जीवन व समाज की विद्रुपताओं, विडंबनाओं और विरोधाभासों पर तीखी नजर । यही तीखी नजर हास्य-व्यंग्य रचनाओं के रूप में परिणत हो जाती है । यथा नाम तथा काम की कोशिश की गई है । ये रचनाएं गुदगुदाएंगी भी और मर्म पर चोट कर बहुत कुछ सोचने के लिए विवश भी करेंगी ।

सरकार लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
सरकार लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 9 नवंबर 2016

अंधेरा धमका रहा है

                   
   यहाँ स्थानान्तरित होकर आने के बाद मैंने अपने कार्य-क्षेत्र के पड़ोसियों पर एक जासूस की तरह निगाह दौड़ाई । पड़ोसियों से अभिप्राय अलग-अलग कार्यों के प्रभार वाले मेरे सहकर्मी । आपसी बातचीत के बाद मुझे सौ टका यकीन हो गया कि मुझसे अधिक योग्य, कर्मनिष्ठ, पदरक्षक और ईमानदार कोई नहीं है । मुझे यह कहने में भी हिचक नहीं है कि मैं एक किस्म के अहंकार से लद गया । कोई भी टक्कर में नहीं है दूर-दूर तक । मैं अंदर ही अंदर अपने को प्रशंसा का पात्र मानकर अपनी पीठ ठोंकने लगा तथा शाबाशियों के गुलदस्ते समेटने लगा ।
   आदमी जब किसी बात पर आत्मविभोर हो, तो समय निकलते देर नहीं लगती । एक माह बीत गया और कुछ पता ही नहीं चला । अचानक बड़े साहब आ धमके उस रोज । यहाँ से दो किलोमीटर दूर एक दूसरे अहाते में उनका दफ्तर था । आते ही लगभग छापामार शैली में उन्होंने मेरे टेबल पर धावा बोल दिया । जैसे-जैसे एक फाइल से दूसरी फाइल पर उनकी निगाह दौड़ने लगी थी, वैसे-वैसे उनके चेहरे का रंग भी बदलने लगा था । मुझे लगा कि मेरे लिए प्रशंसा के शब्द साहब के मुँह से निकलने में अब देर नहीं । मेरी छाती टाइट होने लगी और ललाट उन्नत अवस्था को प्राप्त हो गया । कान बेसब्र हो उठे । अपने सुनने से ज्यादा अड़ोसियों-पड़ोसियों को सुनाने की बेचैनी मन पर हथौड़े मार रही थी ।
   मगर साहब के मुँह से बस इतना निकला, ‘मेरे घर पर हाजिर होइए शाम को...सभी फाइलों के साथ ।’ इसके बाद वह पड़ोसियों की ओर मुड़ गए । आँखें फाइलों पर थीं और हाथ उनकी पीठ पर । ‘शाबाश-शाबाश के शब्द कई बार उछले हवा में । मेरे कानों में भी पहुँचे गर्मागर्म पिघले सीसे की तरह । मुझे ऐसा आभास हुआ, जैसे मेरे भीतर की ही कोई चीज मुझे चिढ़ाने के लिए व्यग्र हो उठी हो ।
   शाम ढलते-ढलते मैं पहुँच गया था साहब के घर । ड्राइंग रूम में कदम रखते ही मुझे जोर का झटका लगा । पहले से उछल रहा टेंशन और उछल गया । दो-एक पड़ोसी यहाँ भी मौजूद थे । पता नहीं साहब क्या करने वाले हैं । उनका दोपहर का मूड भाँपकर कोई अज्ञानी ही मानेगा कि मैं ‘सु-गति’ को प्राप्त होने वाला हूँ । अपनी दुर्गति तब ज्यादा अच्छी नहीं लगती, जब पड़ोसी इर्द-गिर्द ही मौजूद हों ।
   साहब के ड्राइंग रूम में आते ही पड़ोसी खड़े हो गए, पर मैं ऐसा नहीं कर सका । पड़ोसियों की तरह उठकर मैं साहब का स्वागत नहीं कर पाया, क्योंकि मैं अभी बैठा ही कहाँ था । पड़ोसियों की उपस्थिति ने मुझे बैठने ही नहीं दिया था । साहब का इशारा पाते ही मैं बैठ गया । कुछ देर चुप्पी छाई रही । पड़ोसी आनन्द के भाव में थे, किन्तु एक-एक पल का भाव मेरे ऊपर भारी पड़ रहा था । तभी गला साफ करते हुए साहब की आवाज उभरी, ‘हाँ तो सरमा जी, इतना तो आप समझ ही गए होंगे कि मैंने आपको क्यों बुलाया है । हमें आपके खिलाफ ढेरों शिकायतें मिली हैं ।’
   ‘मगर, मेरा कसूर...?’
   वह बीच में ही बोल उठे, ‘एक हो तो बताऊँ । ये लोग लगभग रोज ही हमारी बैठक में उपस्थित होते हैं, पर शायद आपको इन चीजों में यकीन नहीं है ।’
   ‘मैं कुछ समझा नहीं ।’ मैंने अपनी अज्ञानता दिखाई ।
   ‘अब इतने अज्ञानी तो आप नहीं दिखाई देते कि आपको मिलने-मिलाने का मतलब भी पता न हो । आज कोई लैला-मजनूँ का जमाना नहीं है । तब जितना वियोग होता था, उतना ही प्रेम बढ़ता था । आज योग से प्रेम बढ़ता है । जितना मिलते जाओ, प्रेम उतना ही गाढ़ा होता है ।’
   मुझे उनका इशारा समझ में आने लगा था, पर मुझे नहीं पता था कि शाम को साहब के घर पर जाकर ही नौकरी पूरी होती है । मैं अभी यही सब सोच रहा था कि उनकी फिर आवाज उभरी । वह मेरी आँखों में आँखें गाड़ते हुए बोले, ‘शाम को करते क्या हैं आप?’
   ‘कुछ खास नहीं जी ।’ मैं सकुचाते हुए बोला, ‘रेलगाड़ी की पटरियों के इधर-उधर रहने वाले भूखे-नंगे बच्चों को देख मेरा मन द्रवित हो उठता है । उन्हीं को घर का बचा-खुचा खाना देने जाता हूँ । रोज वे मेरी राह देखते हैं । कभी-कभार फटे-पुराने कपड़े भी...।’ कहते हुए मैंने अपना सिर नीचे कर लिया था ।
   भूखा अगले दिन फिर भूख की ही बात करेगा साहब ।’ इस बार एक पड़ोसी बीच में उछल पड़ा था, ‘हमें देश की बात करनी चाहिए ।’
   ‘इसीलिए तो रोज शाम को हमारा मिलना होता है ।’ यह दूसरे पड़ोसी की आवाज थी, ‘हम साहब के आशीर्वाद से स्प्राइट की घूँटों के बीच अपने विभाग से लेकर देश की विदेश नीति तक की चर्चा करते हैं । अर्थनीति, राजनीति, कूटनीति...किस नीति पर हम चर्चा नहीं करते ।’
   सचमुच पहली बार मुझे अपनी अयोग्यता का आभास हुआ । मैं दो-चार बच्चों पर अँटका हुआ हूँ और ये लोग पूरे देश को छान रहे हैं । तभी साहब ने अपनी भारी आवाज में बोलना शुरु किया, ‘आप अपने पद के अनुरूप योग्य दिखाई नहीं देते । किसी भी फंड का व्यय विवेक व मौलिकता की माँग करता है । फंड जारी करते समय  अधिकतम लाभ की प्राप्ति ही सरकार की मंशा होती है । काम आप कर रहे हैं, तो ये लोग भी करते हैं ।’ उनका इशारा पड़ोसियों की तरफ था । तनिक रुकते हुए पुनः बोले, ‘आप घिसी-पिटी राह पर चलकर सीमित लोगों के हित की बात सोच रहे हैं, किन्तु ये लोग स्वविवेक का प्रयोग करते हुए अधिकतम लोगों को लाभ पहुँचा रहे हैं । इनके काम में मौलिकता भी है और सरकार की मंशा का पोषण भी । समाज व देश के हित से क्या अपना हित अलग हो जाता है?’
   अब मुझे अपनी ईमानदारी पर भी शक होना शुरु हो गया था । एक तरफ जिन कुछ लोगों के लिए फंड आ रहा है, सिर्फ उन्हीं लोगों को लाभ पहुँचाना और दूसरी तरफ अधिक से अधिक लोगों को लाभ पहुँचाना ! अधिकतम लाभ का सिद्धान्त तो मैंने भी पढ़ा है अर्थशास्त्र में । कहीं मेरी ईमानदारी से कोई चूक तो नहीं हो रही?
   मुझे अंदर से हिलता हुआ मानकर एक पड़ोसी धक्का देने की नीयत से बोला, ‘जब आदमी स्वस्थ होगा, तभी समाज व देश स्वस्थ होगा । आप न खाकर या कम खाकर अंततः देश का ही नुकसान करेंगे ।’
   ‘आप फाइल रख जाइए । मैं उसे बाद में देखता हूं ।’ इस बार साहब की आवाज आई थी । वह मुझे एक अभिभावक की तरह समझाते हुए बोले, ‘मुझे उम्मीद है कि आप अपनी अयोग्यताओं का परित्याग अवश्य करेंगे । ज्ञान जहाँ से मिले, आदमी को ग्रहण कर लेना चाहिए ।’
   कुछ देर बाद मैं सड़क पर खड़ा था । बाहर फैल चुका अंधेरा मुझे अपने आगोश में समेटने के लिए तेजी से मेरी ओर बढ़ने लगा ।

शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2016

खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचे

                   
   सिंहासन की ओर देखते-देखते आँखें पथरा गई हैं । युवराज सियार को तो बस खाट का ही सहारा है । खाट की हिमाकत इतनी कि वह उन्हें काट रही है । एक चादर भला कितनी सुरक्षा प्रदान कर सकती है । जिसका जन्म सिंहासन पर बैठने के लिए हुआ हो, वह खाट पर बैठे-यह सच्चाई क्या कम है कुछ चुभने-काटने के लिए । चादर सरक गई है, मगर युवराज को होश नहीं है । उनके मन में आँधियाँ चल रही हैं । चेहरा भी विध्वंस के प्रभाव को फैलाने में लगा हुआ है । उन्हें इंतजार है खबरी खरगोश का । उनके मन की चीजों को वही पहुँचा सकता है, तटस्थ रूप से आडियंस तक । अब जनता ही जनार्दन बनके फैसला करे ।
   तभी खबरी खरगोश अपने ताम-झाम के साथ पहुँचता है और तत्काल युवराज से मुखातिब होता है । ‘हाँ तो युवराज, खबर आ रही है कि सरकार के शल्य-प्रहार पर ही आपने अपना वाक्-प्रहार ठोंक दिया है । क्या यह खबर सही है?’
   ‘सौ फीसदी सही खबर है ।’ युवराज ने अपने कुर्ते की आस्तीन चढ़ाते हुए कहा, ‘हम क्या करते? सरकार ने हमें मजबूर कर दिया ।’
   ‘मगर शत्रु पर शल्य-प्रहार करने के लिए तो आप ही सरकार को ललकार रहे थे ।’ खबरी खरगोश तुरंत अपना प्रश्न दागता है । वह पूछता है, ‘क्या सरकार को कोसने और ललकारने के लिए आपने अपने प्रवक्ता घड़ियालों को मैदान में नहीं उतार रखा था? उस वक्त तो खूब ललकार-ललकारकर...’
   ‘हाँ, पर हमें क्या पता था कि सिंहासन पर बैठा जीव एकदम से फन्ने खाँ हो जाएगा ।’ युवराज बीच में ही बोल उठते हैं, ‘हम तो समझे थे कि हमारे पूर्वजों की तरह वह भी सफेद कबूतर बना रहेगा ।’
   ‘सफेद कबूतर बने रहने का मतलब...?’
   ‘हमारे पूर्वजों की बात और थी । समय दूसरा था, मगर यह तो फँसा हुआ था जनता के आक्रोश के बीच । हम ललकार जरूर रहे थे, पर दिल से चाहते थे कि वह हाथ पर हाथ धरे बैठा रहे और उसे कायर साबित किया जा सके ।’
   ‘तो क्या सरकार के शत्रु पर प्रहार और आपके खेमे में दुख के संचार के बीच कोई सम्बन्ध भी दिखाई देता है आपको?’ खबरी अगला प्रश्न दागता है ।
   ‘बाल की खाल तो खूब निकालते हो, पर यह मामूली बात भी समझ में नहीं आती । अरे, उसने शत्रु पर हमला नहीं बोला है, बल्कि हमारे भविष्य पर ही हमला बोल दिया है । वह परोक्ष रूप से हमें भी मारना चाहता है ।’
   ‘यह तो वही बात हुई कि आपका छोड़ा हुआ आप ही को तोड़ने लगा ।’ खरगोश चुटकी लेता है और अगला प्रश्न पूछता है, ‘आपके वाक्-प्रहार पर सोशल मीडिया में जमकर प्रहार हो रहा है । ऐसा क्यों होता है कि आपकी कही हर गलत बात को सही साबित करने के लिए आपके प्रवक्ता मैदान में कूद पड़ते हैं? क्या वे अभिशप्त हैं ऐसा करने के लिए?’
   ‘अभिशप्त नहीं, वरदान प्राप्त है उन्हें । यह उनका सौभाग्य है कि वे हमारी चरण-सेवा में हैं । हम न होते, तो वे भी न होते । इतने बरसों तक सत्ता का सुख लूटते रहे । यह हमारे परिवार के नाम के बिना कतई सम्भव नहीं था । आगे भी सुख लिखा होगा, तो हमारे ही...’
   ‘फिर भी आपका वक्तव्य क्या आपके खानदान के संस्कारों के अनुरूप है?’
   ‘सरकार बदल जाती है, तो संस्कार भी बदल जाते हैं । सत्ता से बाहर रहने के बावजूद हमीं से संस्कार और मर्यादा की अपेक्षा? युवराज लानत भरी निगाह डालते हैं खबरी खरगोश पर ।
   तभी खबरी कह उठता है, ‘आपके कहने का अभिप्राय यह है कि सत्ता से बाहर बैठे व्यक्तियों को मर्यादा और संस्कार के झमेले में नहीं पड़ना चाहिए । सत्ता में बैठे लोगों पर गलत-सही हमला ही असली संस्कार होना चाहिए । खैर, अंतिम प्रश्न आपसे । क्या वजह है कि हर बात का दोष आप सरकार के मुखिया पर ही थोपते हैं? मजदूर हो या मजलूम, किसान हो या जवान, दलित हो या पिछड़ा-सब की समस्याओं के लिए आप सिर्फ और सिर्फ सरकार के मुखिया को ही गाली देते हैं, जबकि दोष खुल्लम-खुल्ला प्रांतीय सरकारों का होता है ।’
   यह सुनते ही युवराज के चेहरे का रंग बदलकर एकदम लाल हो उठता है । जैसे किसी ने उनकी दुखती रग पर गरम तवा ही रख दिय़ा हो । वह खाट पर खड़े होकर चिल्लाते हैं, ‘सत्ता पर हमारा पुश्तैनी अधिकार था । हम हैं सिंहासन के एकमात्र स्वामी, जिस पर उस जीव ने कब्जा जमा लिया है, जिसे तुम सरकार का मुखिया कहते हो । वह अनधिकृत रूप से बैठा हुआ है हमारे सिंहासन पर । ऐसे में उसके लिए गाली नहीं निकलेगी, तो क्या प्रशंसा की ताली निकलेगी?’
   खबरी खरगोश को समझते देर नहीं लगती । वह आज आखिर पहुँचने में सफल हो गया लगता है युवराज के मन के भीतर । वह तो खिसियानी बिल्ली बने बैठे हैं । वह कैमरा पर्सन के साथ तेजी से भागता है स्टूडियो की तरफ । खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचे शीर्षक से जबर्दस्त टीआरपी-बटोरू मसाला तैयार है ।

शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2016

सेफ्टी-जूते और स्टार्ट-अप

                   

   शाम को पार्क में टहलते हुए शुक्ला जी मिल गए । आज रोज की तरह उनकी चाल में वह तेजी नहीं थी । सामना होते ही मैंने पूछा, ‘क्या बात है मान्यवर, आप तो जैसे पैसेन्जर ट्रेन हो लिए हैं आज?’
   उन्होंने मुझे ध्यान से देखते हुए कहा, ‘कोई बात नहीं है बन्धु । बस यूँ ही थोड़ा ध्यान भटक गया था ।’
   ‘कोई बात तो जरूर है, वरना आपकी ट्रेन तो किसी भी हाल्ट को धकेलते हुए आगे निकल जाती है ।’ मैंने बात को निकलवाने की एक और कोशिश की ।
   ‘बात तो ठीक है आपकी ।’ वह स्वीकार करते हुए बोले, ‘एक चीज है, जो मुझे चिंतित किए जा रही है ।’
   ‘ऐसा क्या?’ मैंने उनकी चिंता के साथ अपनी चिंता को जोड़ते हुए कहा, ‘क्या कोई पारिवारिक समस्या आन खड़ी हुई है?’
   ‘अरे नहीं-नहीं । मैं तो युवाओं की बात सोच रहा था ।’ उन्होंने अपने मन को थोड़ा खोलते हुए कहा ।
   ‘क्यों, युवाओं को क्या हो गया है भला ! भले-चंगे तो दिखते हैं मुझे ।’ मैंने अपने अनुभव को साझा करते हुए कहा ।
   ‘भले-चंगे दिखते जरूर हैं, पर उनकी अपनी चिंताएँ भी हैं । युवा चिंताग्रस्त रहें, यह देश के लिए चिंतित करने वाली बात है । है कि नहीं?’ कहते हुए उन्होंने अपनी नजरें मेरे चेहरे पर गड़ा दीं ।
   ‘बेशक, किन्तु उनकी चिंता है क्या?’
   ‘रोजगार की चिंता । चलिए, पहले आराम से किसी बेंच पर बैठते हैं, फिर इस पर सोच-विचार करते हैं ।’ कहते हुए वह एक बेंच की ओर बढ़ गए । मैं भी उनके पीछे-पीछे हो लिया ।
   ‘हाँ, रोजगार की चिंता तो है ही ।’ बेंच पर बैठते हुए मैंने बात को आगे बढ़ाई ।
   ‘सिर्फ रोजगार की ही चिंता नहीं है । चिंता यह भी है कि कौन सा उद्योग-धंधा किया जाए ।’
   अब जाके बात पूरी तरह समझ में आई थी मेरे । मैंने अपनी चिंता रखते हुए कहा, ‘पर हम लोग क्या कर सकते हैं । इस पर तो सरकार को सोचना चाहिए ।’
   ‘सरकार तो सोच ही रही है, बल्कि यूँ कहें कि उसने तो सोच भी लिया है ।’ वह तनिक आश्वस्त होते हुए बोले, ‘स्टार्ट-अप कार्यक्रम आखिर उसी ने तो शुरु किया है । इसके बावजूद युवाओं के सामने समस्या यह है कि वे कौन सा उद्योग शुरु करें...कौन सी ऐसी चीज बनाएँ, जिसकी देश में अच्छी डिमांड हो या निकट भविष्य में हो जाए ।’
   ‘यह तो सचमुच सोचने वाली बात है ।’ मैंने अपने चेहरे पर गम्भीरता के कुछ बादलों को जमाते हुए कहा ।
   ‘पर मैंने तो सोच भी लिया है । आज नेताओं को लेकर जिस तरह घृणा और गुस्सा बढ़ता जा रहा है, उसे ध्यान में रखते हुए कुछ चीजों की डिमांड भविष्य में खूब बढ़ने वाली है ।’
   ‘मैं कुछ समझा नहीं । आप बात को स्पष्ट तो कीजिए ।’
   ‘वही तो बता रहा हूँ । भविष्य में स्याही और जूते की डिमांड जबर्दस्त रूप से बढ़ने वाली है ।’ उन्होंने अपनी बात पर जोर देते हुए कहा ।
   ‘मगर स्याही और जूते ही क्यों?’ ‘वो इसलिए कि इनसे दोहरा लाभ है । नेताओं पर स्याही और जूते फेंक देने मात्र से फेंकने वाले का आक्रोश पिघल जाता है । वह चोट पहुँचाने के लिए ऐसा नहीं करता, बल्कि पोतना और उछालना ही उसकी नीयत होती है । लेकिन दिक्कत यह है कि आज न तो वैसी स्याही है और न ही जूते ।’
   ‘क्यों, दोनों तो मौजूद हैं बाजार में ।’ मैंने उन्हें याद दिलाने की कोशिश की ।
   ‘मौजूद हैं, मगर उद्देश्य की समुचित पूर्ति नहीं करते । अब बॉल-प्वाइंट पेन का जमाना है । उसकी स्याही निकालकर पोतने में खतरा यह है कि वह जितनी नेता को पोतती है, उससे कहीं अधिक पोतने वाले को पोत डालती है । इसलिए इस काम को अंजाम देने के लिए ‘सेफ्टी स्याही’ की जरूरत है ।’
   ‘चलिए मान लिया, पर जूतों की क्या कमी है? एक खोजिए, दस मिलते हैं ।’
   ‘बेशक मिलते हैं, पर वे उछलने के बाद हिंसा के दूत बन जाते हैं । ऊपर से उनकी बनावट ऐसी है कि उछलते हैं दिल्ली के लिए, किन्तु हवा के प्रतिरोध के चलते लक्ष्य-संधान करते हैं मुम्बई में । जूते ऐसे होने चाहिए, जो सटीक लक्ष्य-संधान करें । इसलिए ‘सेफ्टी-शू’ का निर्माण एक चोखा धंधा है आने वाले समय में ।’

   ‘सचमुच, काफी चिंतन किया है आपने इस मसले पर । युवाओं को निश्चय ही इस पर विचार करना चाहिए । आखिर उनके भविष्य का सवाल जो ठहरा ।’ कहते हुए मैं बेंच से उठ खड़ा हुआ । वह भी तेज गति से मेरे पीछे लपके । अब हम दोनों समान चाल से पार्क की दूसरी ओर बढ़ रहे थे ।

शुक्रवार, 19 अगस्त 2016

एक नॉन-वीआईपी कुत्ते का खोना

                
   ‘क्या हुआ कुत्ते का, मिला कि नहीं अभी तक? कंपनी बाग में टकराते ही एक नव-निर्मित मित्र ने पूछा । सुबह-सुबह की सैर में एक-दूसरे की खैर पूछते-पूछते हम वाकिंग फ्रेंड बन गए थे । उनका इशारा हमारे उस कुत्ते की तरफ था, जो तीन-चार रोज पहले हमसे बिछड़ गया था । सुबह का लगभग यही समय था । अपनी दीर्घ पीड़ा मिटाने के लिए उधर घनी झाड़ियों की ओर गया था । अपनी पीड़ा मिटाते-मिटाते हमें पीड़ा दे गया । राह देखने का कोई प्रतिफल न मिला । संगी-साथियों ने बताया कि जरूर किसी ने उसे तड़ी पार कर दिया होगा । कुत्ते के लिए फिरौती मांगना तो अभी फैशन में नहीं है, अतः ज्यादा गुंजाइश है कि उसे बेच दिया जाए । यह आपके किसी दुश्मन की चाल भी हो सकती है ।
   ‘कहाँ मिला ।’ मैंने मायूसी भरे स्वर में जवाब दिया, ‘अभी तो कल जाके पुलिस ने रपट दर्ज किया है । दौड़ाते-दौड़ाते थका मारा । मुठ्ठी गर्म हुई, तब रपट दर्ज हुई ।’
   ‘कहना तो नहीं चाहता, पर कहे बिना रहा भी नहीं जाता ।’ मित्र अपना चेहरा लटकाते हुए बोले, ‘मुझे नहीं लगता कि आपका कुत्ता अब मिल पाएगा । उसे सदा के लिए भूल जाना ही आपके लिए अच्छा रहेगा ।’
   ‘पर मुझे उम्मीद है कि मेरा कुत्ता अवश्य मिल जाएगा ।’ उनके कहने के बावजूद मैंने आशा की डोर को छोड़ना उचित नहीं समझा ।
   ‘किस बूते आप इतनी उम्मीद रखते हैं? क्या आपका कुत्ता वीआईपी कोटे में आता है?’ यह कहकर उन्होंने मुझे झटका दिया ।
   ‘अजी, आप भी मजाक करने लगे । हम आम लोग ठहरे । हमारा कुत्ता वीआईपी कैसे हो गया !’ हमने अपनी स्थिति को कबूल करते हुए कहा ।
   ‘वही तो हम भी कहना चाहते हैं । उधर एक भूतपूर्व मंत्री का कुत्ता खोया हुआ है । उनकी पत्नी ने चुनौती भी दी है पुलिस को ढूँढने की, पर वह अभी तक नहीं मिला है । ऐसे में सोचिए कि आपके कुत्ते का क्या होगा ।’
   ‘बात तो ठीक है आपकी, किन्तु पुलिस तो सबकी रक्षा के लिए है ।’ मैंने प्रतिवाद करने की कोशिश की ।
   ‘लगता है आपने संविधान और कानून को ठीक से जानने का प्रयास कभी नहीं किया । पुलिस वीआईपी चीजों की रक्षा के लिए है । अगर समय बचे, तो आम लोगों पर एहसान किया जा सकता है ।’
   ‘आपका यह कहना भी ठीक है ।’ हमने उनकी बात को स्वीकार करते हुए कहा, ‘पर क्या वीआईपियों के लफड़े इतने बढ़ गए हैं कि...
   ‘बात इतनी भी नहीं है । सारे वीआईपियों की बात तो आप छोड़ ही दीजिए । पुलिस अब केवल सरकार की जागीर है । उसका काम सरकारी वीआईपी को जूते पहनाना तथा विपक्षी वीआईपी को जूते मारना हो गया है ।’
   ‘वह तो ठीक है, पर हमारा कुत्ता...’
   ‘फिर कुत्ता-रटन्त,’ वह तनिक चिढ़ते हुए बोले, ‘भूतपूर्व मंत्री को भी एहसास हो गया है कि कुत्ता उन्हें मिलने से रहा और इधर आप हैं कि कुत्ता-रटन्त किए जा रहे हैं ।’ उनके स्वर में झल्लाहट थी ।
   ‘कैसे भूल जाऊँ? कुत्ता अपना है । सरकार अपनी है । पुलिस अपनी है । सब कुछ तो अपना है ।’
   ‘भ्रम भी अपना है ।’ वह मेरे कंधे पर हाथ रखकर सांत्वना देने वाले स्वर में बोले, ‘भ्रम से बाहर निकलिए । पीड़ा से छुटकारा मिलेगा ।’
   ‘कैसे बाहर निकलूँ? पुलिस जब भैंस को ढूँढ सकती है, तो उसे कुत्ते को ढूँढने में क्या समस्या है?’
   ‘आप समस्या की बात करते हैं? समस्या एक हो, तो बताऊँ । सबसे पहले, पुलिस का काम भैंस ढूँढना ही है । दूसरे, वह भैंस ढूँढने के लिए ही प्रशिक्षित है । तीसरे, भैंस ढूँढने का उसके पास अपार अनुभव भी है । वह अपनी कुशलता, तेजी और कर्त्तव्य-निष्ठा का परिचय कई मौकों पर दे चुकी है ।’
   ‘पर मेरे कुत्ते के लिए उसकी तेजी...’
   ‘अब तो एक ही रास्ता है । पुलिस कुत्ते को खोजे, इसके लिए जरूरी है कि वह वीआईपी ही न हो, बल्कि सरकारी भी हो । आप तत्काल जुगाड़ के घोड़े दौड़ाना शुरु कर दीजिए ।’

   इतना कहकर वह अपनी राह हो लिए । मैं मूर्ख की तरह उनके पैरों से उड़ती धूल को देखता रह गया ।

मंगलवार, 9 अगस्त 2016

मुफ्त की मौत से मधु की मौत भली

           
   सुबह-सुबह जब पड़ोसी दरवाजे पर दस्तक देता है, तो मस्तक में अजीब-अजीब से झटके गुलाटियाँ मारने लगते हैं । अब कौन-सा लफड़ा मोल लेने आया है मुझसे? मगर मैंने तो उसे उकसाने के कोई जतन नहीं किए पिछले दिनों । जरूर किसी तीसरे पड़ोसी ने पंगा लिया होगा, प्रत्यक्ष या परोक्ष । मुँह से बोलकर पंगा लिया तो क्या लिया, लेने वाले तो बिना बोले ही पंगा ले लेते हैं-अपने हस्त-व्यवहार से, नजरों की कटार से, हँसी की तलवार से, मौन की मार से, बे-बात जश्न के वार से ।
   दरवाजा खुलते ही उन्होंने मुझे ठेलते हुए एक तरफ हटाया और लपककर सोफे पर पसर गए । सच्चा पड़ोसी अंदर आने की अनुमति नहीं मांगता । यह तो पड़ोसी-शास्त्र द्वारा प्रदत्त उसका मौलिक अधिकार होता है । एक अच्छे पड़ोसी की तरह मुझे भी बैठने का इशारा करते हुए बोले, ‘जी सुना आपने, अपने उस पड़ोसी के तो खूब मौज-मजे हैं आजकल । पक खूब रहा है घर में पुलाव-खयाली, दिन में है होली तो रात दीवाली ।’ कहते-कहते दुख के पतनाले खुलने लगे थे चेहरे की दरो-दीवार में ।
   ‘यह तो अच्छी खबर है । हमें भी उनके साथ जश्न में शरीक होना चाहिए ।’ मैंने चहकते हुए कहा ।
   ‘बेशक शरीक होइए, मगर यह तो जान लीजिए कि जश्न की बुनियाद क्या है ।’ मेरी आँखों में आँखें गाड़ते हुए कहा था उन्होंने ।
   ‘जी कुछ सुना जरूर है । शायद सरकार आई थी उनके घर ।’ अपने ललाट को खुजलाते हुए मैं इतना ही बता सका ।
   ‘खैर, उस बात को आप पेंडिंग में डालिए कुछ समय के लिए । आप तो बस इतना बतलाइए कि कभी पार्टी-शार्टी का मजा लिया है जीवन में ।’ उनकी आवाज में अचानक एक रहस्य घुसपैठ कर गई थी ।
   ‘हाँ जी, कई बार किया है । अभी पिछले ही दिनों पप्पू के हैप्पी बर्थ डे में...’
   ‘अरे वो वाली नहीं ।’ उन्होंने बीच में ही मुझे बाधित करते हुए कहा, ‘वो भी कोई पार्टी है भला, जहाँ म से मधु न हो और झ से झूमना न हो ।’
   ‘तौबा-तौबा, आप भी कहाँ की-कैसी बात लेकर बैठ गए ।’ अचानक उछल पड़ा था मैं । नासिका अंगुलियों के द्वारा बंद होते चले गए थे ।
   वह कुछ देर तक मेरे हाव-भाव को घूरते रहे । फिर गंभीर स्वर में बोले, ‘जीवन तो लगता है कि निरर्थक बीत ही गया आपका । अब अपनी मौत को भी निरर्थक बनाना चाहते हैं । हटाइए हाथ अपने नाक से ।’
   ‘मैं कुछ समझा नहीं ।’
   ‘अपना वो पड़ोसी मधु-सेवन करते-करते मर गया । खूब सियापा मचा । बात सरकार के कानों तक पहुँची । सुनते ही सरकार इतनी खुश हुई कि उसे पाँच लाख का ईनाम दे दिया ।’
   ‘मैं अब भी कुछ समझा नहीं ।’ कहते हुए मैंने मूर्ख-सा मुखड़ा बनाया अपना ।
   ‘खैर, मैं बतलाता हूँ । सरकार एक तीर दो निशाने लगाना चाहती है । मधु का उत्पादन होगा, तो रोजगार बढ़ेगा । सरकार की कमाई होगी । पुलिस की उगाही होगी । जनता की भी भलाई होगी । दूसरी तरफ, मधु से मौत का दरवाजा खुलेगा । बढ़ती आबादी पर लगाम लगेगा । सरकार के पैसे से प्रोत्साहन मिलेगा । मुफ्त की मौत से मधु की मौत भली ।’
   ‘वाह, क्या सोचा है आपने ।’ मेरे मुँह से बेसाख्ता निकल पड़ा । हालांकि मैं यह नहीं समझ पाया कि उनकी प्रशंसा कर रहा हूँ या व्यंग्य के बोल छोड़ रहा हूँ ।
   वह अपनी रौ में बोलते चले गए, ‘मुझे तो भविष्य का वह दृश्य भी दिखाई दे रहा है । सनातन-धर्मी पिता शय्या पर अंतिम साँसें गिन रहा है । कंठ में गंगा-जल और तुलसी-पत्र डालने की बजाय मुद्रा-धर्मी सन्तान मधु की मधुरता उड़ेल रही है । मुख में मधु होगा, तभी सरकार को यकीन होगा । जाने वाले को तो जाना ही है, थोड़ी जल्दी सरक लेगा, तो क्या जाएगा उसका । कम-से-कम पीछे छूट जाने वालों के लिए तो मधु की मलाई की गारंटी हो जाएगी ।’

   सुनते ही यह मेरी आँखें चौड़ी होती चली गई थीं और मुख एक बार खुला, तो खुला ही रह गया । पड़ोसी धर्म का निर्वाह करते हुए मुझे इसी अवस्था में छोड़ वह सरक लिए थे ।

मंगलवार, 19 जुलाई 2016

...जब बिजली कड़की अपने छप्पर

          
   ‘आप पत्रकार लोग भी तिल का ताड़ बनाने के उस्ताद होते हैं ।’ उन्होंने मुझे देखते ही ताना मारा ।
   ‘पर आतंकवाद को आप तिल कदापि नहीं कह सकते । वह तो कब का ताड़ बन चुका है ।’ मैंने प्रतिवाद करने की कोशिश करते हुए कहा । दरअसल इस वक्त मैं एक बुद्धिजीवी के सामने खड़ा था । उनके बारे में केवल मैं ही नहीं, पूरा समाज जानता है कि वह बुद्धिजीवी हैं, क्योंकि उलट-खोपड़ी रखने वाला व्यक्ति बुद्धिजीवी ही होता है । उन्हें बुद्धिजीवी न मानने वाले विरोधी भी मानते हैं कि वह बुद्धिजीवी हैं, क्योंकि जुगाड़ भिड़ाकर अब तक तकरीबन आधे दर्जन पुरस्कारों को अपने ड्राइंग-रूम के शीशे की आलमारी में कैद कर चुके हैं । अपने स्वार्थ के बाधित होने पर चिल्लाना और सामाजिक हित के मुद्दे पर आपराधिक चुप्पी साध लेना उन्हें बुद्धिजीवी ही साबित करते हैं ।
   ‘ताड़ तो आप लोगों ने बनाया है आतंक-आतंक चिल्लाकर ।’ उन्होंने मेरी आँखों में आँखें गाड़ दीं और आक्रोश भरे स्वर में बोले, ‘कभी जानने की कोशिश की है आतंक के पीछे की मजबूरी? क्या आपने कभी सोचा है कि आतंक के पीछे मासूमियत का एक कोमल चेहरा तैर रहा होता है?’
   ‘मैं समझा नहीं आप कहना क्या चाहते हैं? निपट मूर्ख की तरह मुँह बनाते हुए मैंने पूछा, ‘क्या आतंक का मासूम चेहरा भी होता है?’
   ‘आतंक के पीछे मासूमियत-ही-मासूमियत है । मुद्दा आतंकवाद नहीं है । मुद्दा तो यह है कि मासूम और निर्दोष लोग आतंकवादी क्यों बनते हैं । सरकार मनमानी न करे, तो कोई समस्या ही नहीं होगी । यह तो सरकार ही है, जो आतंकवाद फैला रही है । मुद्दा वास्तव में सरकारी आतंकवाद का है ।’
   ‘पर मार-काट को आप मासूमियत से भरा कैसे कह सकते हैं?’
   ‘अपने मानवाधिकार की रक्षा के लिए शस्त्र उठाना ही पड़ता है । सरकार हर जगह मानवाधिकारों का उल्लंघन कर रही है । ऐसे में जो मानव होगा, वह अवश्य उठ खड़ा होगा ।’ कहते-कहते उनके चेहरे पर आक्रोश के भाव उभर आए थे ।
   ‘मगर अपने मानवाधिकारों की रक्षा के लिए किसी को भी मार डालना मानव का नहीं, दानव का काम है ।’ मैं भी तनिक तैश में आ गया था यह कहते-कहते ।
   ‘मैंने कहा न कि मानवाधिकार की रक्षा मानव का धर्म है और धर्म-रक्षार्थ शस्त्र उठाना पूर्णतः न्यायसंगत है । इस धर्म-कार्य में यह नहीं देखा जाता कि अपना मर रहा है या पराया ।’
   ‘आप आतंकवाद को मानवाधिकार से बाहर भी कहीं देखते हैं? क्या आपको नहीं लगता कि आजकल आतंकवादी कुछ ज्यादा ही मानवाधिकारों की रक्षा में रेल-पेल हुए जा रहे हैं?’
   ‘हाँ, कुछ लोग जरूर पथ से भटक गए हैं, पर उन्हें मारकर सही रास्ते पर नहीं लाया जा सकता । समझाना-बुझाना ही सर्वोत्तम नीति है ।’
   ‘जो मानने को तैयार न हो और दहशत फैलाना ही जिसका लक्ष्य व धर्म हो...’
   ‘उसे भी समझाना ही चाहिए । आपको याद रखना होगा कि अधिकांश ऐसे लोग नौजवान हैं । नौजवानों को कोई सरकार कैसे मार सकती है?’
   ‘आतंकवादी तो आतंकवादी है..क्या बूढ़ा, क्या नौजवान ! उसे मार डालना ही उचित है, बनिस्बत कि उसे तंदूरी चिकेन और बिरयानी खिलाया जाए ।’
   ‘आप सरकार और मूर्ख की भाषा बोल रहे हैं । मृत व्यक्ति जीवित से ज्यादा खतरनाक होता है । आदमी भूत से मुकाबला नहीं कर सकता ।’ इतना कहकर वह चुप हो गए । तभी स्टूडियो से निर्देश आने लगा था । शहर में आतंकवादी हमला हुआ था और मुझे तत्काल वहाँ पहुँचना था । मुझे यह भी जानकारी दी गई कि इस बुद्धिजीवी का पुत्र भी हमले में बुरी तरह घायल है और उसे अस्पताल ले जाया गया है ।
   यह खबर पाते ही उनका आश्वस्ति-भाव तिरोहित हो गया अचानक और वह किसी ज्वालामुखी की तरह फट पड़े । चीखते हुए बोले, ‘आखिर सरकार कर क्या रही है... इन्हें देखते ही मार क्यों नहीं डालती?’ और वह अस्पताल की तरफ भागने लगे थे...बेतहाशा ।

   मैं भी पीछे-पीछे दौड़ा । मैं उनसे कहना चाहता था कि जब अपने पर बीतती है, तब असलियत समझ में आती है, अन्यथा बुद्धि की कैंची चलाना कितना आसान होता है । मगर ऐसा कुछ कहने का यह वक्त नहीं था, क्योंकि कुछ और होने से पहले मैं एक मनुष्य था ।

मंगलवार, 28 जून 2016

एक झुठक्कड़ की तलाश है

                 

   दरबार-ए-खास में विशेष सन्नाटा था । महाराज सियार और उनके दो-चार सेवकों के अलावा वहाँ कोई नहीं था । महाराज ने सभी मंत्रियों को विलंब से आने का आदेश दिया था । इस वक्त उन्हें इंतजार था किसी का । न जाने कितनी बार सिंहासन पर पहलू बदल चुके थे । तभी खबरी खरगोश तेजी से दरबार-ए-खास में प्रवेश करता दिखाई दिया था । महाराज की मुख-मुद्रा पर एक मुस्कान-सी बिखर गई और इंतजार व बेचैनी के भाव तेजी से तिरोहित होते चले गए ।
   सिंहासन के निकट पहुँचकर खबरी खरगोश घुटनों तक झुका और महाराज से मुखातिब होते हुए बोला, ‘महाराज की जय हो, सुना है कि महाराज को इस नाचीज खबरी का इंतजार है ।’
   ‘हम बड़ी देर से प्रतीक्षा कर रहे हैं तुम्हारी । तुम हो कि पता नहीं कहाँ गुम हो गए थे । पर चलो, आ तो गए आखिर ।’ कहते हुए एक लम्बी साँस ली महाराज ने । चेहरे पर प्रसन्नता बरकरार थी ।
   ‘फरमाइए महाराज, क्या सेवा है मेरे लिए?’ सिर फिर झुका था उसका ।
   ‘बहुत ही खास काम है खबरी । मैं तुम्हें एक विशेष मिशन पर भेजना चाहता हूँ । मुझे योग्यतम झुठक्कड़ की तलाश है और इसके लिए तुम पूरे जंगल को छान मारो । जो भी खर्चा-पानी चाहिए, खजाने से ले लो ।’
   इतना सुनते ही खबरी खरगोश को झटका-सा लगा । ‘पर हुजूर, झूठ तो बुरी चीज है । आपने कथाओं में सुना ही होगा कि झूठ की पोल खुलने पर लोग चेहरा छिपा लेते थे, पतली गली से निकल जाते थे या फिर धरती मैया से याचना करते थे कि वह फट जाए और वे उसमें समा जाएं ।’
   ‘तुम सतयुग की बात करते हो खबरी, पर यह मत भूलो कि इस वक्त तुम हमारे दरबार में खड़े हो ।’
   ‘सत्य ही कहा महाराज ने । सतयुग तो बहुत पीछे छूट गया ।’ एक निःश्वास छोड़ते हुए खबरी खरगोश बोला, ‘जान की अमान हो, तो एक बात और कहूँ हुजूर । वो क्या है कि शास्त्र भी इसे अच्छा नहीं मानते । एक संत ने कहा है-साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप ।’
   यह सुनते ही महाराज सियार को हँसी आ गई । वह ठठाकर हँसते हुए बोले, ‘तुम्हें अपडेट होने की सख्त जरूरत है खबरी । तुम वो पुराना वाला वर्जन लेकर घूम रहे हो । नया वर्जन इस तरह है-झूठ बराबर तप नहीं, साँच बराबर पाप ।’
   ‘क्या सचमुच ऐसा ही है?’ ‘बिल्कुल ऐसा ही है । क्या तुम कह सकते हो कि मैं झूठ बोलता हूँ?’
   खरगोश उछला, ‘नहीं-नहीं महाराज, राजा झूठ कहाँ बोलता है ! फिर भी झुठक्कड़ की तलाश वाली बात समझ में नहीं आई ।’
   ‘तुम बस इतना समझो कि मुख्य रूप से सरकार को अब दो ही काम करना है । नकली काम का रेखाचित्र खींचना और उसका ढिंढोरा पीटना ।’
   ‘पर महाराज, झुठक्कड़ के तलाश की क्या जरूरत है? आप के पास तो एक से बढ़कर एक झूठ बोलने वाले मंत्री-रत्न हैं ।’
   ‘तुम्हारा कहना मुनासिब है खबरी, पर ऐसा झूठ किस काम का, जिसे विपक्षी सूँघ लें...जनता ताड़ ले । जब हम नगाड़ा बजाते हैं, तो नेपथ्य से झूठ-झूठ की आवाजें आने लगती हैं । ऐसा झूठ भी कोई झूठ है लल्लू !’
   कुछ देर रुककर महाराज फिर बोले, ‘नगाड़ा विभाग तो अच्छी तरह नगाड़े बजा रहा है, पर झूठ-विकास विभाग को अभी भी एक योग्य व्यक्ति की तलाश है, जो तकनीक का उस्ताद हो और सदा अपने को अपडेट रखता हो ।’

   अब खबरी खरगोश को समझते देर नहीं लगती कि सरकार को लम्बी अवधि तक चलाने के लिए लाल बुझक्कड़ की तरह लाल झुठक्कड़ की कितनी जरूरत है । झूठ चलेगा, तभी सरकार चलेगी । वह तेजी से सरकारी मिशन पर निकलता है । 

शुक्रवार, 24 जून 2016

भैंस नहीं...अबकी बार, गुम है सरकार

  सरकार चीख-चीखकर बता रही है कि वह गाँव तक पहुँच चुकी है उसका चीखना लाजिमी है, क्योंकि जनता अमूमन बहरी होती है धीरे की बात सुन लेती, तो नगाड़ा बजाने की जरूरत ही नहीं पड़ती खैर, वह आई तो आई कैसे? न एअरोप्लेन दिखाई दिया, न रेलगाड़ी आई, न चमचमाती लग्जरी गाड़ियां, न ही फौजी हेलीकॉप्टर । न इक्का-तांगा आया, न कोई बैलगाड़ी आई, न कोई टेम्पू आया, न ही रिक्शे की सवारी आई । न कोई साइकिल दिखाई दी, न कोई हाथी मतवाली चाल से चलती हुई आई । न पालकी को ढोने वाले कहार दिखाई दिए, न कोई पैदल चप्पल घसीटता हुआ आया । हवा भी आई, तो अपने साथ धूल-अंधड़ ही लाई ।
  फिर भी सरकार आ गई है । जनता काहिल और जाहिल इसीलिए कहलाती है, क्योंकि वह सरकार का आना ताड़ ही नहीं पाती है । ऐसी जनता किस काम की, जो सरकार को ही न देख सके । मैं उसे ढूँढने लगा । सूखे खेतों में देखा, खाली खलिहानों में देखा । फटी धरती-सी रूखे और खुरदरे चेहरे वाले लोग ही दिखाई दिए । यहाँ सरकार हरगिज नहीं हो सकती । हरियाली और सूखे का भला क्या मेल !
   मैंने उसे कुओं में झांका, पोखरों-तालाबों में देखा, नदी-नालों में देखा, हर गहराई में देखा, पर वह दिखाई नहीं दी । रास्तों-पगडंडियों पर देखा, गलियों-चौबारों में देखा, नुक्कड़ पर देखा, नाकों-सरहदों पर देखा । अमीर की हवेली में देखा, गरीब की झोपड़ी में देखा । घरों के कोनों में देखा, भात के दोनों में देखा । चाय की कुल्हड़ और बच्चों की हुल्लड़ में देखा । ताले-तिजोरी में देखा, लोगों की फटी जेबों में देखा । टूटी खटिया व पलंग पर देखा । हतभाग्य, सरकार कहीं नहीं दिखी ।
   राशन की दुकान पर खोजा । वहाँ कुछ दिखाई दिया । एक आदमी दो दिनों से बच्चों के भूखे होने की दुहाई देकर अनाज मांग रहा था और दुकानदार उसकी गर्दन में हाथ लगाकर बाहर धकिया रहा था । कुछ आगे सड़क के एक शानदार गड्ढे में दो-चार लोग गिरे पड़े थे । जरूर वहाँ सरकार होनी चाहिए, तभी तो लोग खुशी-खुशी उसमें...अफसोस ! चौराहे पर मैंने पूछा, ʻसरकार को तुमने देखा है कहीं
  अभी तो आया था,’ लोगों ने जवाब दिया,चुनाव सिर पर है । अतः कमजोरों के वोटर कार्ड जमा करवा रहा है...सुरक्षा के लिए ।’ अब इसमें उनकी सुरक्षा है या नेता की...सरकार ही जाने ! ( दरअसल यह सरकार इलाके के खुर्राट नेता का खास आदमी है ।)

   सचमुच सरकार लापता हो गई है । जो खुद लापता हो, वह अपना पता भला किस तरह बता सकती है । इसके बावजूद वह बता रही है, तो सच ही बता रही होगी । सरकार सच ही बोलती है । सच तो सच होता ही है, उसका झूठ भी सच ही माना जाता है । पर आम जनता के लिए दिक्कत यह है कि वह सरकार को अपनी दुनियावी आँखों से नहीं देख पा रही है । अतः सरकार उसके लिए लापता ही हुई न ! भैंस लापता हुई थी, तो पुलिस और प्रशासन ने उसकी तलाश में रात-दिन एक कर दिया था । तभी नासमझ जनता को यह भी पता चला था कि पुलिस कितनी कर्मठ चीज होती है । पर आज सरकार को ढूँढने के लिए कोई आगे नहीं आया, एकदम शांति छाई हुई है ।...आखिर इतना सन्नाटा क्यों है भाई !
Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...

लोकप्रिय पोस्ट