह आम जनों के हाथों में खाने के पैकेट के साथ सेल्फी का मौका खुशनसीब बन्दे को ही मिलता है । पूरा सोशल मीडिया उनकी महानता और उपकार के चर्चों से ऐंठने लगता है । कागजों पर राहत के घोड़े रेस लगाते हैं और धरातल पर आम जन भूख को फेस करते हैं । यह सत्य जितना बड़ा होता है, खुशनसीबों के मन की राहत भी उतनी ही बड़ी होती है । दीपावली के बहुत पहले ही लक्ष्मी घर में आ बिराजती हैं । वैसे भी लक्ष्मी पहले ही घर में चली आएं, तभी दिवाली की पूजा सार्थक बनती है । बाढ़ में दिवाली...यह चमत्कार हमारे यहाँ ही सम्भव है । इस चमत्कार को प्रणाम करते हुए किसी भी अन्य का यह अधिकार नहीं बनता कि वह बाढ़ या खुशनसीब लोगों को गालियाँ दे, चोर और भ्रष्ट कहे ।

   ढेर सारे लाभों को देखते हुए देश-हित में हमें बाढ़ की भयावहता को बढ़ाने के प्रयास में जुट जाना चाहिए, क्योंकि बाढ़ जितनी विकराल होगी, उससे मिलने वाले सुख उतने ही कमाल के होंगे । आइए, देश के सिर पर सवार बाढ़ से हाथ जोड़कर प्रार्थना करते हैं ।
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