जीवन व समाज की विद्रुपताओं, विडंबनाओं और विरोधाभासों पर तीखी नजर । यही तीखी नजर हास्य-व्यंग्य रचनाओं के रूप में परिणत हो जाती है । यथा नाम तथा काम की कोशिश की गई है । ये रचनाएं गुदगुदाएंगी भी और मर्म पर चोट कर बहुत कुछ सोचने के लिए विवश भी करेंगी ।

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शनिवार, 24 सितंबर 2016

समाजवाद का प्रहसन

                    
                          दृश्य-एक
   ( स्थान- दरबार-ए-खास । महाराज सियार सिंहासन पर चिपके हुए हैं । मुट्ठियां हत्थों पर कसी हुई हैं । सामने आसनों पर महाराज के अपने लोग विराजमान हैं । सभी की आँखें बाहर की ओर लगी हुई हैं । तभी खबरी खरगोश दरबार में प्रवेश करता है, बहैसियत सरकारी अखबार के प्रतिनिधि के रूप में ।)
खबरी खरगोश- महाराज की जय हो । खबर उड़ी है महाराज कि आपने दो मंत्रियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया है । चुनाव के ठीक पहले क्या इसे उचित कदम माना जा सकता है?
महाराज- बेशक, इसे उचित कदम न मानना मूर्खता होगी । उचित कदम के लिए हर समय उचित होता है । भ्रष्टाचार को किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जा सकता । जो भ्रष्ट हैं, उन्हें जाना होगा बाहर ।
खबरी- पर वे मंत्री तो पिछले चार साल से भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे हुए थे, कार्रवाई अब जाके क्यों?
महाराज- कार्रवाई समाजवाद का तकाजा थी । समाजवाद बेसब्र नहीं है । उसमें धीरज धारण किए रखने की अपूर्व क्षमता है । उसने धैर्यपूर्वक भ्रष्टाचार को देखा और अंततः कार्रवाई कर दी ।
खबरी- ( कैमरा की ओर मुखातिब होकर ) तो देखा आपने समाजवाद और महाराज की सक्रियता ! महाराज न्यायप्रिय व्यक्ति हैं । उन्होंने भ्रष्टाचार को भी भरपूर मौका दिया फलने-फूलने और अपनी सफाई देने का । इतने दयालु और न्यायप्रिय व्यक्ति पर क्या निष्क्रियता का आरोप उचित है?
    (इस कथन के साथ ही पर्दा गिरता है ।)
                         दृश्य- दो
   ( स्थान- राजपिता सियार का महल । राजपिता अपने आसन पर चिंता-भाव के साथ बैठे हुए हैं । चचा सियार खड़े-खड़े फुफकारते साँप हो रहे हैं । अपने और पराए-दोनों बेचैनी के आलम में जमीन पकड़े हुए हैं, ताकि वे समाजवाद को किसी भी सूरत में उसमें समाने से रोक सकें ।)
खबरी खरगोश- चचा सियार, आपके दो आदमी बाहर हो गए हैं । बाहर वे बालू को हथेलियों में बाँधे जा रहे हैं और इधर आपका भी बोरिया-बिस्तर बँध गया । आपके विभाग छीनकर आपको भी बेरोजगार कर दिया गया है । क्या आप अब भी...?
चचा सियार- देखिए, हम समाजवादी लोग विभाग के चक्कर में नहीं पड़ते । चूँकि समाजवाद पर खतरा आन पड़ा है, इसलिए हमें बाकी पदों से इस्तीफा देना ही होगा । राजपिता के सामने हमने इस्तीफे का प्रस्ताव कर दिया है ।
खबरी- ( राजपिता की ओर मुड़कर ) क्या आप इस्तीफे को स्वीकार करने जा रहे हैं? इसके बाद समाजवाद का क्या होगा? क्या आप मानेंगे कि एक बार फिर समाजवाद खतरे में है?
राजपिता- समाजवाद पर कोई खतरा नहीं है । जहाँ तक इस्तीफे की बात है, उसे हम कतई स्वीकार नहीं करेंगे । इसी में समाजवाद की भलाई है ।
   ( राजपिता और चचा सियार के बीच कुछ देर खुसर-पुसर होती है । तनाव दोनों के चेहरों से अचानक गायब हो जाता है । खुसर-पुसर के प्रतिफल के रूप में जो फॉर्मूला निकलकर आता है, उसे खबरी खरगोश को थमा दिया जाता है । इसी के साथ पर्दा गिरता है ।)
                      दृश्य- तीन
   स्थान- महाराज सियार का दरबार-ए-खास । महाराज के चेहरे पर हल्के मुस्कान के छींटे दिखाई दे रहे हैं । मंत्रीगण भी कुछ राहत की अवस्था में हैं ।)
खबरी खरगोश- महाराज, सुना है कि आप बर्खास्त मंत्रियों को जल्द ही बहाल करने वाले हैं?
महाराज- हमने तो बहाल कर भी दिया । मीडिया ही खबर चलाने में पीछे रह गई । (यह कहते हुए महाराज ठठाकर हँसते हैं ।)
खबरी- पर इससे तो समाजवाद को बहुत नुकसान होगा । एक तरह से आपने भ्रष्ट आचरण को गोद में लाकर बिठा दिया ।
महाराज- समाजवाद कोई फूस की झोपड़ी नहीं है, जिसे कोई भी गिरा दे । यह तो सोने का मजबूत महल है, जिसे हमने मेहनत से बनाया है ।
खबरी- उस वक्त भ्रष्ट मंत्रियों को बाहर करना समाजवाद के हित में था, तो आज उन्हें अंदर लेना किसके हित में है?
महाराज- समाजवाद के हित में । इसका हित तो हम समाजवादी ही बेहतर समझ सकते हैं । कोई भी वाद समाज-निरपेक्ष नहीं होता । बर्खास्त करना भी समाजवाद के हित में था और बहाल करना भी उसी के हित में है ।
   ( खबरी खरगोश समाजवाद की इस नई व्याख्या को दर्शकों तक पहुँचाने के लिए कैमरे की ओर मुँह करता है । उधर पर्दा भी गिरना शुरु हो जाता है ।)
                       दृश्य- चार
   (स्थान- राजपिता सियार का महल । राजपिता महाराज सियार से पार्टी के अध्यक्ष की माला छीनकर चचा सियार को पहना रहे हैं । चचा और उनके चेले-चपाटी गद्गद् अवस्था में खड़े हैं ।)
खबरी खरगोश- आखिर इस माला का हस्तांतरण क्यों?
राजपिता सियार- दरअसल महाराज सियार के गले में कई मालाएँ हो गई थीं, जिनके बोझ से वह असंतुलित हो रहे थे । उनके संतुलन को बहाल करने के लिए एक-आध मालाएँ इधर करना अनिवार्य हो गया था । अब उनके कदम भी नहीं लड़खड़ाएंगे और इधर बोझ के कारण चचा सियार भी ज्यादा नहीं उछलेंगे ।
खबरी- (चचा सियार की ओर मुड़कर) माला की जिम्मेदारी निभाने के लिए आप क्या करने वाले हैं?
चचा सियार- हमने तो कर भी दिया । महाराज के करीबी भ्रष्ट लोगों को उनके पदों से हटाने का हुक्म अभी-अभी ही भेजा है । वे लोग जमीनों पर कब्जा किए बैठे थे । इस कारण समाजवाद का बहुत नुकसान हो रहा था ।
खबरी- अब चुनाव में किसकी चलेगी?
चचा- देखिए, परीक्षा महाराज की है, तो हमारी भी है, बल्कि पार्टी के अध्यक्ष की वजह से बड़ी परीक्षा हमारी है । अतः हमारी ही ज्यादा चलेगी ।
   (चचा सियार मजबूत कदमों से मंच के दाहिनी ओर रुख करते हैं । उनके साथ समर्थक नारे लगाते हुए आगे बढ़ते हैं । पर्दा गिरता है ।)
                    दृश्य- पाँच
   (स्थान- दरबार-ए-खास । एक-दूसरे से नजरें चुराने वाले महाराज और चचा एक-दूसरे को मुस्कुराकर देखते हुए खड़े हैं । दोनों की सेनाएँ होली-मिलन के माफिक सट कर खड़ी हैं ।)
खबरी खरगोश- कल तक आप लोग एक साथ होने पर भी अलग-अलग उत्तर-दक्षिण दिशाओं को देखा करते थे । आज दोनों एक-दूसरे को...!
महाराज- उसके लिए भी समाजवाद ही मुख्य कारण था । हम उसे हर दिशा में फैलाना चाहते थे, इसीलिए हमारी नजरें अलग-अलग दिशाओं में जमी हुई थीं । समाजवाद की खातिर हमें बहुत कुछ करना होता है ।
चचा सियार- अब हमारे रास्ते एक हैं । लक्ष्य एक है । चुनाव को बेधना जरूरी है । हमारे बीच जो कुछ भी हुआ, उसके मूल में समाजवाद की ही चिंता थी । आज यहाँ खड़े हैं, तो केवल उसी की खातिर ।
खबरी- पर वे पिछले दिनों के प्रहसन...?
महाराज- मीडिया गम्भीर होती, तो उसे सब कुछ प्रहसन नहीं दिखाई देता । मीडिया की इस बात के लिए हम भला क्या कर सकते हैं !

खबरी- (कैमरे की तरफ मुड़कर) तो देखा आपने । जिसे आप नाटक समझ रहे थे, वह दरअसल समाजवाद की जोर-आजमाइश थी...अपने अस्तित्व के विस्तार के लिए  कैमरा-पर्सन छछूँदर के साथ मैं खबरी खरगोश...(और पर्दा गिरता चला जाता है ।)
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