जीवन व समाज की विद्रुपताओं, विडंबनाओं और विरोधाभासों पर तीखी नजर । यही तीखी नजर हास्य-व्यंग्य रचनाओं के रूप में परिणत हो जाती है । यथा नाम तथा काम की कोशिश की गई है । ये रचनाएं गुदगुदाएंगी भी और मर्म पर चोट कर बहुत कुछ सोचने के लिए विवश भी करेंगी ।

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मंगलवार, 14 मार्च 2017

ज्यादा की चाह, मुसीबत की राह

              
    वह जैसे ही ढाबों के सामने पहुँचा, ढाबे वाले उस पर टूट पड़े । उसे लगा कि उसकी खुशी के भी फूट पड़ने का यही वक्त है । क्यों न लपककर दोनों हाथों से इस वक्त को ही लूट लूँ । वह लूटने के लिए थोड़ा और आगे बढ़ा । ढाबे वाले भी टूटने के लिए आँधी के पंख पर सवार हो गए । एक के बजाए कई के हाथों भाव मिलना हमेशा ही अच्छा होता है, यह सोचकर उसकी मूँछें ताव खाने लगीं । उधर ढाबे वालों ने भी पूरे चाव से दाँव फेंकना शुरु कर दिया । कोई सोने जैसी थाली लेकर दौड़ा, तो कोई चाँदी जैसी थाली । किसी की थाली में छप्पन भोग थे, तो किसी की थाली में खाने के अवसरों के सारे जोग । जो चीज उसे सुकून और राहत दे रही थी दूर से, वह निकट आते ही आफत में बदल गई ।
    सारे ढाबे वाले एक साथ उसकी इज्जत करने लगे । पता नहीं क्यों उसके दिल को ऐसा कब लग गया कि अरे, ये तो इज्जत उतारने पर आमादा हैं । एक ढाबे वाले ने उसका बायां हाथ पकड़ा, दूसरे ने दायां । हाथ अपने हाथ से निकलता देख बाकी ढाबे वाले उसके पैरों पर गिर पड़े...बोले तो पैरों पर टूट पड़े । कोई चाहता था कि वह पूरब की ओर चले । किसी की चाहत थी कि उसे पश्चिम की ओर जाना चाहिए । सभी चाहते थे कि वह आगे बढ़े और अपनी भूख को मिटाए । वह सचमुच आगे बढ़ा । सरककर पैर पीछे की ओर सैर के लिए निकल गए तथा खाने के लिए मुँह आगे की ओर बढ़ते हुए जमीन पर लोटम-लोट हो गया । शायद इसी स्थिति के लिए अनुभवी लोगों ने वो धूल फाँकने वाला मुहावरा इजाद किया है ।
    उसके धूल चाटते ही दो पल के लिए ढाबे वाले भूल गए कि वे किस बात के लिए तूल दे रहे थे । सभी दो-दो कदम पीछे हट गए । पर हाथ सभी के आगे बढ़ गए और छाती तक पहुँचते ही आपस में चिपक गए । शुष्क नयनों ने ही निमंत्रण की पाती को आगे बढ़ाया और स्वागत के पुष्प-हार को लहराया । उसने भी एक तरफ जाने का बिगुल बजाया । अगले ही पल उसके हाथों में एक फूल-सा आया और उधर ढाबा फूला न समाया ।
    वह बैठ गया और थाली का इंतजार करने लगा । कुछ देर बाद थाली भी आई । थाली के साथ कटोरियों की भरमार । सब में चमचे ही चमचे । ‘भइया, क्या मैं थाली ही खाउँगा...भोजन कहाँ है?’
    ‘भोजन तो आप कर चुके...थोड़ी देर पहले ।’ ढाबे वाले ने जवाब दिया ।
    यह सुनते ही उसका माथा ठनका । अपने को काबू करते हुए बोला, ‘मैं भोजन कर चुका और यह बात मुझे ही नहीं पता...आश्चर्य !’
    ‘पर हमें तो पता है कि आप भोजन कर चुके । वो क्या है कि हम आपकी टाइप वाले भुलक्कड़ नहीं हैं ।’ ढाबे वाले के चेहरे पर इत्मीनान के भाव थे ।
    वह भड़क उठा और चिल्लाया, ‘मैं अभी सब को इकट्ठा करता हूँ और तुम्हारे झूठ की पोल-पट्टी खोलता हूँ ।’
    ‘शौक से बुलाइए, ताकि हम उन्हें बता सकें कि खाना डकारने के बाद आपकी नीयत में बेइमानी आ गई है ।’ ढाबे वाला मुस्कराते हुए बोला, ‘वो अपनी ही बिरादरी के लोग हैं । अतः तुम्हारी बात का यकीन वो कदापि नहीं कर सकते । एक चोर इतना बेइमान कभी नहीं होता कि दूसरे चोर का साथ छोड़ दे ।’ कुछ देर रुकने के बाद वह फिर बोला, ‘तुम्हारी इज्जत इसी में है कि चुपचाप पैसा दे दो या फिर बर्तनों की घिसाई करो ।’
    वह उठकर अंदरखाने चला गया और बर्तनों की घिसाई करने लगा । सांझ बीतने से पहले निर्दयी ढाबे वाले ने दया नहीं दिखाई । उसकी निर्दयता के पीछे भी दया का ही भाव छिपा था । वह चाहता था कि उसकी इज्जत को और बाट न लगे । अंधेरा इज्जत बचाने में भरपूर मदद करता है । वह बाहर निकला कि एक और ढाबे वाला टकरा गया । अनुभव कितना भी कटु और बलवान ही क्यों न हो, भूख के आगे वह पछाड़ खा ही जाता है । वह अगले ही पल उस दूसरे ढाबे की कुर्सी पर बैठा हुआ था । भूख जोर की लग रही थी । अतः जमकर भरी हुई थाली लाने का इशारा कर दिया । यह क्या ! थाली में कुछ-एक टुकड़े पड़े हुए थे रोटी के । वह लगभग याचक की मुद्रा में बोला, ‘भइया, भरी हुई थाली लाइए हमारे सामने । बहुत जोर की भूख लगी है ।’
    ‘थाली तो एकदम फुल ही दी थी हमने तुमको ।’ ढाबे वाले ने जवाब दिया, ‘लगभग सारा डकारने के बाद अब नकारने पर आ गए । हाय-हाय, कितना बेइमान आदमी है यह ।’ और इतना कहते ही वह चिल्लाने लगा था ।

    ढाबे वाले ने जितना पैसा मांगा, वह उसकी औकात से बाहर की बात थी । कुछ भी काम न आया था । इस विषम परिस्थिति में बर्तन-घिसाई ने ही उसका साथ दिया था । अन्यथा कुटाई की मारक बेला को टालना लगभग नामुमकिन ही था । बाहर निकलते ही उसे आजादी का अहसास हुआ । उसे लगा कि वह अब सोच पा रहा है । ढाबे वाले इसीलिए उस पर टूट पड़े, क्योंकि उसने उन्हें टूटने का मौका दिया । ज्यादा पाने की इच्छा ही उसकी परीक्षा बन गई । वह आज पूरे दिन ‘म’ अक्षर से शुरु होने वाला एक समुदाय ही तो बना रहा । वैसे सोचने वाली बात यह है कि ‘म’ से मना भी होता है, जिसका इस्तेमाल न यह समुदाय करता है, न वह ही कर सका था । उसने सोचा । काश, वह उन लोगों को मना करने का आत्मबल दिखा पाया होता !

रविवार, 26 फ़रवरी 2017

सच्चे और अच्छे की पहचान

                

    नए साहब के आने से पहले ही उनके बारे में सच्ची और अच्छी खबरें आने लगी थीं । जितनी खुशी थी, उससे अधिक हैरानी थी लोगों के मन में । कौतूहल चरम पर था कि आज के जमाने में भी ऐसे लोग धरती की शोभा बढ़ाने के लिए अवतरित हो रहे हैं । साहब कितने न्यायप्रिय हैं, उसकी झलक उनके पदार्पण करते ही मिल गई थी । जब उन्हें रिसीव करने गया बाबू टैक्सी के पैसे देने लगा, तो उन्होंने मना कर दिया । वह मुस्कराते हुए उच्च कोमलता के साथ बोले कि एक के साथ अन्याय वह कदापि नहीं कर सकते । हवाई जहाज, टैक्सी और सफर में जो भी खर्च हुआ है, वह सब पर बराबर-बराबर वितरित कर दिया जाएगा...प्रसाद की तरह, ताकि किसी को यह न लगे कि कोई अन्याय-सा हो गया उनके साथ । खबरों से लोग हैरान तो थे ही, पर इस अवतरण-कथा से हैरानी का कद कुछ और बढ़ गया ।
    जल्द ही साहब के संयम का स्वाद भी लोगों को मिल गया । किसी खुशबूदार व्यंजन की गंध की तरह यह बात फैलने में देर न लगी कि कमाल का संयम है साहब के पास । क्या मजाल कि वह बाहर कुछ ग्रहण कर लें...मतलब खा-पी लें । ठेले-खोमचे वालों से तो उन्हें सख्त एलर्जी थी । उनके यहाँ खाने वालों से उससे भी अधिक । गोलगप्पे, भजिया, चाउमिन वगैरह के पास इतना दम न था कि उन्हें अपनी तरफ खींच सकें । जब भी गोलगप्पों के नाम पर मुँह में पानी आने लगता, तो उन्हें घर पर ही मंगा लेते । घर पर खाने से एक एक्स्ट्रा आनंद की प्राप्ति होती थी । बड़े-बड़े गोलगप्पे लबालब खट्टी-नमकीन पानी के साथ भरपूर मुँह खोलकर खाए जा सकते थे । ऐसी आजादी का स्वाद ठेले के बगल में खड़े होकर नहीं लिया जा सकता था, क्योंकि ठेला है तो सड़क की चीज । वह भीड़ को तो बुलाएगा ही ।
    सात्विक तो ऐसे थे वह कि प्याज-लहसुन पर नजर पड़ते ही तीन बार राम-राम बोलते थे, ताकि पाप का प्रायश्चित किया जा सके । इन चीजों को खरीदना और ग्रहण करना तो नामुमकिन सी बात थी । मांस-मछली तो आज तक भगवान भी नहीं खरीदवा पाए थे । सूरज की रोशनी में सब कुछ उजागर हो जाता है । अतः वह कड़ाई से दिन में सात्विकता का लिटमस-टेस्ट देते । लाख मान-मनुहार भी उन्हें टस से मस नहीं कर पाते । किन्तु आपद काल में मर्यादा कहाँ रहती है ! रात के अँधेरे में कैंडल लाइट के बीच मुर्गे की टांग और विदेशी की मांग शरीर में जान डाल देते थे । शरीर की रक्षा और पोषण भी तो आपद-धर्म ही है न !
    साहब कितने बड़े धर्मात्मा हैं, यह बात उस दिन स्पष्ट हो गई, जब सुबह सूर्य उगने के साथ ही नगर का सबसे बड़ा ठेकेदार रिश्वत की रकम लेकर पहुँच गया । साहब ने रिश्वत लेने से मना कर दिया । ठेकेदार हक्का-बक्का...आँखों और कानों को यकीन नहीं हुआ । उसे लेकर आए बाबू की हालत तो और भी दयनीय थी । बेचारा पसीने से तरबतर । रिश्वत की एसी से ठंडक पहुँचने से पहले ही मामला गरमा गया था । वह साहब की नजरों में ऊपर चढ़ने आया था, किन्तु तूफान का संकेत देने वाले बैरोमीटर के पारे की तरह धड़ाम हो गया था । इस वक्त वह न उधर का था, न इधर का । इधर ठेकेदार उसे भेड़िए की नजर से निहार रहा था ।
    ‘इतना सन्नाटा क्यों है भाई?’ कोई पूछता, उससे पहले ही साहब ने सन्नाटा तोड़ दिया । वह यह कहकर चले गए कि नहाने जा रहे हैं । साथ में यह इशारा भी टांग गए कि कोई वहाँ से टस से मस न हो । नहाने के बाद घंटी बजा-बजाकर पूजा करने में कब दो घंटे गुजर गए, उन्हें इसका इल्म ही नहीं रहा । ध्यान लगाकर पूजा करने पर आदमी के साथ ऐसा ही होता है । वह आए और आते ही उन्होंने ठेकेदार को निहाल कर दिया । रिश्वत का बैग अब उनके हाथों में शोभायमान था । एक बार फिर ठेकेदार हक्का-बक्का और बाबू बेचारा पसीने से तर-बतर । वाह, क्या धर्मात्मापना है ! रिश्वत भी पूजा-पाठ करने के बाद ही लेते हैं । वरना तो इस दुनिया में ऐसे-ऐसे अधर्मी हैं कि कभी भी रिश्वत पर चोंच मार देते हैं । न सुबह का लिहाज करते हैं, न शाम का । न शौच का, न स्नान-ध्यान का । रिश्वत को क्या साफ-सफाई के बाद नहीं लिया जा सकता?

    ठेकेदार प्रसन्न । बाबू अति प्रसन्न । ऐसे सच्चे और अच्छे आदमी...बोले तो साहब की छत्रछाया में सब कुछ अच्छा ही अच्छा होने वाला है । सत्संग कभी निष्फल जाता है क्या?

शुक्रवार, 9 सितंबर 2016

आदर्श बनने की राह

                     
   घर में आने वालों का ताँता लगा हुआ था । किसी के हाथ में गले में डालने के लिए फूलों की माला थी, तो किसी के हाथ में थमाने के लिए पुष्पगुच्छ । कोई चमकीले कागजों से आवरणबद्ध अपनी पसंद के उपहार लाया था, तो कोई यूँ ही आ खड़ा हुआ था...खाली हाथ, मगर मन के कोने में कई ऐसे शब्द सजने-सँवरने लगे थे, जो किसी को विभूषित करने के काम आते हैं ।
   सुबह से शाम हो आई थी, मगर आने वाले थे कि रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे । हालांकि संख्या तरल होती गई थी । शाम का झुरमुटापन बढ़ता गया था और लोगों का छिटपुटापन भी । लोगों की इतनी रेलम-पेल के बावजूद घर के सदस्यों का दिन हँसी-खेल में बीता था । मुस्कान की मेल पूरे दिन चेहरे की ट्रैक पर भावी बुलेट-सी दौड़ती रही थी । समाज में सम्मान का सेंसेक्स अचानक उछल गया जो था । हैसियत की हनक तो उसी वक्त अपने तंबू-कनातों के लिए खूँटे गाड़ने के काम में लग गई थी, जब वह सूचना आई थी ।
   सूचना सुख और खुशी का वाहक बन कर आई थी । शर्मा जी को सरकार की ओर से आदर्श शिक्षक घोषित किया गया था । शर्मा जी से अधिक उनके परिवार वाले खुश थे । बैठे-बिठाए रुतबे में असंख्य गुना वृद्धि हो गई थी । परिवार वालों की खुशी का एक और भी कारण था...शर्मा जी को प्राप्त हुआ दो वर्ष का सेवा-विस्तार । दो वर्ष का अतिरिक्त वेतन...मतलब दो वर्ष और मौज-मस्ती के । पेंशन तो टेंशन ही लाएगा । जो मिलेगा, वह कितना काम आएगा । बच रही बेटी की शादी, दवा-दारू के लिए अस्पताल को चंदा, छीजते शरीर के लिए पौष्टिक खुराक, अब तक दमित तीर्थाटन की इच्छा, मंदिरों में अनगिनत बकाए रह गए चढ़ावे तथा और भी बहुत कुछ-इनका सामना बाकी परिवार वालों के लिए इतना आसान भी तो नहीं था ।
   लोगों की आमद खत्म होते ही शर्मा जी ड्राइंग-रूम से निकल कर अपने कमरे में आ गए । कुछ समय बाद भोजन भी आ गया था उनका । अनमने भाव से एकाध रोटी खाकर थाली को टरका दिया था । घर खुशी से लोट-पोट था, पर उनके चित्त में खोट की चोट आकार लेने लगी थी । दिल की धड़कन बढ़ चली थी । बिस्तर पर लेटने का कोई लाभ न हुआ । नींद अपने लोक में जिद्दी बन अड़ी रही । वह उठकर खिड़की तक चले आए । बाहर तेज ठंडी हवा चल रही थी । अचानक एक झोंका उनसे टकराया और मन में छिपे रहस्य की गाँठ को खोलता चला गया ।
   उस दिन पहली पेशी थी छुटके शिक्षा अधिकारी के यहाँ । यह पेशी अधिकारी के घर पर ही हुई थी । उसी ने बुलवाया था । उन्हें देखते ही बोला, ‘आदर्श-वादर्श बनना है कि नहीं आपको...आदर्श बनने की बात करके एकदम्मे से भूमिगत काहे हो गए इधर हम कलम-दवात लेके डेढ़ किलो मक्खियां मार चुके हैं । गणेश-पूजन के लिए क्या आपके पूर्वजों को न्योतना पड़ेगा?’
   ‘नहीं सर, हमीं करेंगे गणेश-पूजन ।’ वह हड़बड़ाते हुए बोले थे, ‘आज्ञा दीजिए, क्या-क्या तैयारी करूँ उसके लिए ।’
   ‘भइये, फल-फूल तो लाओगे ना या...?’
   ‘नहीं-नहीं सर, आप आज्ञा तो दीजिए ।’ अपनी ऊर्जा समेटते हुए उन्होंने कहा था ।
   ‘वैसे तो हम अन्य लोगों से चालीस पुष्प मंगवाते हैं, पर चूँकि आप बुजुर्ग हैं, अतः तीस पुष्प ही यहाँ समर्पित कर दीजिए ।’ कहते हुए उसकी हँसी रहस्य के आवरण में लिपटती चली गई थी ।
   ‘पर सर, तीस फूल कुछ ज्यादा...’
   ‘निकलिए आप ।’ वह बीच में ही बोल पड़ा था, ‘आप जैसे लोगों की स्तुति लिखकर मैं अपने कलम को खोटा नहीं कर सकता ।’
   इसके बाद उनके रजामंद होने पर ही उन्हें आदर्श बनाने की नींव पड़ी थी । उस अधिकारी ने अपने स्तर से लिख-पढ़कर फाइल को आगे बढ़ा दिया था । कुछ ही दिनों के बाद उन्हें जिले के शिक्षा अधिकारी के दरबार में उपस्थित होने का हुक्म प्राप्त हुआ था । वहाँ सामना अधिकारी के स्टेनो से हुआ था । उसने एक साँस में बता दिया था ‘कि उन्हें आदर्श बनाने के लिए साहब जबर्दस्त परिश्रम कर रहे हैं । आदर्श बनना या बनाना परिश्रम की मांग करता है । गुण-गान के लिए अच्छे शब्दों की खातिर साहब कई ज्ञान व समांतर कोषों को छान रहे हैं । परिश्रम भूखे पेट नहीं होता । भूख मिटाने के लिए अधिक नहीं, बस पचास ठो कउनो फल की दरकार होगी । कल हमको फल रिसीभ करवा दीजिए, परसों आपकी फाइल रिलीभ करवा दूँगा साहब से टंच करवा के । ऐसा टिप्पणी होगा कि फाइल एकदम मंडले पर जाकर रुकेगी ।’
    इसके बाद मंडल की तीर्थ-यात्रा भी उन्हें करनी पड़ी थी । उनकी फाइल को देखते ही अधिकारी ने कहा था, ‘वैसे तो आपकी उम्र आदर्श शिक्षक बनने लायक हो चुकी है, पर वो क्या है कि अभी आप चवन्नी जितना आदर्श ही बन पाए हैं । अकेले अठन्नी आदर्श हम बना देंगे आपको । इतना अधिक आदर्श एकसाथ बनने के लिए आपको पहले की भाँति अपना आदर्श काम जारी रखना होगा । बल्कि यूँ कहें कि आपको पहले से अधिक आदर्श कर्म हमारे सामने प्रस्तुत करना होगा ।’
   अपना आदर्श कर्म अधिकारी की दराज में प्रस्तुत करते ही उनकी फाइल को पंख  लग गए । वह किसी अंतरिक्ष यान की रफ्तार से राजधानी जा पहुँची । पीछे किसी ट्रेन ने उन्हें भी राजधानी पहुँचाकर ही दम लिया । वहाँ उपस्थित पैनल के एक अधिकारी ने निशाना साधा था । वह मारक अंदाज में बोला, ‘आपको आदर्श शिक्षक क्यों कहा जाए?’ ‘क्योंकि हम आदर्श हैं ।’ ‘गलत, आपको एक मौका और दिया जाता है अपना जवाब सुधारने के लिए ।’
   एक पल के बाद इनके मुँह से निकला था, ‘क्योंकि हम बारह आने आदर्श बन चुके हैं । गुड, अ वेरी प्रैक्टिकल आंसर ! आपका आत्मविश्वास आपके आदर्श का सबूत है । निश्चय ही आप सोलह आने आदर्श बनेंगे । अब आपको आदर्श बनने से कोई नहीं रोक सकता ।’
   ‘कब तक खड़े रहोगे खिड़की पर?’ अचानक आई पत्नी की आवाज ने उन्हें वापस आज में लाकर पटक दिया था । बिस्तर पर लेटने के बावजूद नींद नहीं आई थी । अपनी ही नजर में गिरने की यह शायद पहली प्रतिक्रिया थी । पत्नी की प्रेमपूर्ण नजर उन्हें आकाश की ऊँचाई में लिए जा रही थी, जबकि उनकी अपनी नजर पाताल की असीम गहराइयों को खोजने में निमग्न थी ।

शनिवार, 4 जून 2016

आधी छोड़ सारी को धावे

              
   दोपहर हो आई थी, अतः काम बंद हो गया था । भीषण गर्मी में दो-तीन घंटे का ब्रेक स्वाभाविक ही था । उसके बाद देर शाम तक काम । आठ घंटे पूरे जो करने होते थे । काम लेने वाला इतना दयालु नहीं होता कि आधे काम के पूरे पैसे दे दे । इस ब्रेक में खाने-पीने के बाद सुस्ताने को पर्याप्त समय मिल जाता था । उसने अपनी पोटली खोल ली थी । मोटी-मोटी लिटि्टयों के साथ प्याज भी संगत देने को तैयार था । लिट्टी और प्याज की जुगलबंदी हमेशा से मधुर राग छेड़ती रही है गरीब के आँगन में, पर इधर प्याज बहुत भाव खाने लगा है । वह रह-रहकर जुगलबंदी को तोड़ दे रहा है । इस साल उसे ऐसी पटकनी मिली है कि अभी तक मुँह के बल गिरा धूल फाँक रहा है । लिट्टी ने बिना कोई शिकायत किए उसे अपने साथ रख लिया है ।
   हथेलियों में प्याज को दबाकर उसका छिलका उतार ही रहा था कि मंगनू इधर ही आता दिखाई दिया । पास आते ही बोला,ʻआज अकेले ही अकेले...यारी भी और होशियारी भी ! वाह, अँचार की खुश्बू तो गजब ढा रही है...खाए बिना रहना अब तो नामुमकिन है ।ʼ
   ʻखाने से तुझे रोका ही किसने है ? आजा मेरे यार...मिलकर खाने का मजा लेते हैं ।ʼ वह भी चहक उठा था । मंगनू उसका लंगोटिया यार था । बड़े होने पर साथ ही काम करते, साथ ही खाते । दो साल पहले वह दिल्ली चला गया था अपने किसी रिश्तेदार के साथ । तब से यह याराना लगभग टूटा हुआ ही था ।
   मंगनू दुखी होते हुए,ʻयार तुझे देखकर अच्छा नहीं लगा । तू आज भी वही प्याज-लिट्टी...ʼ बोला,ʻमेरी मान, तू शहर चला चल । वहाँ दुगुनी-तिगुनी मजदूरी मिलती है यहाँ से । देखते-ही-देखते कायापलट हो जाएगी ।ʼ
   ʻपर यहाँ का छोड़कर जाना...? ठीक ही मिल जाता है यहाँ भी ।ʼ इसके बाद दोनों में अच्छी-खासी बहस हुई थी । सपने किसे अच्छे नहीं लगते ! अंततः वह यहाँ का छोड़कर जाने को तैयार हो गया था ।
    दिल्ली पहुँचते ही उसे हल्का झटका लगा था । इस वक्त वह एक दड़बे में बैठा हुआ था । कमरा कहना ज्यादती होगी । कमरा अत्यन्त छोटा था और रहने वाले थे बीस । हरेक के हिस्से में बस अपने शरीर के बराबर सोने की जगह । घर छोड़ने पर इतना कष्ट तो उठाना ही पड़ता है, यह सोचकर उसने अपने मन को सांत्वना देने की कोशिश की ।
   अगली सुबह तड़के ही वे एक चौराहे पर आ गए । इतनी सुबह क्यों? उसने पूछा भी था, पर मंगनू मुस्कुराकर रह गया था । चौराहे पर पहले ही अच्छी-खासी भीड़ इकट्ठा हो चुकी थी । किसी की नजर आसमान में कुछ ढूँढ रही थी, तो कोई आती-जाती गाड़ियों को निहार रहा था । सभी ने अपने हाथों में दफ्तियाँ ले रखी थीं । उन पर कुछ लिखा हुआ था । ʻक्या कोई जुलूस निकलने वाला है?ʼ मैंने पूछा ।
   ʻअरे नहीं यार । इन्होंने अपने रेट लिख रखे हैं इन दफ्तियों पर ।ʼ
   ʻमगर रेट किसलिए? यहाँ की मजदूरी तो पहले ही से निर्धारित होगी ।ʼ ʻतू समझा नहीं । यहाँ वैसे नहीं चलता । दफ्ती पर इन लोगों ने अपनी बेस-प्राइस लिख रखी है । बोली लगाने वाले उतने से शुरुआत करेंगे । आगे जितने अधिक पर बोली लग जाए ।ʼ
   ʻमतलब ये लोग अपने को बेचने वाले हैं?ʼ उसकी आँखें फैलती चली गईं । मुँह खुला-का-खुला रह गया ।
   ʻसिर्फ दिन भर के लिए ।ʼ मंगनू ने इत्मीनान से जवाब दिया । उसकी नजर वहाँ आए एक खरीदार पर रेंगती चली गई थी ।
   ʻएक दिन के लिए भी बेचना...यह तो सरासर गलत है ।ʼ कोई जर्जर नैतिकता उसके होठों के कोनों तक घिसटती हुई चली आई थी ।
   ʻबिकना फख्र की बात है आजकल ।ʼ नजरों को उसकी तरफ खींचते हुए कहा मंगनू ने,ʻतूने आईपीएल नहीं सुना । जमकर बोली लगती है वहाँ पर । बिकने वाला ही आज बड़ा कहलाता है । चुपचाप अपनी दफ्ती उठा ले और बिकने को...ʼ अपनी बात अधूरी छोड़ वह एक खरीदार की ओर बढ़ गया था ।
   उसे भी एक कार वाली खरीदकर अपने घर ले आई थी । अभी रंगरोगन समाप्त ही हुआ था उस घर में और सारे सामान घर के सम्पूर्ण अराजक मुद्रा में दिखाई दे रहे थे । उन्हें व्यवस्थित व नियमबद्ध करने के लिए ही उसे लाया गया था । वह तुरंत काम पर लग गया था । दो घंटे तक कोई बाधा उत्पन्न नहीं हुई । इस बीच एक प्याली चाय भी गटकने को मिल गई । यहाँ तो सचमुच ही मजा है भाई-सोचते हुए उसके चेहरे पर मुस्कान-सी पसर गई । मगर यह खुशी क्षणिक ही साबित हुई । गृहस्वामिनी की सखियां आई हुई थीं घर पर और जमकर दावत उड़ाने के बाद वे अब विदा ले रही थीं । तभी उसे सबको सैंडल पहनाने का फरमान जारी हुआ था । एक पल को वह हिचका, फिर इसमें ʻऐसी-वैसी कौन सी बात हैʼ सोचते हुए सैंडल पहनाने लगा । उनके जाने के बाद दावत के सारे जूठे बर्तन उस पर एक साथ पिल पड़े । चलो, घर का ही काम है...मजदूरी तो खरी-खरी बन जाएगी न !
   वह फिर सामानों को व्यवस्थित करने में जुट गया था । दोपहर हो आई थी और उसे भूख भी लग रही थी । दावत की बची भोजन-सामग्री के बारे में सोचते ही मुँह में दरिया-सी बहने लगी । वह कनखियों से देखता, मगर कोई उसे पूछने नहीं आया । आई, तो गृहस्वामिनी की जवान बेटी आई । नुक्कड़ वाले बड़ी-सी दुकान से विदेशी ब्रांड की चॉकलेट लानी थी...तुरंत ।
   चॉकलेट देखते ही उसका गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया । उसने ʻईडियट कहीं काʼ कहते हुए जोरदार तमाचा रसीद कर दिया । दरअसल वह कोई दूसरी चॉकलेट उठा लाया था । गृहस्वामिनी बीच में न पड़ती, तो वह और पिट गया होता । क्षतिपूर्ति के लिए वह तुरंत चिप्स और पापड़ के कुछ टुकड़े एक प्लेट में रखकर ले आई थी । उसने एक टुकड़ा भी मुँह में नहीं डाला । अपमान ने पेट की भूख को पिघला दिया था ।
   शाम होते-होते फिर एक फरमान जारी हुआ था । उसे डॉगी को नाले के पास ले जाना था । उसे बड़े जोर की बैड फीलिंग हो रही थी । यह सुनते ही वह चकराया । आदमी तो आदमी, अब कुत्ते की भी चाकरी?

   रात में वह सोच रहा था । पैसा अधिक है, तो खर्च और अपमान भी अधिक हैं यहाँ । आधी छोड़कर आया था, अब...?   
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