जीवन व समाज की विद्रुपताओं, विडंबनाओं और विरोधाभासों पर तीखी नजर । यही तीखी नजर हास्य-व्यंग्य रचनाओं के रूप में परिणत हो जाती है । यथा नाम तथा काम की कोशिश की गई है । ये रचनाएं गुदगुदाएंगी भी और मर्म पर चोट कर बहुत कुछ सोचने के लिए विवश भी करेंगी ।

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गुरुवार, 16 फ़रवरी 2017

काम बोलता है...

                              
    पिछली बार भइया जी जब सत्ता में आए थे, तो अपने सारे नेताओं को निर्देश निर्गत किया था कि वे प्रत्येक कम से कम एक महंगी गाड़ी अवश्य ही हस्तगत कर लें । पूछने पर बताया था कि ऐसा दो कारणों से नितांत आवश्यक था । एक, नेता से लेकर आम जनता तक यह संदेश जाए कि सत्ता कोई सस्ती आइटम गर्ल नहीं है, जिसे कोई भी नचा ले । दो, विकास को रफ्तार दिया जा सके । गाड़ियाँ और गाड़ियों में नेता विकास के ज्वलंत उदाहरण हैं । इस बार उनका सपना है कि विकास को चौगुनी मात्रा और चौगुनी रफ्तार से जनता तक लेकर जाया जाए । इसके लिए जरूरी है कि कम से कम चार महंगी नई गाड़ियाँ एक नेता को प्राप्त हों । विकास जब नंगी आँखों से दिखाई देता है, तभी जनता यकीन करती है ।
    भइया जी का दावा है कि उन्होंने काम इतना किया है कि गणेश जी की कलम भी लिखते-लिखते थक जाए । काम बोले तो...विकास, विकास और केवल विकास । जिधर देखिए, उधर विकास की नदी प्रवाहित हो रही है । यह अलग बात है कि प्रकृति प्रदत्त नदियाँ या तो सूख रही हैं, या विकास की गंदगी से जूझ रही हैं, या जिनके प्रवाह येन-केन-प्रकारेण बाधित हो रहे हैं ।
    हम भी भइया जी के काम को खुर्दबीन से खोजते हुए उनके शानदार बंगले तक पहुँच गए । हमें देखते ही वह खदबदा उठे । कैमरे की नजर अपने ऊपर महसूस करते ही बोले, ‘सुना है कि हमारे सारे विरोधी बह गए हमारे विकास की दरियाओं में?’
    ‘कौन सी विकास की बात करते हैं आप?’ हमने पूछा, ‘हम तो ढूँढ़ते आ गए आपके घर तक, पर हमें तो कुछ नहीं दिखा ।’
    ‘कमाल करते हैं आप भी । चारों तरफ हमारा ही काम बिखरा पड़ा है । क्या उन कामों ने आपसे कुछ नहीं कहा?’ वह थोड़ा आक्रामक होते हुए बोले ।
    ‘रास्ते में तो हमें कोई काम नहीं मिला । इसीलिए हम जानना चाहते हैं कि आपने कौन-कौन सा काम किया?’ हमने माइक उनके मुँह के आगे कर दिया ।
    ‘जब काम हजार हों, तब उन्हें गिनवाने की गलती कोई समझदार इंसान कर सकता है भला? न हम उतना बोल पाएंगे, न आप उतना सुन पाएंगे ।’
    ‘चलिए, मान लेता हूँ कि यह संभव नहीं है । पर दस काम तो आप निश्चय ही गिनवा देंगे ।’ मैंने उनके आगे हथियार...मतलब माइक डालते हुए कहा ।
    ‘अपने मुख मियाँ मिठ्ठू बनना हम नहीं चाहते ।’ वह आत्म-मुग्ध होते हुए बोले, ‘हम अपने मुख से अपने काम का बखान क्यों करें, जब हमारा काम खुद बोल रहा हो । आप आँख बंद करके देखिए, हमारा काम हर तरफ दिखाई दे रहा है । कान बंद करके सुनिए, उसी की गूँज है चारों ओर ।’
    आँख बंद करते ही हमें अँधेरे के सिवा कुछ भी दिखाई नहीं दिया । अँधेरे से डर या डिस्टर्ब होकर हमने आँखें खोल दीं और पुनः काम पर चले आए । अपने काम को बढ़ाते हुए उनके काम के बारे में पूछा, ‘आप बताना नहीं चाहते, तो न सही । कम से कम दो काम तो गिनवा दीजिए, जो आपकी नजर में बहुत ऊँचा स्थान रखते हों ।’
    ‘देखिए, मेरे काम मेरी संतानों के समान हैं । कोई भी आदमी केवल दो की गिनती करवाकर बाकी को नालायक या नाजायज नहीं कह सकता । उसके लिए तो उसकी सभी संतान समान महत्व के होते हैं । अतः हम अपने दो कामों को गिनवाने की भूल कतई नहीं कर सकते । वैसे भी काम करने वाला इन गिनतियों के फेर में नहीं पड़ता ।’
    हम उनकी भावनाओं की कद्र करते हुए उनके द्वारा किए गए केवल दो कामों से पुनः पीछे हट गए और उन्हें उनकी महानता का लाभ देते हुए केवल एक पर आ टिके । मुख पर मुस्कान लाकर हमने पूछा, ‘कोई बात नहीं । आप केवल एक काम का नाम बता दीजिए, जो आम जनता की नजरों में भी काम ही हो ।’
    एक सुनते ही वह अनेक हो गए । वह इतनी जोर से हम पर चिल्लाए कि उनके  ही आदमी चारों तरफ । मैं एक, वह अनेक । हथियार ही हथियार । उनके हाथों में काम, मेरे मुँह में राम । वह मेरी आँखों में आँखें डालते हुए बोले, ‘एक...केवल एक काम पूछकर हमारा अपमान करने की तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई? क्या तुम्हें अभी भी सुनाई नहीं दे रही हमारे कामों की आवाज?’
    शायद पहली बार मुझे उनके बोलते काम दिखाई दिए थे । मैंने उनसे झूठ नहीं कहा कि उनके काम सचमुच बोलते हैं । मेरी आँखों में आगे के कामों के चित्र तथा कानों में उनकी आवाजें सिमटने लगे थे । शक काफूर हो चला था । अब उसका स्थान यकीन लेता गया था...चौगुनी रफ्तार से ।

शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2016

खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचे

                   
   सिंहासन की ओर देखते-देखते आँखें पथरा गई हैं । युवराज सियार को तो बस खाट का ही सहारा है । खाट की हिमाकत इतनी कि वह उन्हें काट रही है । एक चादर भला कितनी सुरक्षा प्रदान कर सकती है । जिसका जन्म सिंहासन पर बैठने के लिए हुआ हो, वह खाट पर बैठे-यह सच्चाई क्या कम है कुछ चुभने-काटने के लिए । चादर सरक गई है, मगर युवराज को होश नहीं है । उनके मन में आँधियाँ चल रही हैं । चेहरा भी विध्वंस के प्रभाव को फैलाने में लगा हुआ है । उन्हें इंतजार है खबरी खरगोश का । उनके मन की चीजों को वही पहुँचा सकता है, तटस्थ रूप से आडियंस तक । अब जनता ही जनार्दन बनके फैसला करे ।
   तभी खबरी खरगोश अपने ताम-झाम के साथ पहुँचता है और तत्काल युवराज से मुखातिब होता है । ‘हाँ तो युवराज, खबर आ रही है कि सरकार के शल्य-प्रहार पर ही आपने अपना वाक्-प्रहार ठोंक दिया है । क्या यह खबर सही है?’
   ‘सौ फीसदी सही खबर है ।’ युवराज ने अपने कुर्ते की आस्तीन चढ़ाते हुए कहा, ‘हम क्या करते? सरकार ने हमें मजबूर कर दिया ।’
   ‘मगर शत्रु पर शल्य-प्रहार करने के लिए तो आप ही सरकार को ललकार रहे थे ।’ खबरी खरगोश तुरंत अपना प्रश्न दागता है । वह पूछता है, ‘क्या सरकार को कोसने और ललकारने के लिए आपने अपने प्रवक्ता घड़ियालों को मैदान में नहीं उतार रखा था? उस वक्त तो खूब ललकार-ललकारकर...’
   ‘हाँ, पर हमें क्या पता था कि सिंहासन पर बैठा जीव एकदम से फन्ने खाँ हो जाएगा ।’ युवराज बीच में ही बोल उठते हैं, ‘हम तो समझे थे कि हमारे पूर्वजों की तरह वह भी सफेद कबूतर बना रहेगा ।’
   ‘सफेद कबूतर बने रहने का मतलब...?’
   ‘हमारे पूर्वजों की बात और थी । समय दूसरा था, मगर यह तो फँसा हुआ था जनता के आक्रोश के बीच । हम ललकार जरूर रहे थे, पर दिल से चाहते थे कि वह हाथ पर हाथ धरे बैठा रहे और उसे कायर साबित किया जा सके ।’
   ‘तो क्या सरकार के शत्रु पर प्रहार और आपके खेमे में दुख के संचार के बीच कोई सम्बन्ध भी दिखाई देता है आपको?’ खबरी अगला प्रश्न दागता है ।
   ‘बाल की खाल तो खूब निकालते हो, पर यह मामूली बात भी समझ में नहीं आती । अरे, उसने शत्रु पर हमला नहीं बोला है, बल्कि हमारे भविष्य पर ही हमला बोल दिया है । वह परोक्ष रूप से हमें भी मारना चाहता है ।’
   ‘यह तो वही बात हुई कि आपका छोड़ा हुआ आप ही को तोड़ने लगा ।’ खरगोश चुटकी लेता है और अगला प्रश्न पूछता है, ‘आपके वाक्-प्रहार पर सोशल मीडिया में जमकर प्रहार हो रहा है । ऐसा क्यों होता है कि आपकी कही हर गलत बात को सही साबित करने के लिए आपके प्रवक्ता मैदान में कूद पड़ते हैं? क्या वे अभिशप्त हैं ऐसा करने के लिए?’
   ‘अभिशप्त नहीं, वरदान प्राप्त है उन्हें । यह उनका सौभाग्य है कि वे हमारी चरण-सेवा में हैं । हम न होते, तो वे भी न होते । इतने बरसों तक सत्ता का सुख लूटते रहे । यह हमारे परिवार के नाम के बिना कतई सम्भव नहीं था । आगे भी सुख लिखा होगा, तो हमारे ही...’
   ‘फिर भी आपका वक्तव्य क्या आपके खानदान के संस्कारों के अनुरूप है?’
   ‘सरकार बदल जाती है, तो संस्कार भी बदल जाते हैं । सत्ता से बाहर रहने के बावजूद हमीं से संस्कार और मर्यादा की अपेक्षा? युवराज लानत भरी निगाह डालते हैं खबरी खरगोश पर ।
   तभी खबरी कह उठता है, ‘आपके कहने का अभिप्राय यह है कि सत्ता से बाहर बैठे व्यक्तियों को मर्यादा और संस्कार के झमेले में नहीं पड़ना चाहिए । सत्ता में बैठे लोगों पर गलत-सही हमला ही असली संस्कार होना चाहिए । खैर, अंतिम प्रश्न आपसे । क्या वजह है कि हर बात का दोष आप सरकार के मुखिया पर ही थोपते हैं? मजदूर हो या मजलूम, किसान हो या जवान, दलित हो या पिछड़ा-सब की समस्याओं के लिए आप सिर्फ और सिर्फ सरकार के मुखिया को ही गाली देते हैं, जबकि दोष खुल्लम-खुल्ला प्रांतीय सरकारों का होता है ।’
   यह सुनते ही युवराज के चेहरे का रंग बदलकर एकदम लाल हो उठता है । जैसे किसी ने उनकी दुखती रग पर गरम तवा ही रख दिय़ा हो । वह खाट पर खड़े होकर चिल्लाते हैं, ‘सत्ता पर हमारा पुश्तैनी अधिकार था । हम हैं सिंहासन के एकमात्र स्वामी, जिस पर उस जीव ने कब्जा जमा लिया है, जिसे तुम सरकार का मुखिया कहते हो । वह अनधिकृत रूप से बैठा हुआ है हमारे सिंहासन पर । ऐसे में उसके लिए गाली नहीं निकलेगी, तो क्या प्रशंसा की ताली निकलेगी?’
   खबरी खरगोश को समझते देर नहीं लगती । वह आज आखिर पहुँचने में सफल हो गया लगता है युवराज के मन के भीतर । वह तो खिसियानी बिल्ली बने बैठे हैं । वह कैमरा पर्सन के साथ तेजी से भागता है स्टूडियो की तरफ । खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचे शीर्षक से जबर्दस्त टीआरपी-बटोरू मसाला तैयार है ।

मंगलवार, 20 सितंबर 2016

खटमल धीरे से जाना खटियन में

               
   जब से राजमाता लोमड़ी ने वानप्रस्थ आश्रम में जाने की तैयारी शुरु की है, तभी से अखिल जंगल दल का समूचा बल युवराज के सिर पर टूट पड़ा है । सत्ता का सुख ही ऐसा होता है कि त्याग की मूर्ति देवी को भी राजमाता लोमड़ी बना देता है । वहीं सत्ता का दुख भी इतना दबंग होता है कि राजमाता लोमड़ी को भी वानप्रस्थ आश्रम में जाने को विवश कर देता है । सत्ता छिनने के बाद से ही ‘सब सूना-सूना सा लागे है जग’ में राजमाता को, वरना ‘उंगली अपनी उठ रही और नाच रहा संसार’ वाली सुखदायक स्थिति थी । उधर राजमाता की सक्रियता कम हुई और इधर युवराज की सक्रियता बढ़ गई । सत्ता के सिंहासन पर अपना जन्मजात अधिकार समझने वाला प्राणी बहुत दिनों तक विदेशी प्रवास में रहने का खतरा नहीं मोल ले सकता । युवराज  विदेशी प्रवास और पिज्जा-बर्गर उड़ाने के बजाय अब देश की सड़कों की खाक और दुर्बलों-वंचितों के घर की दाल-रोटी उड़ाना चाहते हैं ।
   गरीब तब अपनी गरीबी भूल जाता है, जब युवराज जैसा कोई उसके घर उसकी थाली को खाली करने पहुँच जाता है । गरीबी-उन्मूलन के लिए सत्ताधीसों की हवा-हवाई हरकतों से उत्पन्न उसकी शाश्वत शिकायतों पर विराम लग जाता है, जब यही सत्ता के नायक अपना सिंहासन छोड़ उसकी खटिया पर पधारते हैं । उसे यही बात आनन्द देती है कि चलो, यह भी अपने स्तर पर आ गया । अपने जात वाले से कैसी शिकायत !
   शिकायत दूर करने के लिए युवराज जनता सियारों से ऐसे ही सम्बन्ध बनाना चाहते हैं । पहले के समय में और आज भी कुछ वन-प्रान्तों में गाँव का मुखिया अन्य प्राणियों के साथ खाट पर बैठकर संवाद स्थापित करता है । अन्य प्राणियों को मुखिया अपना ही जानवर प्रतीत होता है, क्योंकि वह उनके साथ खाट पर बैठा होता है । भले ही पीठ-पीछे वह प्राणियों का सारा हक मार जाता हो । किसी चुनावी सलाहकार ने यह अच्छी सलाह दी है युवराज को कि प्राणियों की इस मनोवैज्ञानिक कमजोरी का फायदा उठाकर सत्ता को हथियाया जा सकता है । तभी से युवराज खाट-सभाएँ किए जा रहे हैं ।
   अगली खाट-सभा के लिए दरबार में मंथन चल रहा है । एक तरफ युवराज और उनके सलाहकार की टीम है, तो दूसरी तरफ कार्यकर्ताओँ की भारी भीड़ । युवराज कुछ गुस्से में दिखाई देते हैं । पिछली खाट-सभा में उनके मन-मुताबिक व्यवस्था नहीं हो पाई थी । खाटों में खटमल डालने के उनके निर्देश का पालन सम्बन्धित भावी मंत्री ने नहीं किया था ।
   ‘मैं पूछता हूँ खटमल आखिर अभी तक क्यों नहीं आए?’ युवराज के मुँह से गुस्सा बाहर निकलता है । वह चीखते हुए पूछते हैं, ‘किस बैलगाड़ी से आ रही है खटमलों की खेप? इस तरह चलता रहा, तो एक दिन हमारी ही खटिया खड़ी हो जाएगी ।’
   ‘खटिया खड़ी है युवराज, तभी तो हम उसे बिछा रहे हैं ।’ एक भावी मंत्री का मुँह खुलता है । वह नजरों को झुकाते हुए बोलता है, ‘हुजूर माफ करें, तो एक बात पूछने की इच्छा है । खाट तो ठीक है, पर यह खटमल का खटराग...बात कुछ भेजे में नहीं गई अपने ।’
   ‘बात भेजे में चली जाती, तो आज हम सत्ता से बेदखल नहीं हुए होते ।’ युवराज का गुस्सा तनिक और बढ़ जाता है । वह अपनी आस्तीनें चढ़ाते हुए बोलते हैं, ‘खाट में खटमल...क्या आपको नहीं लगता कि हलचल मचा देगा । दोतरफा लाभ है इससे । मामला खुलते ही विरोधियों पर इसकी साजिश का आरोप मढ़ देंगे । जनता उनपर खटमल की तरह टूट पड़ेगी । वैसे जनता भी खटमल ही होती है । इसी ने हमारी सुख की नींद को हराम कर रखा है । अच्छा होगा...खटमल इनका भी खून चूसेंगे । हमें त्रस्त करने वाले मस्त नहीं रह सकते ।’
   ‘वाह युवराज वाह, इसीलिए तो आप युवराज हैं ।’ पूरा दरबार खुशी के अतिरेक के साथ गुंजायमान हो उठता है । शांत होते ही एक दरबारी की जिज्ञासा उबाल मारती है । वह घुटनों के बल झुकते हुए पूछता है, ‘मगर खाट-सभा ही क्यों...?’
   ‘तो क्या पलंग-सभाएँ करें...डनलप के गद्दों के साथ?’ युवराज पूरी सभा पर दो-तीन बार अपनी नजरों को दौड़ाते हैं, फिर कहना शुरु करते हैं, ‘जिसकी जितनी औकात होती है, उसे उतनी और वैसी ही चीज दी जाती है । अधिक देने पर दिमाग को झटका लगने का डर बना रहता है ।’
   ‘पर जनता खाटों को लूटकर भाग रही है ।’ एक और दरबारी खड़ा होकर अपनी बात को दरबार में रखता है ।
   यह सुनते ही युवराज के चेहरे पर रहस्य-भरी मुस्कान बिखर जाती है । मुस्कुराहट को गाढ़ा बनाते हुए वह बोलते हैं, ‘यह तो हमारे लिए खुशी की बात है । जनता पहली बार अपने राज्य में खाट लूट रही है । इससे पहले ऐसी लूट कभी नहीं मची । मतलब साफ है कि जब से विरोधी ने सरकार बनाई है, जनता गरीब से और गरीब हो गई है । चरित्र इतना गिर गया है कि खाट तक लूटने लगी है । हमारे पुरखों के जमाने में तो अन्न भी नहीं लूट पाती थी वह ।’
   फिर एक बार दरबार तालियों से गूँज उठता है । तभी सलाहकार टीम का मुखिया दरबार से मुखातिब होता है, ‘घबराइए नहीं आप लोग । अपनी खाट से हम विरोधियों की खटिया तो खड़ी करेंगे ही, जनता की भी खाट खड़ी हो जाएगी । चीनी मॉडल की खटिया कुछ ही दिनों में खाट खड़ी करने के लिए उन्हें मजबूर कर देगी । हम एक तीर से दो निशाने लगाना चाहते हैं ।’

   युवराज कुछ खास लोगों के कानों में कुछ कहते हैं । खटमलों को तत्काल कहीं से भी मंगाने का आदेश जारी होता है । खाटों को भी बनवाने का आदेश निकलता है । अगली खाट-सभा में कोई कसर न रहे, इसके लिए युवराज के खास जानवरों को मोर्चा सम्भालने की जिम्मेदारी मिलती है । सभी अपनी खाट बिछाने और दूसरों की खड़ी करने को निकल पड़ते हैं ।

शुक्रवार, 2 सितंबर 2016

सोने-सा दिल है आपका

               
   दरबार-ए-आम आज बतकहियों, कहकहों, हँसी-ठहाकों से गुंजायमान है । हर वर्ग की जनता उपस्थित है । जिसे होना चाहिए, वह तो है ही; जिसका होना जरूरी नहीं, वह भी मौजूद है । सभी के दिलों में जोश व उत्साह की लहरें हिलोरें मार रही हैं, वहीं दरबार-ए-आम की हवा में गर्व की खुश्बू फैली हुई है । सभी को फख्र है अपने खिलाड़ियों पर...उन खिलाड़ियों पर, जो अभी ताजा-ताजा गोलंपिक से लौटे हैं । वे खिलाड़ी ही इस वक्त दरबार-ए-आम के मंच पर अपने लिए निर्धारित सीटों पर बैठे हुए हैं । कोई फर्जीवाड़ा न हो, इसके लिए उन्हीं खिलाड़ियों को मंच पर चढ़ने दिया गया है, जिनके हाथ में सबूत के तौर पर गोलंपिक के टिकट मौजूद हैं । मंच पर इन खिलाड़ियों के अलावा मंत्रीगण, नेता, अधिकारी, खेल-संघों के पदाधिकारी, प्रशिक्षक और वे सभी लोग उपस्थित हैं, जिनकी बदौलत खिलाड़ियों ने हार को चूमा और उनकी इस उपलब्धि पर पूरा वन-राज्य झूमा । गौरव के उन क्षणों को पुनः जीना किसी भी जीवंत राज्य के लिए एक अनिवार्य तत्व होता है । उस क्षण को पुनः महसूस करने तथा हारे हुए खिलाड़ियों को प्रोत्साहित करने के लिए ही यह आयोजन किया गया है ।
   सभी आने के इच्छुक आ चुके हैं तथा आवश्यक तैयारिय़ां भी मुकम्मल हो चुकी हैं । अब बस महाराज सियार की कमी है । अनगिनत निगाहें उन्हीं की राह पर लगी हुई हैं । तभी खबरी खरगोश दौड़ते हुए दरबार-ए-आम में प्रवेश करता है और महाराज के आने की इत्तला देता है । तत्काल सभी सावधान की मुद्रा में आ जाते हैं । उधर प्रधानमंत्री व अन्य मंत्रीगण अगवानी के लिए विशाल दरवाजे की तरफ बढ़ते हैं ।
   उपस्थित वन समुदाय पर सरसरी निगाह डालकर महाराज सियार मंच की ओर प्रस्थान करते हैं । बीच-बीच में हाथ हिला-हिलाकर वह अभिवादन का जवाब भी देते जाते हैं । उपस्थित लोग महाराज की इस अदा पर झूम-झूम उठते हैं । अगले कुछ सेकेंडों के बाद महाराज मंच पर दिखाई देते हैं । परिचय प्राप्त करने और हाथ मिलाने के बाद वह अपने सिंहासन पर आसीन हो जाते हैं ।
   इधर नगाड़ा मंत्री तुरंत माइक को सम्भालते हुए कहना शुरु करते हैं, ‘महाराज की आज्ञा हो, तो खेल के लिए आयोजित इस जश्न का आगाज किया जाए । दीप के प्रज्ज्वलन के लिए हम हुजूर की कृपा के आकांक्षी हैं ।’
   महाराज धीरे-धीरे मंच के एक कोने की तरफ बढ़ते हैं । दीप-प्रज्ज्वलन में विशिष्ट लोग उनका साथ देते हैं । इसके बाद उन्हें दो शब्द कहने के लिए माइक पर आने की प्रार्थना की जाती है । वह हुंआ-हुंआ के दो शब्द निकालकर कहना शुरु करते हैं, ‘खुशी का मौका है और हमारे लिए तो यही बड़ी बात है कि हमारे खिलाड़ी बहादुरीपूर्वक हार गए । जीतो तो ऐसा न लगे कि जीत में कुछ कमी रह गई । हारो तो ऐसे हारो कि जीतने वाले को यह न लगे कि हराया, लेकिन मजा नहीं आया । जीतने वाला चैम्पियन होता है और हमारे लिए फख्र की बात है कि हमारे खिलाड़ी चैम्पियनों से हारे । आप लोगों की हार ही हमारे लिए जीत है । भगवान करे कि आप लोग यूँ ही हारते रहें और वन-राज्य का सिर ऊँचा बनाए रखें ।’
   महाराज के इतना कहते ही तालियों की गड़गड़ाहट से दरबार-ए-आम हिलने लगता है । तालियां इस बात पर और ज्यादा बजती हैं कि महाराज की महानता देखिए कि उन्होंने हार को भी किस खूबसूरती से जीत करार दे दिया । उनकी खिंची लाइन सभी के लिए एक गाइड लाइन सी बन जाती है । अगले ही क्षण राजपुरोहित को दो शब्द कहने का मौका मिलता है । राजपुरोहित लंगूर अपनी माला को फेरते हुए खिखियाते हैं और फिर गम्भीर स्वर में अपनी बात को आगे रखते हैं, ‘हमें खुशी है कि हमारे खिलाड़ी संतोष के साथ लौटे हैं । पदक-वदक, सोना-चाँदी-सब फीके हैं संतोष के सामने । सोना-चाँदी तो कभी भी आ जावे है, लेकिन संतोष बड़ी मुश्किल से आवे है । आपने सोना-चाँदी के पदक जीतने वालों को छोटा साबित कर दिया है, क्योंकि आप लोगों के पास सबसे बड़ा पदक है-संतोष का पदक ।’
   एक बार फिर दरबार-ए-आम तालियों की गड़गड़ाहट का गवाह बनता है । अगले ही क्षण खेल मंत्री माइक को पकड़ बोलना शुरु करते हैं, ‘खिलाड़ियों, आपकी हार से सारा राज्य गौरवान्वित है । हारना और उसे बर्दाश्त करना सबके वश की बात नहीं होती । यह आपका संयम और संस्कार है । वास्तव में हारने वाला ही सच्चा चैम्पियन है । जब कोई हारने को तैयार होता है, तभी किसी की जीत पक्की होती है । हारना त्याग है । जीत में यह बात कहाँ !’
   अब गृहमंत्री की बारी आती है । वह खिलाड़ियों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए कहते हैं, ‘आप लोगों ने हारकर अच्छा ही किया । अगर जीत जाते, तो खेल-संघ बेवा हो जाते । सभी पदाधिकारी इसी बात के लिए लड़ मरते कि यह जो पदक आए हैं, यह केवल उन्हीं के परिश्रम के फल हैं ।’
   समापन के लिए खेल-संघ के एक पदाधिकारी माइक को लपकते हैं, ‘सज्जनों, खेल में हार-जीत महत्व नहीं रखता । महत्व रखता है केवल भाग लेना, इसीलिए हम अनासक्त भाव से भाग लेते हैं । हम भाग लेने के लिए ही वर्षों से जा रहे हैं । आगे भी पूरे गर्व तथा बहादुरी के साथ जाते रहेंगे ।’

   इसके बाद खिलाड़ियों को अपने-अपने हारने की उच्चता के अनुसार हार-रत्न, हार-भूषण एवं हार-श्री से सम्मानित किया जाता है । सम्मानित करने के बाद महाराज के आदेश पर दरबार-ए-आम में जश्न के जाम छलकने लगते हैं ।

शुक्रवार, 22 जुलाई 2016

याद रखियो...कर्ज का फर्ज भी होता है

             
   दरबार-ए-खास में आज काफी गहमागहमी है । महाराज सियार के अलावा सारे मातहत मंत्री उपस्थित हैं । इस बात का खास ख्याल रखा गया है कि उन्हीं को इस खास मौके पर बुलाया जाए, जो हर हाल में समाजवाद का झंडा बुलंद रखते आए हैं । किसी की जमीन पर कब्जा करना हो, दुर्बलों पर दबंगई दिखानी हो, पुलिस वालों की हर आम-ओ-खास मौकों पर कुटाई करनी हो, हर किस्म के ठेके हड़पने हों, गुंडई के नित नये गिनीज रिकॉर्ड बनाने हों, माफियाओं-अपराधियों का कर्ण-छेदन करके चेले-चपाटी बनाना हो-क्षेत्र कोई भी हो, जो मैदान से नहीं डिगा, वही सच्चा समाजवादी है । समाज से जबर्दस्त अपनापन रखते हुए उसके हर चीज को अपना बनाने की प्रत्येक काग-चेष्टा को आधुनिक समाजवाद कहते हैं ।
   तो इस वक्त बिना किसी शक-ओ-शुबहा के सारे आधुनिक समाजवादी मौजूद हैं । खुसपुसाहटें हो रही हैं, पर महाराज सियार की चुप्पी की वजह से मंत्रियों की बेचैनियाँ बढ़ती जा रही हैं । महाराज के प्रति सम्मान के कारण कोई उनकी चुप्पी को भंग करना नहीं चाहता । निकट भविष्य में मंत्रिमंडल में फेरबदल संभावित है, अतः सम्मान के समंदर में ज्वार का उठना निहायत ही स्वाभाविक कर्म है । उधर महाराज की निगाहें बार-बार दरवाजे पर जाती हैं और मायूस होकर लौट आती हैं । उन्हें मायूस देखकर मंत्री भी वैसी ही भाव-मुद्रा बनाने की कोशिश करने लगते हैं । अभी मुँह लटकाने का समाजवादी रिहर्सल चल ही रहा है कि तभी खबरी खरगोश धड़धड़ाते हुए दरबार में प्रवेश करता है । उसे देखते ही महाराज के चेहरे पर प्रसन्नता की कली खिल उठती है । वह चहकते हुए पूछते हैं, ‘कहो खबरी, हमारे रिकॉर्ड-तोड़ समाजवादी कामों के प्रति आम सियारों में कैसी धारणा है...उन लोगों ने कैसी प्रतिक्रिया व्यक्त की हमारे लिए?’
   ‘महाराज सियार की जय हो ।’ वह घुटनों तक झुकता है और खबर को उड़ेलता है, ‘हुजूर, कोई कुछ बोलने को तैयार ही नहीं है...बस मुस्कुराते हैं और चुप्पी साधे रहते हैं । हमें तो यही लगा कि गूँगे हो गए हैं सब-के-सब ।’
   इस पर महाराज कुछ कहना ही चाहते हैं कि प्रधानमंत्री लकड़बग्घा बोल उठते हैं, ‘यह तो अच्छी खबर है महाराज, उस गूँगे की कहानी तो अवश्य ही आपने सुनी होगी । गुड़ खाकर उसके आनंद में इतना मगन हुआ कि गूँगा हो गया । वह वास्तव में गूँगा नहीं था महाराज । उसी तरह आपके समाजवादी कामों का जनता इतना आनंद ले रही है कि गूँगी हो गई है ।’
   पूरा दरबार-ए-खास तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठता है । महाराज अभिभूत होकर बोल उठते हैं, ‘क्या सत्य और सटीक व्याख्या की है आपने प्रधानमंत्री जी । वास्तव में हमने काम ही इतना किया है कि जनता की बोलती बंद हो गई है । पहले के सारे रिकॉर्ड ध्वस्त हो गए हैं और रोज रिकॉर्ड के नए प्रतिमान स्थापित हो रहे हैं । हमने तो वादा पूरा कर दिया, अब जनता की बारी है । हमें दुबारा सत्ता सौंपकर वह भी रिकॉर्ड बनाए ।’
   ‘जनता को चुनौती देकर आपने अपने सच्चे राजत्व का परिचय दिया है महाराज,’ नगाड़ा मंत्री की आवाज गूँजती है इस बार, ‘वह यूँ ही झाँसे में नहीं आती । ललकारना अक्सर काम कर जाता है ।’
   ‘वह तो ठीक है मंत्री महोदय, पर जनता अब भी इशारों-इशारों में काम की ही पड़ताल कर रही है ।’ खबरी खरगोश अपनी आँखों देखी चीजों को सामने रखता है ।
   ‘हम किसी भी काम में पीछे नहीं हैं ।’ महाराज सियार के चेहरे पर आवेश का झीना परदा-सा झलकता है । वह सिंहासन की मूँठ को कसते हुए बोलते हैं, ‘सारे काहिल-जाहिल हमारी बदौलत नौकरी पाकर मौज उड़ा रहे हैं । पूरे इतिहास में शायद ही कोई ऐसा होगा, जो ऐसी समाजसेवा में हमारी बराबरी कर सके ।’
   ‘सचमुच, आप कहीं पीछे नहीं हैं महाराज ।’ प्रधानमंत्री गर्व से फूलते हुए कहते हैं, ‘आपका काम बोल रहा है । बड़ों को तो छोड़िए, हमारा अदना-सा कार्यकर्त्ता तक विकास के समंदर में गोते लगा-लगाकर बरसाती मेढक की तरह फूलकर विकास को प्राप्त हो गया है । इस तरह हाशिए के व्यक्ति तक विकास सिर्फ आप ही के राज में संभव है महाराज ।’ फिर एक बार तालियों की गड़गड़ाहट...
   ‘और एक बात,’ महाराज के बोलते ही सन्नाटा छा जाता है । एक हाथ को ऊपर उठाते हुए वह अपनी बात को आगे बढ़ाते हैं, ‘खबरी, जाकर पता लगाओ कि विकास का कर्ज चुकाने को आम सियार तैयार हैं कि नहीं । वसूली का समय आ चुका है ।’

   इशारा पाते ही खबरी खरगोश बाहर निकलता है । इधर प्रधानमंत्री के निर्देश पर प्रशिक्षित लकड़बग्घे समाजवादी तरीके से कर्ज का फर्ज समझाने के लिए कूच की तैयारी शुरू करते हैं ।

शुक्रवार, 24 जून 2016

भैंस नहीं...अबकी बार, गुम है सरकार

  सरकार चीख-चीखकर बता रही है कि वह गाँव तक पहुँच चुकी है उसका चीखना लाजिमी है, क्योंकि जनता अमूमन बहरी होती है धीरे की बात सुन लेती, तो नगाड़ा बजाने की जरूरत ही नहीं पड़ती खैर, वह आई तो आई कैसे? न एअरोप्लेन दिखाई दिया, न रेलगाड़ी आई, न चमचमाती लग्जरी गाड़ियां, न ही फौजी हेलीकॉप्टर । न इक्का-तांगा आया, न कोई बैलगाड़ी आई, न कोई टेम्पू आया, न ही रिक्शे की सवारी आई । न कोई साइकिल दिखाई दी, न कोई हाथी मतवाली चाल से चलती हुई आई । न पालकी को ढोने वाले कहार दिखाई दिए, न कोई पैदल चप्पल घसीटता हुआ आया । हवा भी आई, तो अपने साथ धूल-अंधड़ ही लाई ।
  फिर भी सरकार आ गई है । जनता काहिल और जाहिल इसीलिए कहलाती है, क्योंकि वह सरकार का आना ताड़ ही नहीं पाती है । ऐसी जनता किस काम की, जो सरकार को ही न देख सके । मैं उसे ढूँढने लगा । सूखे खेतों में देखा, खाली खलिहानों में देखा । फटी धरती-सी रूखे और खुरदरे चेहरे वाले लोग ही दिखाई दिए । यहाँ सरकार हरगिज नहीं हो सकती । हरियाली और सूखे का भला क्या मेल !
   मैंने उसे कुओं में झांका, पोखरों-तालाबों में देखा, नदी-नालों में देखा, हर गहराई में देखा, पर वह दिखाई नहीं दी । रास्तों-पगडंडियों पर देखा, गलियों-चौबारों में देखा, नुक्कड़ पर देखा, नाकों-सरहदों पर देखा । अमीर की हवेली में देखा, गरीब की झोपड़ी में देखा । घरों के कोनों में देखा, भात के दोनों में देखा । चाय की कुल्हड़ और बच्चों की हुल्लड़ में देखा । ताले-तिजोरी में देखा, लोगों की फटी जेबों में देखा । टूटी खटिया व पलंग पर देखा । हतभाग्य, सरकार कहीं नहीं दिखी ।
   राशन की दुकान पर खोजा । वहाँ कुछ दिखाई दिया । एक आदमी दो दिनों से बच्चों के भूखे होने की दुहाई देकर अनाज मांग रहा था और दुकानदार उसकी गर्दन में हाथ लगाकर बाहर धकिया रहा था । कुछ आगे सड़क के एक शानदार गड्ढे में दो-चार लोग गिरे पड़े थे । जरूर वहाँ सरकार होनी चाहिए, तभी तो लोग खुशी-खुशी उसमें...अफसोस ! चौराहे पर मैंने पूछा, ʻसरकार को तुमने देखा है कहीं
  अभी तो आया था,’ लोगों ने जवाब दिया,चुनाव सिर पर है । अतः कमजोरों के वोटर कार्ड जमा करवा रहा है...सुरक्षा के लिए ।’ अब इसमें उनकी सुरक्षा है या नेता की...सरकार ही जाने ! ( दरअसल यह सरकार इलाके के खुर्राट नेता का खास आदमी है ।)

   सचमुच सरकार लापता हो गई है । जो खुद लापता हो, वह अपना पता भला किस तरह बता सकती है । इसके बावजूद वह बता रही है, तो सच ही बता रही होगी । सरकार सच ही बोलती है । सच तो सच होता ही है, उसका झूठ भी सच ही माना जाता है । पर आम जनता के लिए दिक्कत यह है कि वह सरकार को अपनी दुनियावी आँखों से नहीं देख पा रही है । अतः सरकार उसके लिए लापता ही हुई न ! भैंस लापता हुई थी, तो पुलिस और प्रशासन ने उसकी तलाश में रात-दिन एक कर दिया था । तभी नासमझ जनता को यह भी पता चला था कि पुलिस कितनी कर्मठ चीज होती है । पर आज सरकार को ढूँढने के लिए कोई आगे नहीं आया, एकदम शांति छाई हुई है ।...आखिर इतना सन्नाटा क्यों है भाई !
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