जीवन व समाज की विद्रुपताओं, विडंबनाओं और विरोधाभासों पर तीखी नजर । यही तीखी नजर हास्य-व्यंग्य रचनाओं के रूप में परिणत हो जाती है । यथा नाम तथा काम की कोशिश की गई है । ये रचनाएं गुदगुदाएंगी भी और मर्म पर चोट कर बहुत कुछ सोचने के लिए विवश भी करेंगी ।

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मंगलवार, 19 जुलाई 2016

...जब बिजली कड़की अपने छप्पर

          
   ‘आप पत्रकार लोग भी तिल का ताड़ बनाने के उस्ताद होते हैं ।’ उन्होंने मुझे देखते ही ताना मारा ।
   ‘पर आतंकवाद को आप तिल कदापि नहीं कह सकते । वह तो कब का ताड़ बन चुका है ।’ मैंने प्रतिवाद करने की कोशिश करते हुए कहा । दरअसल इस वक्त मैं एक बुद्धिजीवी के सामने खड़ा था । उनके बारे में केवल मैं ही नहीं, पूरा समाज जानता है कि वह बुद्धिजीवी हैं, क्योंकि उलट-खोपड़ी रखने वाला व्यक्ति बुद्धिजीवी ही होता है । उन्हें बुद्धिजीवी न मानने वाले विरोधी भी मानते हैं कि वह बुद्धिजीवी हैं, क्योंकि जुगाड़ भिड़ाकर अब तक तकरीबन आधे दर्जन पुरस्कारों को अपने ड्राइंग-रूम के शीशे की आलमारी में कैद कर चुके हैं । अपने स्वार्थ के बाधित होने पर चिल्लाना और सामाजिक हित के मुद्दे पर आपराधिक चुप्पी साध लेना उन्हें बुद्धिजीवी ही साबित करते हैं ।
   ‘ताड़ तो आप लोगों ने बनाया है आतंक-आतंक चिल्लाकर ।’ उन्होंने मेरी आँखों में आँखें गाड़ दीं और आक्रोश भरे स्वर में बोले, ‘कभी जानने की कोशिश की है आतंक के पीछे की मजबूरी? क्या आपने कभी सोचा है कि आतंक के पीछे मासूमियत का एक कोमल चेहरा तैर रहा होता है?’
   ‘मैं समझा नहीं आप कहना क्या चाहते हैं? निपट मूर्ख की तरह मुँह बनाते हुए मैंने पूछा, ‘क्या आतंक का मासूम चेहरा भी होता है?’
   ‘आतंक के पीछे मासूमियत-ही-मासूमियत है । मुद्दा आतंकवाद नहीं है । मुद्दा तो यह है कि मासूम और निर्दोष लोग आतंकवादी क्यों बनते हैं । सरकार मनमानी न करे, तो कोई समस्या ही नहीं होगी । यह तो सरकार ही है, जो आतंकवाद फैला रही है । मुद्दा वास्तव में सरकारी आतंकवाद का है ।’
   ‘पर मार-काट को आप मासूमियत से भरा कैसे कह सकते हैं?’
   ‘अपने मानवाधिकार की रक्षा के लिए शस्त्र उठाना ही पड़ता है । सरकार हर जगह मानवाधिकारों का उल्लंघन कर रही है । ऐसे में जो मानव होगा, वह अवश्य उठ खड़ा होगा ।’ कहते-कहते उनके चेहरे पर आक्रोश के भाव उभर आए थे ।
   ‘मगर अपने मानवाधिकारों की रक्षा के लिए किसी को भी मार डालना मानव का नहीं, दानव का काम है ।’ मैं भी तनिक तैश में आ गया था यह कहते-कहते ।
   ‘मैंने कहा न कि मानवाधिकार की रक्षा मानव का धर्म है और धर्म-रक्षार्थ शस्त्र उठाना पूर्णतः न्यायसंगत है । इस धर्म-कार्य में यह नहीं देखा जाता कि अपना मर रहा है या पराया ।’
   ‘आप आतंकवाद को मानवाधिकार से बाहर भी कहीं देखते हैं? क्या आपको नहीं लगता कि आजकल आतंकवादी कुछ ज्यादा ही मानवाधिकारों की रक्षा में रेल-पेल हुए जा रहे हैं?’
   ‘हाँ, कुछ लोग जरूर पथ से भटक गए हैं, पर उन्हें मारकर सही रास्ते पर नहीं लाया जा सकता । समझाना-बुझाना ही सर्वोत्तम नीति है ।’
   ‘जो मानने को तैयार न हो और दहशत फैलाना ही जिसका लक्ष्य व धर्म हो...’
   ‘उसे भी समझाना ही चाहिए । आपको याद रखना होगा कि अधिकांश ऐसे लोग नौजवान हैं । नौजवानों को कोई सरकार कैसे मार सकती है?’
   ‘आतंकवादी तो आतंकवादी है..क्या बूढ़ा, क्या नौजवान ! उसे मार डालना ही उचित है, बनिस्बत कि उसे तंदूरी चिकेन और बिरयानी खिलाया जाए ।’
   ‘आप सरकार और मूर्ख की भाषा बोल रहे हैं । मृत व्यक्ति जीवित से ज्यादा खतरनाक होता है । आदमी भूत से मुकाबला नहीं कर सकता ।’ इतना कहकर वह चुप हो गए । तभी स्टूडियो से निर्देश आने लगा था । शहर में आतंकवादी हमला हुआ था और मुझे तत्काल वहाँ पहुँचना था । मुझे यह भी जानकारी दी गई कि इस बुद्धिजीवी का पुत्र भी हमले में बुरी तरह घायल है और उसे अस्पताल ले जाया गया है ।
   यह खबर पाते ही उनका आश्वस्ति-भाव तिरोहित हो गया अचानक और वह किसी ज्वालामुखी की तरह फट पड़े । चीखते हुए बोले, ‘आखिर सरकार कर क्या रही है... इन्हें देखते ही मार क्यों नहीं डालती?’ और वह अस्पताल की तरफ भागने लगे थे...बेतहाशा ।

   मैं भी पीछे-पीछे दौड़ा । मैं उनसे कहना चाहता था कि जब अपने पर बीतती है, तब असलियत समझ में आती है, अन्यथा बुद्धि की कैंची चलाना कितना आसान होता है । मगर ऐसा कुछ कहने का यह वक्त नहीं था, क्योंकि कुछ और होने से पहले मैं एक मनुष्य था ।

शुक्रवार, 15 जुलाई 2016

ईमानदारी गई तेल लेने, तुम चलो बेल लेने



   आशीर्वाद दीजिए माता कि मैं आपके चरण-चिह्नों पर बिना भटके चल लकूँ और आपके इशारों को हू-ब-हू समझते हुए उसी के अनुरूप कार्य कर सकूँ ’ गुरूमाता लोमड़ी के चरणों में सिर रखकर भेड़ ने कहा ।
   मेरा आशीर्वाद सदा तुम्हारे साथ है । हमारे कार्यों की सिद्धि के लिए आज से तुम्हें मौन व्रत धारण करना होगा । मौन से तुम्हे असीम ऊर्जा प्राप्त होगी । धरती इधर से उधर हो जाए, ज्वालामुखी फटे, अग्नि तांडव करे, जल-प्रलय हो या आँधियां अंधी हो जाएं, पर तुम्हारा मौन यथावत बना रहे । धर्म रहे न रहे, लेकिन मौन सदा रहना चाहिए । आगे वन की जनता में तुम मौनी बाबा के रूप में विख्यात होगे । अब तुम जाओ और वन का कल्याण करो ’ कहते हुए गुरूमाता ने आँखें मूँद लिय़ा । यह उनकी तरफ से जाने का इशारा था ।
   गुरूमाता के प्रसाद-स्वरूप प्राप्त दैवीय रथ पर सवार होकर भेड़ अपने आश्रम की तरफ बढ़ गये । आश्रम में ऐशोआराम के सारे साधन मौजूद थे । अतः साधना के लिए ध्यान लगाने में कोई दिक्कत नहीं हुई । मौन ही तो धारण करना था । मौन- साधना में  छः माह बीत गए । वह प्रसन्न थे कि कोई भी विघ्न-बाधा उनके निकट आने का साहस नहीं जुटा पाई थी ।
   शाम का समय था और शीतल मंद वायु आत्मा तक को शीतल किए जा रही थी । वह बाहर निकलकर आश्रम के विशाल प्रांगण में विचरने लगे थे । सामने पक्षियों की एक लम्बी कतार तेजी से अपने घरों की तरफ बढ़ रही थी । एक-एक फूलों पर हाथ रखते वह आगे बढ़ रहे थे । आश्रम के आसपास के पेड़ों ने झुकना शुरू कर दिया था । उनकी ऐश्वर्यशीलता और मौन की साधना से वे अत्यन्त प्रभावित थे । उन्होंने मौनी बाबा कहना शुरू क्या किया, हवाओं के थपेड़े इसे दूर-दूर तक पहुँचा आए । मौन साधना का मुखर प्रसार-प्रचार वन के कोने-कोने तक हो गया । वह और आगे बढ़ते कि सरसराहट की आवाज सी आई एक दिशा से । उन्होंने ध्यान से देखा, गुरूमाता का एक खास सेवक पेड़ों की ओट में जाता दिखाई दिया । वह कई निर्दोष और निहत्थे वन-जनों को एक गड्ढे में दफन कर रहा था । आँखें बंद होती चली गईं उनकी । वक्त की नजाकत को उनकी आँखों से बेहतर भला और कौन समझ सकता था !
   कुछ और आगे बढ़ने पर एक और नजारा दिखाई दिया । गुरुमाता के चार-पाँच सेवक वन की कुछ स्त्रियों का खुल्लमखुल्ला चीरहरण कर रहे थे । उन्हें एकबारगी लगा कि यह ठीक नहीं है, पर दूसरे ही पल उनकी आत्मा जाग गई । यह आमजन बनाम खासजन का मामला था । आमजन के बनने में कोई पहाड़ नहीं तोड़ना पड़ता, पर खासजन तो हजारों पापड़ बेलने के बाद बनते हैं । जब खासजन से आमजन का धर्म टकराए, तो खासजन के धर्म की रक्षा हर हाल में की जानी चाहिए । एक बार फिर आँखें मूँदना उन्हें सर्वथा उचित लगा ।
   उन्हें संतोष था कि यह सब देखकर भी उनका मौन भंग नहीं हुआ था, अन्यथा लज्जा का आईना उन्हें गुरुमाता की नजरों से दूर कर देता । फिर भी कोई उधेड़बुन थी, जो मन को मथे जा रही थी । रात अपने तीसरे प्रहर में प्रवेश कर गई थी, पर नींद के रथ का दूर-दूर तक नामों-निशान नहीं था । वह धीरे-धीरे आता हुआ भी दिखाई नहीं दिया । पर सन्नाटे को बेधती आवाजें तेजी-से आने लगी थीं । कहीं कुत्तों की आवाज, तो कहीं सियारों का सियापा । एक तरफ चमगादड़ों की फड़फड़ाने की आवाज, तो दूसरी तरफ पंचम सुर में झींगुरों की झिनझिनाहट ।
   वह बाहर निकल कर देखना चाहते थे रात की बढ़ती जाती विक्षुब्धता को । कौन है जो शांत पड़ चुके जल में पत्थर फेंके जा रहा है । वह उठे ही थे बाहर निकलने को कि कोई अंदर आता दिखाई दिया था । वह एक साथ कई बोरों को घसीट रहा था । अंदर आते ही सीएफएल की रोशनी में बोरों की पहचान उजागर हो गई थी । नोटों से भरे बोरों पर कोयले की उजास,  पानी की कालिमा, संचार की सच्चाई... लिखा हुआ था । लाने वाला मंत्री व गुरुमाता का अपना आदमी था । वह फुसफुसाते हुए बोला, गुरुमाता की आज्ञा है । अतः इन्हें यहीं रखना है । अफ्रीकी वनों में भेजने से पूर्व एक निरापद जगह की तलाश थी । आपकी ईमानदारी की छाया साया बनकर इसकी रक्षा करेगी ’ और यह कहते हुए वह जिस तेजी से आया था, उसी तेजी से निकल गया ।
   उन्हें समझते देर नहीं लगी थी कि घोटाले के ताले ही लगे हुए हैं बोरों में । घोटालों और ईमानदारी का क्या मेल ! पर उनकी ईमानदारी आज घोटालों के काम आ रही है, इस सोच ने उन्हें तृप्ति प्रदान की थी । उन्हें इस बात का भी अभिमान हो आया कि उनकी ईमानदारी अब भी य़थावत है । इस बार आँखें मूँदते ही उन्हें यमदूत दिखाई दिए थे । यमदूतों को देखते ही उनका मौन भंग हो गया । तुम लोग मुझे घसीटते हुए नहीं ले जा सकते । मेरी मौन साधना और ईमानदारी क्या दिखाई नहीं देती तुम लोगों को?’

   ईमानदारी जब अत्याचार, अनाचार को देखकर आँखें मूँद लेती है, तो उसका मौन उसके लिए मौत बन जाता है । इसीलिए हम तुम्हें लेने आए हैं । तुम्हारी ईमानदारी गई तेल लेने, अब तुम अपने बेल की तैयारी करो । महाराज यमराज ने आज्ञा दी है कि तुम जैसे ढोंगी को कांटों पर घसीटते हुए लाया जाए ।’ अगले ही पल वे उन्हें कांटों पर घसीटने लगे थे । मौनी बाबा के कलपते कंठ गुरुमाता की पुकार करने लगे थे, पर किसी ने उनकी आवाज को नहीं सुना था । समूचा वन-प्रांत शांत पड़ा हुआ था ।
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