जीवन व समाज की विद्रुपताओं, विडंबनाओं और विरोधाभासों पर तीखी नजर । यही तीखी नजर हास्य-व्यंग्य रचनाओं के रूप में परिणत हो जाती है । यथा नाम तथा काम की कोशिश की गई है । ये रचनाएं गुदगुदाएंगी भी और मर्म पर चोट कर बहुत कुछ सोचने के लिए विवश भी करेंगी ।

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शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2016

खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचे

                   
   सिंहासन की ओर देखते-देखते आँखें पथरा गई हैं । युवराज सियार को तो बस खाट का ही सहारा है । खाट की हिमाकत इतनी कि वह उन्हें काट रही है । एक चादर भला कितनी सुरक्षा प्रदान कर सकती है । जिसका जन्म सिंहासन पर बैठने के लिए हुआ हो, वह खाट पर बैठे-यह सच्चाई क्या कम है कुछ चुभने-काटने के लिए । चादर सरक गई है, मगर युवराज को होश नहीं है । उनके मन में आँधियाँ चल रही हैं । चेहरा भी विध्वंस के प्रभाव को फैलाने में लगा हुआ है । उन्हें इंतजार है खबरी खरगोश का । उनके मन की चीजों को वही पहुँचा सकता है, तटस्थ रूप से आडियंस तक । अब जनता ही जनार्दन बनके फैसला करे ।
   तभी खबरी खरगोश अपने ताम-झाम के साथ पहुँचता है और तत्काल युवराज से मुखातिब होता है । ‘हाँ तो युवराज, खबर आ रही है कि सरकार के शल्य-प्रहार पर ही आपने अपना वाक्-प्रहार ठोंक दिया है । क्या यह खबर सही है?’
   ‘सौ फीसदी सही खबर है ।’ युवराज ने अपने कुर्ते की आस्तीन चढ़ाते हुए कहा, ‘हम क्या करते? सरकार ने हमें मजबूर कर दिया ।’
   ‘मगर शत्रु पर शल्य-प्रहार करने के लिए तो आप ही सरकार को ललकार रहे थे ।’ खबरी खरगोश तुरंत अपना प्रश्न दागता है । वह पूछता है, ‘क्या सरकार को कोसने और ललकारने के लिए आपने अपने प्रवक्ता घड़ियालों को मैदान में नहीं उतार रखा था? उस वक्त तो खूब ललकार-ललकारकर...’
   ‘हाँ, पर हमें क्या पता था कि सिंहासन पर बैठा जीव एकदम से फन्ने खाँ हो जाएगा ।’ युवराज बीच में ही बोल उठते हैं, ‘हम तो समझे थे कि हमारे पूर्वजों की तरह वह भी सफेद कबूतर बना रहेगा ।’
   ‘सफेद कबूतर बने रहने का मतलब...?’
   ‘हमारे पूर्वजों की बात और थी । समय दूसरा था, मगर यह तो फँसा हुआ था जनता के आक्रोश के बीच । हम ललकार जरूर रहे थे, पर दिल से चाहते थे कि वह हाथ पर हाथ धरे बैठा रहे और उसे कायर साबित किया जा सके ।’
   ‘तो क्या सरकार के शत्रु पर प्रहार और आपके खेमे में दुख के संचार के बीच कोई सम्बन्ध भी दिखाई देता है आपको?’ खबरी अगला प्रश्न दागता है ।
   ‘बाल की खाल तो खूब निकालते हो, पर यह मामूली बात भी समझ में नहीं आती । अरे, उसने शत्रु पर हमला नहीं बोला है, बल्कि हमारे भविष्य पर ही हमला बोल दिया है । वह परोक्ष रूप से हमें भी मारना चाहता है ।’
   ‘यह तो वही बात हुई कि आपका छोड़ा हुआ आप ही को तोड़ने लगा ।’ खरगोश चुटकी लेता है और अगला प्रश्न पूछता है, ‘आपके वाक्-प्रहार पर सोशल मीडिया में जमकर प्रहार हो रहा है । ऐसा क्यों होता है कि आपकी कही हर गलत बात को सही साबित करने के लिए आपके प्रवक्ता मैदान में कूद पड़ते हैं? क्या वे अभिशप्त हैं ऐसा करने के लिए?’
   ‘अभिशप्त नहीं, वरदान प्राप्त है उन्हें । यह उनका सौभाग्य है कि वे हमारी चरण-सेवा में हैं । हम न होते, तो वे भी न होते । इतने बरसों तक सत्ता का सुख लूटते रहे । यह हमारे परिवार के नाम के बिना कतई सम्भव नहीं था । आगे भी सुख लिखा होगा, तो हमारे ही...’
   ‘फिर भी आपका वक्तव्य क्या आपके खानदान के संस्कारों के अनुरूप है?’
   ‘सरकार बदल जाती है, तो संस्कार भी बदल जाते हैं । सत्ता से बाहर रहने के बावजूद हमीं से संस्कार और मर्यादा की अपेक्षा? युवराज लानत भरी निगाह डालते हैं खबरी खरगोश पर ।
   तभी खबरी कह उठता है, ‘आपके कहने का अभिप्राय यह है कि सत्ता से बाहर बैठे व्यक्तियों को मर्यादा और संस्कार के झमेले में नहीं पड़ना चाहिए । सत्ता में बैठे लोगों पर गलत-सही हमला ही असली संस्कार होना चाहिए । खैर, अंतिम प्रश्न आपसे । क्या वजह है कि हर बात का दोष आप सरकार के मुखिया पर ही थोपते हैं? मजदूर हो या मजलूम, किसान हो या जवान, दलित हो या पिछड़ा-सब की समस्याओं के लिए आप सिर्फ और सिर्फ सरकार के मुखिया को ही गाली देते हैं, जबकि दोष खुल्लम-खुल्ला प्रांतीय सरकारों का होता है ।’
   यह सुनते ही युवराज के चेहरे का रंग बदलकर एकदम लाल हो उठता है । जैसे किसी ने उनकी दुखती रग पर गरम तवा ही रख दिय़ा हो । वह खाट पर खड़े होकर चिल्लाते हैं, ‘सत्ता पर हमारा पुश्तैनी अधिकार था । हम हैं सिंहासन के एकमात्र स्वामी, जिस पर उस जीव ने कब्जा जमा लिया है, जिसे तुम सरकार का मुखिया कहते हो । वह अनधिकृत रूप से बैठा हुआ है हमारे सिंहासन पर । ऐसे में उसके लिए गाली नहीं निकलेगी, तो क्या प्रशंसा की ताली निकलेगी?’
   खबरी खरगोश को समझते देर नहीं लगती । वह आज आखिर पहुँचने में सफल हो गया लगता है युवराज के मन के भीतर । वह तो खिसियानी बिल्ली बने बैठे हैं । वह कैमरा पर्सन के साथ तेजी से भागता है स्टूडियो की तरफ । खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचे शीर्षक से जबर्दस्त टीआरपी-बटोरू मसाला तैयार है ।

मंगलवार, 26 जुलाई 2016

झपकी पर हाय-तौबा...ना रे ना

                
   साधो, संसद में बाबा को झपकी क्या आई, चमक-सी आ गई मीडिया के चेहरे पर और उसके फ्लैश चमकने लगे । सोता हुआ कैमरामैन जाग उठा । मछली बाजार की तरह संसद के भयानक कोलाहल के बीच भी जिसे गहरी निद्रा आ गई थी, उसे बाबा की निद्रा ने जगा दिया । चारों तरफ शोर मच गया । दलित-चिंतन के दौरान बाबा सोते हुए पकड़े गए । शोर ऐसा मचा, मानो किसी के घर में सेंध लगाते वक्त उन्हें पकड़ लिया गया हो, वह भी रंगे हाथों । मगर किसी ने यह नहीं सोचा कि मीडिया आखिर कर क्या रही थी । जानकार लोगों का कहना है कि कुछेक कैमरामैन संसद की कार्रवाई के बजाए कैमरे को बाबा पर फोकस करके इत्मीनान से निद्रा की गोद में चले गए थे । उन्हें पक्का यकीन था कि संसद की उबाऊ कार्रवाई से कहीं बड़ा मसाला बाबा से हासिल हो जाएगा ।
   झपकी लेना जब बुरी बात नहीं है, तब इतना हंगामा-सा क्यों बरप गया ! सभी जानते हैं कि जागरण में क्या होता है । जागरण का मतलब खुद जागना और दूसरों को जगाना होता है । संसद का जमावड़ा भी इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए होता है । खैर, जागरण में जागने के लिए अपने मुँह के सुरों और ढोलक-झाँझ-मजीरे की आवाजों को इतनी बुलंदी तक पहुँचाया जाता है कि निकट और दूर के सोए हुए सौभाग्यशाली भी निद्रा का परित्याग करके जागृति को प्राप्त हो जाएं तथा सुख के अतिरेक में आँखों को लाल कर लें, दाँत पीसने लगें और मुठ्ठियों को भींचने लगें । जगाने की इतनी कोशिश के बावजूद कुछेक जागरण-वीर ऐसे अवश्य होते हैं, जो निद्रा-लोक की सैर पर निकल लेते हैं । वे उस सत्य के अनुगामी होते हैं, जिसके अनुसार सोने के बाद ही जागरण घटित होता है । जिसने सोना नहीं सीखा, वह क्या जागेगा !
   सोना सचमुच सोना होता है । इस बात की तस्दीक के लिए सरकारी दफ्तरों से बेहतर जगह भला और क्या हो सकती है । कई पहुँचे हुए बाबुओं को यह अच्छी तरह ज्ञात होता है कि झपकी लेने का क्या महत्व है दफ्तरों में । वे पूरी निष्ठा से झपकी लेते रहते हैं । काम करवाने के लिए आया व्यक्ति अतिरिक्त मुद्रा का ट्रांसफर करता है अपनी जेब से बाबू की जेब में । तब जाकर वह जागरण को प्राप्त होता है । जागना भी इसी को कहते हैं । सोने का महत्व यहाँ इतना है कि सोने से जागने पर सोने की उपलब्धि होती है । सोने वाले बाबू न होते, तो सरकारी दफ्तरों की प्रतिष्ठा इतनी बुलंदी तक कभी न पहुँची होती । काम करने से कोई ऊँचाई तक नहीं पहुँचता । जिसे भी ऊँचाई तक पहुँचने का जुनून है, उसे काम न करने और झपकी लेने की कला में निष्णात बाबुओं से दीक्षा ग्रहण करनी चाहिए ।
   अपने को विशेषज्ञ कहने वाले लोग भी बताते हैं कि झपकी लेने से तन-मन को राहत पहुँचती है । काम के दौरान झपकी के कुछेक डोज काम के प्रति अपनेपन व उत्साह को बढ़ाते हैं । बाबा अपने उत्साह को बढ़ाना चाहते थे, ताकि दलित-चिंतन को एक नया आयाम दे सकें । अतः उनका झपकी लेना निहायत ही जरूरी था । झपकी लेने से उनका उत्साह इस विकट रूप से बढ़ा कि वह दौड़ते हुए गुजरात पहुँच गए दलितों के बीच ।
   एक और लाभ दिखा झपकी लेने का । उन्हें नींद में गाफिल देखकर उनके संसद-बाँकुरे सैनिकों ने समझा कि वह समाधि लगाकर कोई दिव्यास्त्र लाने वाले हैं, अतः महाजोश के अतिरेक में फँसकर उन्होंने पूरे सदन को अपने सिर पर उठा लिया । कोलाहल के बीच एकाग्रता और झपकी के तीर कोई निद्रा-वीर या पहुँचा हुआ फकीर ही छोड़ सकता है ।

   झपकी लेना हर तरह से फायदे का सौदा है, अतः कायदे से इसे कीजिए । आराम से झपकी लीजिए और दूसरों को भी लेने दीजिए । बाबा पर मीडिया की इस तरह की कुचेष्टा ठीक नहीं है ।
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