जीवन व समाज की विद्रुपताओं, विडंबनाओं और विरोधाभासों पर तीखी नजर । यही तीखी नजर हास्य-व्यंग्य रचनाओं के रूप में परिणत हो जाती है । यथा नाम तथा काम की कोशिश की गई है । ये रचनाएं गुदगुदाएंगी भी और मर्म पर चोट कर बहुत कुछ सोचने के लिए विवश भी करेंगी ।

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मंगलवार, 16 मई 2017

नीले सियार का भ्रष्टाचार

  
   पत्रकार-वार्ता में इस वक्त जबर्दस्त भीड़ है । पत्रकारों की संख्या तो उंगलियों पर गिनने लायक है, किन्तु मंत्रियों-सभासदों की ढेर लगी हुई है । वही पत्रकार बुलाए गए हैं, जो प्रश्न पूछते समय दिमाग का इस्तेमाल ज्यादा न करते हों । गड़े मुर्दे उखाड़ने वाले पत्रकार तो कतई नहीं बुलाए गए हैं । वास्तव में महाराज और उनकी पार्टी का प्रचार-प्रसार करने वाले फ्रैंडली पत्रकारों को ही निमंत्रण दिया गया है । इसके बावजूद पत्रकारों का क्या भरोसा ! अगर वे मौखिक रूप से उखड़ या बिदक गए, तो उन्हें, जरूरत पड़ने पर, शारीरिक रूप से मर्यादा की परिभाषा को समझाने के लिए पर्याप्त लोगों का होना तो सदैव ही नियम के अनुकूल रहा है । ऐसे में लोग अगर अपने हों, तो भरोसे का बैरोमीटर ऊँचा से ऊँचा बना रहता है ।
   पत्रकारों का संयम अभी जवाब देने को तैयार नहीं हुआ है, इसलिए भी नीले सियार का आगमन अभी नहीं हो सका है । मंत्री इंतजार में हैं कि कब खदबदाहट शुरु हो । चावल जब पकता है, तभी इसमें मिठास आती है । वरना तो कच्चा-ही-कच्चा । स्वाद व सेहत को गच्चा नहीं दे सकता, कोई भी यूँ ।
   पानी पी-पीकर पत्रकार अब थकने लगे हैं । उबासियों के दौर चलना शुरु होते ही मंत्री सजग हो जाते हैं । एक मिस कॉल की देरी और नीले सियार मंच पर । उनके साथ उप महाराज भी हैं, किसी साए की तरह उनके पीछे-पीछे । माइक पहले उप महाराज ही सम्भालते हैं । उनकी आवाज गूँजती है । वह कहते हैं, ‘देखिए, महाराज की तबियत थोड़ी नासाज है । खाँसी को लगता है अब काशी भेजना ही पड़ेगा । अक्सर आ जाती है किसी पाकिस्तानी आतंकवादी की तरह । पत्रकार वार्ता के ऐन पहले ही उसने हमला बोल दिया । उसके हमले से निपटने में थोड़ा वक्त लग गया । क्षमा चाहेंगे, इसीलिए थोड़ा विलम्ब हो गया ।’
   कानाफूसी शुरु हो जाती है पत्रकारों के बीच । मन में शिकायत व कटुता की जगह प्रशंसा के भाव उभर आते हैं । नीले सियार के माइक पकड़ते ही खबरी खरगोश हाथ उठाता है, किन्तु उन्हें बोलता देख बैठ जाता है । वह कहते हैं, ‘आज इस पत्रकार वार्ता में हम चाहते हैं कि उन सभी आरोपों को उठाया जाए, जो लोगों के बीच कानाफूसियों की शक्ल में अक्सर दिखाई दे रही हैं । हमारे ऊपर लग रहे सभी आरोप मूर्खतापूर्ण हैं और आज हम इसे साबित कर देंगे । कृपया पूछने की शुरुआत की जाए ।’
   इशारा पाते ही खबरी खरगोश फिर खड़ा हो जाता है और पूछता है, ‘महाराज, आपके ऊपर लगा यह आरोप कितना सही है कि आप नंबर एक नौटंकीबाज हैं?’
   प्रश्न सुनकर नीले सियार के चेहरे पर हँसी-सी आती है । वह उसी तरह जवाब देते हैं,’ देखिए, जनता ने हमें जिताया है । हम महाराज उन्हीं की बदौलत हैं । कर्ज है उनका हमारे ऊपर...वोटों का कर्ज । इस कर्ज के बोझ को हम जनता को खुशहाल बनाकर ही उतार सकते हैं । नौटंकी देखने-दिखाने से उसे प्रसन्नता प्राप्त होती है, तनाव दूर होता है जीवन का । अतः नौटंकी दिखा-दिखाकर हम लगातार उसका मनोरंजन करते रहेंगे । जनता के हित के लिए हमें अपने ऊपर लगाया जा रहा यह आरोप स्वीकार है ।’
   दूसरा प्रश्न एक और पत्रकार खरगोश की तरफ से उछलता है, ‘आप लोगों के ऊपर यह भी आरोप है कि आप लोग कभी भी, कहीं भी, किसी पर भी थूक देते हैं और थूककर आगे निकल लेते हैं ।’
   ‘थूकना कोई शौक नहीं है हमारा ।’ नीले सियार गम्भीर स्वर में बोलते हैं, ‘हम थूककर लोगों को उनकी औकात दिखाना चाहते हैं । लोग हम पर थूकें, इससे पहले ही हम उन पर थूक देते हैं । अटैक इज द फर्स्ट डिफेंस...यू नो । किसी को भी थूकने का हम मौका देना नहीं चाहते । इसीलिए थूकने को हमने अपनी स्टेट पॉलिसी का हिस्सा बना रखा है ।’
   ‘आप लोगों के ऊपर यह भी आरोप है कि आप लोग भ्रष्टाचार में लिप्त हैं, जबकि ईमानदारी का नगाड़ा बजाकर ही आप लोग सत्ता में आए थे ।’ इस बार एक और कोने से प्रश्न उछला ।
   ‘समाज की धारणा है कि आम जन ही घूस देता है । खुशी से दे या नाखुशी से, पर देना उसे ही है । यही उसकी नियति है । हम इस नियति को बदलना चाहते हैं । हम आम जन के प्रतिनिधि हैं, इसलिए घूस लेने और भ्रष्ट आचरण करने की जिम्मेदारी हमारे कंधों पर ही आती है । जिसे आप भ्रष्ट आचरण कहते हैं, असल में वह हमारा सत्य आचरण है । हमारे भ्रष्टाचार के पीछे हमारी नेक भावना है और लोगों को इसे इसी रूप में देखने की आदत डालनी होगी । दरअसल हम कोई भी काम इस नेक भावना से परे जाकर नहीं करते ।’
   नीले सियार को इत्मीनान है कि अब सभी तक उनकी बात पहुँच जाएगी...वह भी सही अर्थ और कलेवर के साथ । कई चैनलों ने तो अब तक ब्रेकिंग न्यूज झोंकना भी शुरु कर दिया होगा ।

मंगलवार, 9 मई 2017

मौज का कड़वा घूँट

                                                                  

   नीले सियार अपने सिंहासन पर विराजमान हैं ठीक बगल में उनके खास सलाहकार मुस्तैदी से जमे हुए हैं सामने अन्य पदाधिकारी अपनी-अपनी सीटों से इस तरह चिपके हुए हैं कि देखने वाले को लगे कि उन्हें कुर्सी का कतई मोह नहीं है जब मोह नहीं, तो चिंता किस बात की ! पर एक खास किस्म की चिंता पूरे दरबार पर हावी है अन्य तो अन्य, खुद नीले सियार को भी चिंता हो चली है कहीं सिंहासन के नीचे की जमीन तो भुरभुरी नहीं होने जा रही बात ही ऐसी है बगावत की खबरें रही हैं पुष्टि होना अभी बाकी है और इसीलिए खबरी खरगोश का इंतजार है
   ‘महाराज, क्या आपको लगता है कि ऐसा भी हो सकता है हमारे साथ, कोई बगावत भी कर सकता है?’ सलाहकार ने दरबार की चुप्पी को तोड़ने की गरज से पूछा
   ‘क्यों नहीं, हम आम सियार हैं और कोई नहीं चाहता कि आम का राज हो हर तरफ हमारे खिलाफ साजिश-दर-साजिश है ।’ कहते-कहते नीले सियार के चेहरे पर क्रोध की लाली-सी बिखर गई
   ‘मगर हुजूर, विपक्षियों ने तो एक अलग ही राग को छेड़ रखा है ।’ इस बार आम कल्याण मंत्री अपनी बात को आगे रखते हुए बोले, ‘वे तो खुले-आम आरोप लगा रहे हैं कि हम अब आम कहाँ रहे महंगी गाड़ियों, खूब बढ़ी तनख्वाह और शानदार बंगलों के साथ हम खास वाले मुगल गार्डेन में तो कब के चुके हैं ।’
   ‘यह केवल आरोप नहीं, बल्कि साजिश है हमारे खिलाफ ।’ सिंहासन को हाथों से कसते हुए तेज आवाज में नीले सियार ने कहा, ‘वे नहीं चाहते कि एक आम सियार खास बन जाए उन्हें क्या पता कि खास बनते हुए हमें कितना दुख हुआ था, पर खुशी भी कुछ कम थी आम सियारों में स्पष्ट संदेश जा रहा था कि अब आम रहने के दिन लद गए ।’
   तभी खबरी खरगोश दरबार में प्रवेश करता है हड़बड़ी में नीले सियार की जय बोलते हुए खबरों को उगलना शुरू करता है, ‘खबर सौ फीसदी सच है महाराज जो आपका लंगोटिया यार था, वही अब मैदान में है अविश्वास की आड़ी-तिरछी रेखा खिंच चुकी है विश्वास की भीत दरक गई है बगावत का विगुल बज उठा है ।’
   ‘हम समझे नहीं खबरी, विस्तार से बताओ जरा ।’ कहते-कहते नीले सियार की व्यग्रता चरम पर जा पहुँची थी
   ‘महाराज, उनका कहना है कि हमारा दल जिस मिशन को लेकर चला था, उससे वह भटक चुका है हम अब सत्तालोलुप हो चुके हैं सत्ता ही अब हमारा मिशन है हम आम-आम कहते जरूर हैं, पर काम कुछ नहीं करते सत्ता हमारे लिए मौज-मस्ती का अड्डा बन गई है मौज-मस्ती में और इजाफा हो, इसके लिए हम एक राज्य से दूसरे राज्य को लपक रहे हैं क्या आम अब लपकने की चीज बन गया है?’
   ‘लगता है कोई पद पाकर वह खिसियानी बिल्ली हो गया है और हमारी सत्ता के खम्भे नोंच रहा है हम उसकी हताशा को समझते हैं, पर उसे एक सबक भी देना चाहते हैं सत्ता में आने पर पता चलता है कि मौज क्यों जरूरी है ! आप मौज भी करना चाहें, तो भी मजबूरी में मौज आपको करनी पड़ती है जनता को तब कितना कष्ट होगा, जब उसे पता चलेगा कि सत्ता में बैठकर भी उसके आम सियार को मौज मयस्सर नहीं मौज देखकर ही तो उसे सांत्वना मिलती है कि एक दिन वह भी मौज को प्राप्त होगा ।’
   ‘बेशक महाराज ।’ इस बार सलाहकार ने मुँह खोला, ‘चूँकि हम आम सियार हैं, इसलिए हमारा यह खास कर्तव्य बनता है कि हम ज्यादा से ज्यादा मौज-मस्ती करें, ताकि पीछे की कमियों की भरपाई हो सके ।’
   पूरा दरबार प्रसन्न हो उठता है बगावत और बगावती को दबाने के लिए खास मंत्रियों की एक आत्मतुष्ट टीम छोड़ी जाती है खबरी खरगोश एक टीवी चैनल की ओर भागता है     


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