जीवन व समाज की विद्रुपताओं, विडंबनाओं और विरोधाभासों पर तीखी नजर । यही तीखी नजर हास्य-व्यंग्य रचनाओं के रूप में परिणत हो जाती है । यथा नाम तथा काम की कोशिश की गई है । ये रचनाएं गुदगुदाएंगी भी और मर्म पर चोट कर बहुत कुछ सोचने के लिए विवश भी करेंगी ।

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गुरुवार, 16 फ़रवरी 2017

काम बोलता है...

                              
    पिछली बार भइया जी जब सत्ता में आए थे, तो अपने सारे नेताओं को निर्देश निर्गत किया था कि वे प्रत्येक कम से कम एक महंगी गाड़ी अवश्य ही हस्तगत कर लें । पूछने पर बताया था कि ऐसा दो कारणों से नितांत आवश्यक था । एक, नेता से लेकर आम जनता तक यह संदेश जाए कि सत्ता कोई सस्ती आइटम गर्ल नहीं है, जिसे कोई भी नचा ले । दो, विकास को रफ्तार दिया जा सके । गाड़ियाँ और गाड़ियों में नेता विकास के ज्वलंत उदाहरण हैं । इस बार उनका सपना है कि विकास को चौगुनी मात्रा और चौगुनी रफ्तार से जनता तक लेकर जाया जाए । इसके लिए जरूरी है कि कम से कम चार महंगी नई गाड़ियाँ एक नेता को प्राप्त हों । विकास जब नंगी आँखों से दिखाई देता है, तभी जनता यकीन करती है ।
    भइया जी का दावा है कि उन्होंने काम इतना किया है कि गणेश जी की कलम भी लिखते-लिखते थक जाए । काम बोले तो...विकास, विकास और केवल विकास । जिधर देखिए, उधर विकास की नदी प्रवाहित हो रही है । यह अलग बात है कि प्रकृति प्रदत्त नदियाँ या तो सूख रही हैं, या विकास की गंदगी से जूझ रही हैं, या जिनके प्रवाह येन-केन-प्रकारेण बाधित हो रहे हैं ।
    हम भी भइया जी के काम को खुर्दबीन से खोजते हुए उनके शानदार बंगले तक पहुँच गए । हमें देखते ही वह खदबदा उठे । कैमरे की नजर अपने ऊपर महसूस करते ही बोले, ‘सुना है कि हमारे सारे विरोधी बह गए हमारे विकास की दरियाओं में?’
    ‘कौन सी विकास की बात करते हैं आप?’ हमने पूछा, ‘हम तो ढूँढ़ते आ गए आपके घर तक, पर हमें तो कुछ नहीं दिखा ।’
    ‘कमाल करते हैं आप भी । चारों तरफ हमारा ही काम बिखरा पड़ा है । क्या उन कामों ने आपसे कुछ नहीं कहा?’ वह थोड़ा आक्रामक होते हुए बोले ।
    ‘रास्ते में तो हमें कोई काम नहीं मिला । इसीलिए हम जानना चाहते हैं कि आपने कौन-कौन सा काम किया?’ हमने माइक उनके मुँह के आगे कर दिया ।
    ‘जब काम हजार हों, तब उन्हें गिनवाने की गलती कोई समझदार इंसान कर सकता है भला? न हम उतना बोल पाएंगे, न आप उतना सुन पाएंगे ।’
    ‘चलिए, मान लेता हूँ कि यह संभव नहीं है । पर दस काम तो आप निश्चय ही गिनवा देंगे ।’ मैंने उनके आगे हथियार...मतलब माइक डालते हुए कहा ।
    ‘अपने मुख मियाँ मिठ्ठू बनना हम नहीं चाहते ।’ वह आत्म-मुग्ध होते हुए बोले, ‘हम अपने मुख से अपने काम का बखान क्यों करें, जब हमारा काम खुद बोल रहा हो । आप आँख बंद करके देखिए, हमारा काम हर तरफ दिखाई दे रहा है । कान बंद करके सुनिए, उसी की गूँज है चारों ओर ।’
    आँख बंद करते ही हमें अँधेरे के सिवा कुछ भी दिखाई नहीं दिया । अँधेरे से डर या डिस्टर्ब होकर हमने आँखें खोल दीं और पुनः काम पर चले आए । अपने काम को बढ़ाते हुए उनके काम के बारे में पूछा, ‘आप बताना नहीं चाहते, तो न सही । कम से कम दो काम तो गिनवा दीजिए, जो आपकी नजर में बहुत ऊँचा स्थान रखते हों ।’
    ‘देखिए, मेरे काम मेरी संतानों के समान हैं । कोई भी आदमी केवल दो की गिनती करवाकर बाकी को नालायक या नाजायज नहीं कह सकता । उसके लिए तो उसकी सभी संतान समान महत्व के होते हैं । अतः हम अपने दो कामों को गिनवाने की भूल कतई नहीं कर सकते । वैसे भी काम करने वाला इन गिनतियों के फेर में नहीं पड़ता ।’
    हम उनकी भावनाओं की कद्र करते हुए उनके द्वारा किए गए केवल दो कामों से पुनः पीछे हट गए और उन्हें उनकी महानता का लाभ देते हुए केवल एक पर आ टिके । मुख पर मुस्कान लाकर हमने पूछा, ‘कोई बात नहीं । आप केवल एक काम का नाम बता दीजिए, जो आम जनता की नजरों में भी काम ही हो ।’
    एक सुनते ही वह अनेक हो गए । वह इतनी जोर से हम पर चिल्लाए कि उनके  ही आदमी चारों तरफ । मैं एक, वह अनेक । हथियार ही हथियार । उनके हाथों में काम, मेरे मुँह में राम । वह मेरी आँखों में आँखें डालते हुए बोले, ‘एक...केवल एक काम पूछकर हमारा अपमान करने की तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई? क्या तुम्हें अभी भी सुनाई नहीं दे रही हमारे कामों की आवाज?’
    शायद पहली बार मुझे उनके बोलते काम दिखाई दिए थे । मैंने उनसे झूठ नहीं कहा कि उनके काम सचमुच बोलते हैं । मेरी आँखों में आगे के कामों के चित्र तथा कानों में उनकी आवाजें सिमटने लगे थे । शक काफूर हो चला था । अब उसका स्थान यकीन लेता गया था...चौगुनी रफ्तार से ।

मंगलवार, 1 नवंबर 2016

नाटक का छल

                   

                      
   महाराज सियार इस वक्त अपने सिंहासन पर मौजूद हैं । पिछली रातों में बिन बुलाए मेहमान की तरह आ धमके सपनों ने उन्हें परेशान कर रखा है । प्रत्येक सपना चीख-चीख कर यही संदेश दे रहा है कि सिंहासन पर उनके बैठने के दिन अब लद चुके । सिंहासन उन्हें लात मारकर निकालने को संकल्पबद्ध होकर जैसे बैठा हो । ऐसे में महाराज सियार का सिंहासन को मजबूती से पकड़कर बैठना स्वाभाविक ही है । प्राणी जब अंदर से भयभीत होता है, तो वह कुछ ज्यादा ही बढ़-बढ़ के बोलता है । वह ऐसा इसलिए करता है, ताकि उसके भय का आभास किसी को न हो सके । हालांकि उसकी ऐसी स्थिति ही उसकी पोल खोल रही होती है ।
   सार्वजनिक मंचों से महाराज सियार अनगिनत बार यह दावा कर चुके हैं कि अगला महाराज बस वही बनने वाले हैं । सिंहासन के एकमात्र उत्तराधिकारी वही हैं । सत्ता रुपी दुल्हन के लिए उनसे अधिक सुयोग्य दूल्हा कोई और नहीं है । पर पता नहीं क्यों, जितना वह चिल्लाते जाते हैं, अंदर बैठा भय का भूत उतना ही अपना आकार बढ़ाते जाता है । भय के भूत को मार भगाने के लिए अपने लोगों की जरूरत पड़ती है । इस वक्त दरबार-ए-खास में वही लोग मौजूद हैं, जिनका दावा है कि अगर उनकी छाती फाड़ दी जाए, तो वहाँ भगवान श्रीराम नहीं, बल्कि महाराज सियार के दर्शन होंगे । ऐसे सूरमा भी मौजूद हैं, जो महाराज के प्रति भक्ति दिखाने के लिए थप्पड़ चला चुके हैं और जूतम-पैजार कर चुके हैं । ऐसे मौसम-विज्ञानी भी उपस्थित हैं, जो हवा के रुख का सटीक आकलन करते हुए सुरक्षा के लिहाज से महाराज से चिपक गए हैं ।
   दरबार-ए-खास को ठस्सम-ठस्सा देख महाराज सियार का छाती अकड़ाकर बैठना बनता ही बनता है । भीड़ सत्ता को बड़ी राहत देती है । यहाँ तो सब ठीक-ठाक लग रहा है, किन्तु बाहर की खबर जब तक नहीं मिल जाती, तब तक मन के चैन पर बैन लगा रहेगा । मन को इंतजार है, तो सिर्फ खबरी खरगोश का । आने वाले तो सभी आ चुके हैं, किन्तु वह है कि आने का नाम नहीं लेता । महाराज सियार की नजरें बाहर से आने वाली राह पर अटकी हुई हैं ।
   तभी खबरी खरगोश धड़धड़ाता हुआ दरबार में प्रवेश करता है । महाराज के सामने आकर वह घुटनों तक झुकते हुए कहता है, ‘महाराज की जय हो । एक खुशखबरी पकड़ के लाया हूँ महाराज । आदेश हो तो सभी के समक्ष पेश करूँ ।’
   ‘तुझे आदेश की क्या जरूरत है । इधर-उधर न कर और जल्दी से सुना । अब मुझसे रहा नहीं जाता ।’ कहते-कहते महाराज की अधीरता सतह पर आ जाती है ।
   ‘महाराज, पिछला सर्वे जहाँ आपको पिछड़ते हुए दिखा रहा था, वहाँ अब नया सर्वे आपकी बढ़त को बता रहा है । यह तो चमत्कार हो गया महाराज । आपने तो कुछ किया भी नहीं और...’
   ‘सब राजपिता का कमाल है । उनका लिखा नाटक सुपर-डुपर हिट रहा ।’ इतना कहते ही महाराज के चेहरे पर एक रहस्यमयी मुस्कान लोटम-लोट होने लगती है ।
   ‘पर हुजूर, पिछले साढ़े चार साल से नाटक तो खेला ही जा रहा था ।’ खबरी के चेहरे पर आश्चर्य के भाव हैं । वह अपनी बात आगे बढ़ाता है, ‘एक नाटक के चलते हुए भी दूसरा नाटक !...बात कुछ समझ में नहीं आई ।’
   ‘तेरी जितनी औकात होगी, तू उतना ही सोच पाएगा न । बात सबकी समझ में आ जाए, तो नाटक का मजा ही क्या है ।’
   ‘मैं फिर पूछता हूँ महाराज, एक नए नाटक की जरूरत क्या थी आखिर?’
   ‘चुनाव सिर पर है और हमारा ही गणित हमको पिछड़ते दिखा रहा था । वैसे भी अब जनता से वोट लेना उतना आसान नहीं रहा । आज उसे सबसे बड़ा मूर्ख बनाने वाला ही उसके वोट का हकदार होता है ।’
   ‘मतलब यह नाटक जनता को...?’
   ‘और नहीं तो क्या । तू कुछ और तो नहीं समझ बैठा था?’ महाराज के चेहरे पर एक प्रश्न-सा उभरता है ।
   ‘हाँ महाराज, मुझे लगा था कि सभी आपही को घेरकर...उस अभिमन्यु के जैसा ।’ खबरी खरगोश की आवाज मद्धिम होती जाती है कहते हुए ।
   ‘तू समझदार है । अभिमन्यु वाली सहानुभूति ही नए सर्वे में ललकार रही है । ख्याल रहे, यह बात जनता तक कतई न पहुँचे । चुनाव होने तक तो कतई नहीं । उसके बाद कोई क्या उखाड़ लेगा अपना ।’
   खबरी खरगोश को महसूस होता है कि यह और कुछ नहीं, छल है जनता के साथ । पर इसे जनता समझे, तब न !

शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2016

खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचे

                   
   सिंहासन की ओर देखते-देखते आँखें पथरा गई हैं । युवराज सियार को तो बस खाट का ही सहारा है । खाट की हिमाकत इतनी कि वह उन्हें काट रही है । एक चादर भला कितनी सुरक्षा प्रदान कर सकती है । जिसका जन्म सिंहासन पर बैठने के लिए हुआ हो, वह खाट पर बैठे-यह सच्चाई क्या कम है कुछ चुभने-काटने के लिए । चादर सरक गई है, मगर युवराज को होश नहीं है । उनके मन में आँधियाँ चल रही हैं । चेहरा भी विध्वंस के प्रभाव को फैलाने में लगा हुआ है । उन्हें इंतजार है खबरी खरगोश का । उनके मन की चीजों को वही पहुँचा सकता है, तटस्थ रूप से आडियंस तक । अब जनता ही जनार्दन बनके फैसला करे ।
   तभी खबरी खरगोश अपने ताम-झाम के साथ पहुँचता है और तत्काल युवराज से मुखातिब होता है । ‘हाँ तो युवराज, खबर आ रही है कि सरकार के शल्य-प्रहार पर ही आपने अपना वाक्-प्रहार ठोंक दिया है । क्या यह खबर सही है?’
   ‘सौ फीसदी सही खबर है ।’ युवराज ने अपने कुर्ते की आस्तीन चढ़ाते हुए कहा, ‘हम क्या करते? सरकार ने हमें मजबूर कर दिया ।’
   ‘मगर शत्रु पर शल्य-प्रहार करने के लिए तो आप ही सरकार को ललकार रहे थे ।’ खबरी खरगोश तुरंत अपना प्रश्न दागता है । वह पूछता है, ‘क्या सरकार को कोसने और ललकारने के लिए आपने अपने प्रवक्ता घड़ियालों को मैदान में नहीं उतार रखा था? उस वक्त तो खूब ललकार-ललकारकर...’
   ‘हाँ, पर हमें क्या पता था कि सिंहासन पर बैठा जीव एकदम से फन्ने खाँ हो जाएगा ।’ युवराज बीच में ही बोल उठते हैं, ‘हम तो समझे थे कि हमारे पूर्वजों की तरह वह भी सफेद कबूतर बना रहेगा ।’
   ‘सफेद कबूतर बने रहने का मतलब...?’
   ‘हमारे पूर्वजों की बात और थी । समय दूसरा था, मगर यह तो फँसा हुआ था जनता के आक्रोश के बीच । हम ललकार जरूर रहे थे, पर दिल से चाहते थे कि वह हाथ पर हाथ धरे बैठा रहे और उसे कायर साबित किया जा सके ।’
   ‘तो क्या सरकार के शत्रु पर प्रहार और आपके खेमे में दुख के संचार के बीच कोई सम्बन्ध भी दिखाई देता है आपको?’ खबरी अगला प्रश्न दागता है ।
   ‘बाल की खाल तो खूब निकालते हो, पर यह मामूली बात भी समझ में नहीं आती । अरे, उसने शत्रु पर हमला नहीं बोला है, बल्कि हमारे भविष्य पर ही हमला बोल दिया है । वह परोक्ष रूप से हमें भी मारना चाहता है ।’
   ‘यह तो वही बात हुई कि आपका छोड़ा हुआ आप ही को तोड़ने लगा ।’ खरगोश चुटकी लेता है और अगला प्रश्न पूछता है, ‘आपके वाक्-प्रहार पर सोशल मीडिया में जमकर प्रहार हो रहा है । ऐसा क्यों होता है कि आपकी कही हर गलत बात को सही साबित करने के लिए आपके प्रवक्ता मैदान में कूद पड़ते हैं? क्या वे अभिशप्त हैं ऐसा करने के लिए?’
   ‘अभिशप्त नहीं, वरदान प्राप्त है उन्हें । यह उनका सौभाग्य है कि वे हमारी चरण-सेवा में हैं । हम न होते, तो वे भी न होते । इतने बरसों तक सत्ता का सुख लूटते रहे । यह हमारे परिवार के नाम के बिना कतई सम्भव नहीं था । आगे भी सुख लिखा होगा, तो हमारे ही...’
   ‘फिर भी आपका वक्तव्य क्या आपके खानदान के संस्कारों के अनुरूप है?’
   ‘सरकार बदल जाती है, तो संस्कार भी बदल जाते हैं । सत्ता से बाहर रहने के बावजूद हमीं से संस्कार और मर्यादा की अपेक्षा? युवराज लानत भरी निगाह डालते हैं खबरी खरगोश पर ।
   तभी खबरी कह उठता है, ‘आपके कहने का अभिप्राय यह है कि सत्ता से बाहर बैठे व्यक्तियों को मर्यादा और संस्कार के झमेले में नहीं पड़ना चाहिए । सत्ता में बैठे लोगों पर गलत-सही हमला ही असली संस्कार होना चाहिए । खैर, अंतिम प्रश्न आपसे । क्या वजह है कि हर बात का दोष आप सरकार के मुखिया पर ही थोपते हैं? मजदूर हो या मजलूम, किसान हो या जवान, दलित हो या पिछड़ा-सब की समस्याओं के लिए आप सिर्फ और सिर्फ सरकार के मुखिया को ही गाली देते हैं, जबकि दोष खुल्लम-खुल्ला प्रांतीय सरकारों का होता है ।’
   यह सुनते ही युवराज के चेहरे का रंग बदलकर एकदम लाल हो उठता है । जैसे किसी ने उनकी दुखती रग पर गरम तवा ही रख दिय़ा हो । वह खाट पर खड़े होकर चिल्लाते हैं, ‘सत्ता पर हमारा पुश्तैनी अधिकार था । हम हैं सिंहासन के एकमात्र स्वामी, जिस पर उस जीव ने कब्जा जमा लिया है, जिसे तुम सरकार का मुखिया कहते हो । वह अनधिकृत रूप से बैठा हुआ है हमारे सिंहासन पर । ऐसे में उसके लिए गाली नहीं निकलेगी, तो क्या प्रशंसा की ताली निकलेगी?’
   खबरी खरगोश को समझते देर नहीं लगती । वह आज आखिर पहुँचने में सफल हो गया लगता है युवराज के मन के भीतर । वह तो खिसियानी बिल्ली बने बैठे हैं । वह कैमरा पर्सन के साथ तेजी से भागता है स्टूडियो की तरफ । खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचे शीर्षक से जबर्दस्त टीआरपी-बटोरू मसाला तैयार है ।

मंगलवार, 5 जुलाई 2016

मैं हूँ आम सियार

                   
   जंतर-मंतर आश्चर्य से मुँह फाड़े खड़ा था । आँखें बेहिसाब चौड़ी होती गई थीं । जिधर से देखो, उधर से सियार चले आ रहे थे । धरती के अंदर और आसमान को छोड़कर दिशाओं का कोई कोना बाकी नहीं था । खेलम-खेल थी, मेलम-मेल थी, रेलम-पेल थी, जेलम-जेल थी, ठेलम-ठेल थी । हर कोई एक जगह पकड़ने को आतुर । जिन्हें जगह मिल गई, वे बैठ गए थे । जिन्हें नहीं मिली, वे खड़े-खड़े ही धरती को पैरों तले रौंद रहे थे ।
   सामने मंच पर बैठे आठ-दस नेता टाइप सियार अचानक खड़े हो गए थे । वे जोर-जोर से हाथ हिलाकर सबको शांत करने की कोशिश करने लगे । सबके शांत होते ही मुख्य नेता सियार उठ खड़ा हुआ । गले में अच्छी तरह मफलर लपेटने के बाद वह चार-पाँच बार खाँसा । गला साफ होने के बाद उसने सभी से सियार-वंदना की अपील की । पूरा जंतर-मंतर हुआँ-हुआँ की मधुर ध्वनि से गूँज उठा ।
   ‘भाइयों,’ वंदना खत्म होते ही नेता सियार बोला, ‘जीवन के हर क्षेत्र में, हर कार्य-व्यापार में, रोजमर्रा के हर व्यवहार में हमें दिक्कतों का सामना है । हर जगह वह कौन है, जिसके कारण हमें बार-बार दौड़ना पड़ता है, चप्पलों को घसीटना पड़ता है, फिर भी हाथ खाली-के-खाली रह जाते हैं ।’
   ‘कौन है वह?’ भीड़ में से आवाज आई ।
   ‘अच्छा प्रश्न किया किसी सियार दोस्त ने ।’ नेता सियार चहक उठा था । वह बोला, ‘भ्रष्टाचार है वह, जिससे हर सियार त्रस्त है ।’
   ‘उसे मार डालो...मार डालो ।’ भीड़ ऐसे हिलने लगी, जैसे कई शांत लहरें अचानक विक्षुब्ध हो उठी हों ।
   ‘मार तो डाला जाए, पर यह तो पता चले कि वह रहता कहाँ है ।’ एक दूसरा नेता उठकर बोला और भीड़ को शांत करने लगा । जैसे ट्यूब से हवा निकल गई हो, भीड़ फिर चिपक कर बैठ गई ।
   तभी मुख्य नेता सियार ऐलान करते हुए बोला, ‘ठीक एक पखवाड़े बाद अगली शाम को हम फिर यहीं मिलेंगे । निश्चय ही इस अवधि में भ्रष्टाचार का पता हमारी मुट्ठी में होगा ।’
   एक पखवाड़े बाद वाली शाम थी आज । सियारों की संख्या भी दोगुनी थी और उत्साह भी दोगुना । ‘क्या मिला ठिकाना? हमें भी तो पता चले कौन-सी है उसकी गुफा ।’ भीड़ से आवाज आई, शायद वह तनिक भी ताकने के मूड में नहीं थी ।
   ‘हाँ-हाँ, पता चल गया है ।’ मुख्य नेता सियार उठते हुए बोला, ‘वह सत्ता के गलियारे में रहता है । लकड़बग्घों और भेड़ियों के बंगले उसके आश्रय-स्थल हैं । उसे अक्सर खिड़कियों से झाँकते देखा जा सकता है ।’
   ‘तो देर किस बात की, उसे मार डालो...मार डालो ।’ एक हल्ला-सा उठा और भीड़ बेकाबू होने लगी ।
   ‘भाइयों-भाइयों,’ हाथ के इशारे से बैठने को कहता हुआ नेता बोला, ‘इतना आसान नहीं है उसे मारना । वह बड़े-बड़े लोगों के शरणागत है । उसे मारने के लिए  घमासान करना होगा और इस काम के लिए हमें चुनावी रण-क्षेत्र में उतरना होगा । सत्ता के गलियारों तक पहुँचना होगा । क्या आप सब चुनावी रण-क्षेत्र के लिए हमें योद्धा चुनने को तैयार हैं?’
   ‘हाँ-हाँ, आप लोग ही योद्धा होंगे ।’ भीड़ ने एक स्वर से हामी भरी थी ।
   मंच पर बैठे सारे नेता सियार चुनावी रण-क्षेत्र से होते हुए सत्ता के गलियारे में पहुँच गए । भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए ताकत की जरूरत होती है और ताकत इकट्ठा करने के लिए उन्होंने अपना-अपना वेतन कई-कई गुना बढ़ा लिया । अब टक्कर की लड़ाई थी । भ्रष्टाचार मजबूत था, तो ये भी कम मजबूत नहीं थे । ये रोज-रोज उसे आँखें दिखाने लगे । वह भी इन्हें घूरता रहा और इसी आँख-मिलाई में दो साल गुजर गए ।
   जंतर-मंतर एक बार फिर गुलजार हुआ । ‘भ्रष्टाचार का क्या हुआ’ जैसे प्रश्नों पर मुख्य नेता सियार गरजते हुए बोला, ‘भ्रष्टाचार बहुत ढीठ है दोस्तों, वह कई रूपों में मौजूद है, पर हम उसे छोड़ेंगे नहीं । हमने अंग्रेजों के डिवाइड एण्ड रूल की तरह एक पॉलिसी बनाई है-डिवाइड एण्ड किल । हम भ्रष्टाचार के कुछ रूपों को अपनी तरफ मिला लेंगे और उन्हें कमजोर करके मार डालेंगे । क्या इस पॉलिसी से सभी सियार सहमत हैं?’
   भीड़ ने सिर हिलाया । सहमति पाकर एक नेता सियार हाथ लहराते हुए बोला, ‘हम आम सियार थे, आम सियार हैं और सदा आम सियार बने रहेंगे ।’ नेताओं की ऐसी भावना सुनकर भीड़ गद्गद हो तालियाँ पीटने लगी ।

   जल्दी ही कुछ नेता सियारों के बंग्लों में भ्रष्टाचार दिखाई देने लगता है । आम सियार खुश हैं कि नेता सियारों के सिर पर अभी भी मैं हूँ आम सियार’ की टोपी सजी हुई है ।
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