जीवन व समाज की विद्रुपताओं, विडंबनाओं और विरोधाभासों पर तीखी नजर । यही तीखी नजर हास्य-व्यंग्य रचनाओं के रूप में परिणत हो जाती है । यथा नाम तथा काम की कोशिश की गई है । ये रचनाएं गुदगुदाएंगी भी और मर्म पर चोट कर बहुत कुछ सोचने के लिए विवश भी करेंगी ।

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गुरुवार, 16 फ़रवरी 2017

काम बोलता है...

                              
    पिछली बार भइया जी जब सत्ता में आए थे, तो अपने सारे नेताओं को निर्देश निर्गत किया था कि वे प्रत्येक कम से कम एक महंगी गाड़ी अवश्य ही हस्तगत कर लें । पूछने पर बताया था कि ऐसा दो कारणों से नितांत आवश्यक था । एक, नेता से लेकर आम जनता तक यह संदेश जाए कि सत्ता कोई सस्ती आइटम गर्ल नहीं है, जिसे कोई भी नचा ले । दो, विकास को रफ्तार दिया जा सके । गाड़ियाँ और गाड़ियों में नेता विकास के ज्वलंत उदाहरण हैं । इस बार उनका सपना है कि विकास को चौगुनी मात्रा और चौगुनी रफ्तार से जनता तक लेकर जाया जाए । इसके लिए जरूरी है कि कम से कम चार महंगी नई गाड़ियाँ एक नेता को प्राप्त हों । विकास जब नंगी आँखों से दिखाई देता है, तभी जनता यकीन करती है ।
    भइया जी का दावा है कि उन्होंने काम इतना किया है कि गणेश जी की कलम भी लिखते-लिखते थक जाए । काम बोले तो...विकास, विकास और केवल विकास । जिधर देखिए, उधर विकास की नदी प्रवाहित हो रही है । यह अलग बात है कि प्रकृति प्रदत्त नदियाँ या तो सूख रही हैं, या विकास की गंदगी से जूझ रही हैं, या जिनके प्रवाह येन-केन-प्रकारेण बाधित हो रहे हैं ।
    हम भी भइया जी के काम को खुर्दबीन से खोजते हुए उनके शानदार बंगले तक पहुँच गए । हमें देखते ही वह खदबदा उठे । कैमरे की नजर अपने ऊपर महसूस करते ही बोले, ‘सुना है कि हमारे सारे विरोधी बह गए हमारे विकास की दरियाओं में?’
    ‘कौन सी विकास की बात करते हैं आप?’ हमने पूछा, ‘हम तो ढूँढ़ते आ गए आपके घर तक, पर हमें तो कुछ नहीं दिखा ।’
    ‘कमाल करते हैं आप भी । चारों तरफ हमारा ही काम बिखरा पड़ा है । क्या उन कामों ने आपसे कुछ नहीं कहा?’ वह थोड़ा आक्रामक होते हुए बोले ।
    ‘रास्ते में तो हमें कोई काम नहीं मिला । इसीलिए हम जानना चाहते हैं कि आपने कौन-कौन सा काम किया?’ हमने माइक उनके मुँह के आगे कर दिया ।
    ‘जब काम हजार हों, तब उन्हें गिनवाने की गलती कोई समझदार इंसान कर सकता है भला? न हम उतना बोल पाएंगे, न आप उतना सुन पाएंगे ।’
    ‘चलिए, मान लेता हूँ कि यह संभव नहीं है । पर दस काम तो आप निश्चय ही गिनवा देंगे ।’ मैंने उनके आगे हथियार...मतलब माइक डालते हुए कहा ।
    ‘अपने मुख मियाँ मिठ्ठू बनना हम नहीं चाहते ।’ वह आत्म-मुग्ध होते हुए बोले, ‘हम अपने मुख से अपने काम का बखान क्यों करें, जब हमारा काम खुद बोल रहा हो । आप आँख बंद करके देखिए, हमारा काम हर तरफ दिखाई दे रहा है । कान बंद करके सुनिए, उसी की गूँज है चारों ओर ।’
    आँख बंद करते ही हमें अँधेरे के सिवा कुछ भी दिखाई नहीं दिया । अँधेरे से डर या डिस्टर्ब होकर हमने आँखें खोल दीं और पुनः काम पर चले आए । अपने काम को बढ़ाते हुए उनके काम के बारे में पूछा, ‘आप बताना नहीं चाहते, तो न सही । कम से कम दो काम तो गिनवा दीजिए, जो आपकी नजर में बहुत ऊँचा स्थान रखते हों ।’
    ‘देखिए, मेरे काम मेरी संतानों के समान हैं । कोई भी आदमी केवल दो की गिनती करवाकर बाकी को नालायक या नाजायज नहीं कह सकता । उसके लिए तो उसकी सभी संतान समान महत्व के होते हैं । अतः हम अपने दो कामों को गिनवाने की भूल कतई नहीं कर सकते । वैसे भी काम करने वाला इन गिनतियों के फेर में नहीं पड़ता ।’
    हम उनकी भावनाओं की कद्र करते हुए उनके द्वारा किए गए केवल दो कामों से पुनः पीछे हट गए और उन्हें उनकी महानता का लाभ देते हुए केवल एक पर आ टिके । मुख पर मुस्कान लाकर हमने पूछा, ‘कोई बात नहीं । आप केवल एक काम का नाम बता दीजिए, जो आम जनता की नजरों में भी काम ही हो ।’
    एक सुनते ही वह अनेक हो गए । वह इतनी जोर से हम पर चिल्लाए कि उनके  ही आदमी चारों तरफ । मैं एक, वह अनेक । हथियार ही हथियार । उनके हाथों में काम, मेरे मुँह में राम । वह मेरी आँखों में आँखें डालते हुए बोले, ‘एक...केवल एक काम पूछकर हमारा अपमान करने की तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई? क्या तुम्हें अभी भी सुनाई नहीं दे रही हमारे कामों की आवाज?’
    शायद पहली बार मुझे उनके बोलते काम दिखाई दिए थे । मैंने उनसे झूठ नहीं कहा कि उनके काम सचमुच बोलते हैं । मेरी आँखों में आगे के कामों के चित्र तथा कानों में उनकी आवाजें सिमटने लगे थे । शक काफूर हो चला था । अब उसका स्थान यकीन लेता गया था...चौगुनी रफ्तार से ।

मंगलवार, 17 जनवरी 2017

दंगल से मंगल

                       
erms.rcnc.org से साभार
  
     तीसरी बार उन फटेहाल, अधनंगों को आधा दर्जन पुरानी साड़ी-धोती खैरात-स्वरूप बाँटते ही मुझे आत्म-ज्ञान की प्राप्ति हो गई । मुझे लगा कि मैं भी खैरात बाँटकर लोगों का विकास कर सकता हूँ । कर क्या सकता हूँ, बल्कि मैंने तो कर दिया है । यह कमाल मैंने पूरी तरह स्वतंत्र रहकर किया है । आज न तो बापू की छत्रछाया थी मेरे पीछे और न ही उनका कोई मुलायम निर्देश । घर पहुँचते ही मैंने ऐलान कर दिया कि अब घर के सत्ता-सिंहासन पर केवल मेरा ही जूता आसीन होगा ।
    ‘किसी को कोई आपत्ति?’ मैंने अपनी निगाह घर के सदस्यों पर दौड़ाते हुए पूछा ।
    ‘मुझे आपत्ति है ।’ बापू की आवाज उभरी । वह सामने आते हुए बोले, ‘सत्ता पर मेरा अधिकार है । मैं उसका हस्तांतरण ही नहीं करूँगा ।’
    ‘मुझे उसकी परवाह नहीं है ।’ इस वक्त मेरा मजबूत आत्म-विश्वास बोल रहा था । उनकी आँखों में आँखें डालते हुए मैंने कहा, ‘इस काम के लिए मैं दंगल भी कर सकता हूँ आपसे ।’
    बापू का मुँह खुला तो खुला रह गया । वह उसी अवस्था में रहते हुए बोले, ‘तू मुझसे दंगल करेगा? अरे कपूत ! तू तो इतना भी नहीं समझता । कहीं दंगल से मंगल की कामना की जा सकती है भला !’
    ‘कलयुग का यही तो करिश्मा है बापू ।’ मैं पूरी तरह संयत रहते हुए बोला, ‘अब दंगल से ही मंगल होता है । आपने देखा नहीं, उधर राजधानी में क्या हुआ? मंगल के लिए ही तो सारा दंगल मचाया गया । बाप के खिलाफ खड़ा होना...मतलब मजबूत होकर उभरना । बाप के खिलाफ मुलायम होकर खड़ा होने से नहीं, बल्कि अखिल मजबूती से खड़ा होने पर ही इमेज-बिल्डिंग होती है ।’
    ‘पर वह राजनीति का अखाड़ा है । परिवार में उन राजनीतिक बातों का कोई औचित्य नहीं ।’ बापू ने अगला दांव चलते हुए कहा ।
    मैं भी उसी बापू का बेटा था । दांव की काट करते हुए बोला, ‘जब राजनीति में परिवार हो सकता है, तो परिवार में राजनीति क्यों नहीं?’
    ‘पर परिवार में सबकी राय ली जाती है, सबके हित के लिए समान भाव से काम किया जाता है । इसी को परिवारवाद कहते हैं । समाजवाद का मूल भी यही है ।’
    ‘मैं भी उसी समाजवाद को मजबूत करना चाहता हूँ...आपके मार्गदर्शन में । मैं चाहता हूँ कि प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से आप अपनी सत्ता का हरण करने में मेरा मार्ग-दर्शन करें ।’
    और अगले ही पल दंगल की प्रभावी स्क्रिप्ट-राइटिंग के लिए मैं परिवार के सदस्यों की एक आपात बैठक आहूत करता हूँ ।
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