जीवन व समाज की विद्रुपताओं, विडंबनाओं और विरोधाभासों पर तीखी नजर । यही तीखी नजर हास्य-व्यंग्य रचनाओं के रूप में परिणत हो जाती है । यथा नाम तथा काम की कोशिश की गई है । ये रचनाएं गुदगुदाएंगी भी और मर्म पर चोट कर बहुत कुछ सोचने के लिए विवश भी करेंगी ।

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मंगलवार, 14 मार्च 2017

ज्यादा की चाह, मुसीबत की राह

              
    वह जैसे ही ढाबों के सामने पहुँचा, ढाबे वाले उस पर टूट पड़े । उसे लगा कि उसकी खुशी के भी फूट पड़ने का यही वक्त है । क्यों न लपककर दोनों हाथों से इस वक्त को ही लूट लूँ । वह लूटने के लिए थोड़ा और आगे बढ़ा । ढाबे वाले भी टूटने के लिए आँधी के पंख पर सवार हो गए । एक के बजाए कई के हाथों भाव मिलना हमेशा ही अच्छा होता है, यह सोचकर उसकी मूँछें ताव खाने लगीं । उधर ढाबे वालों ने भी पूरे चाव से दाँव फेंकना शुरु कर दिया । कोई सोने जैसी थाली लेकर दौड़ा, तो कोई चाँदी जैसी थाली । किसी की थाली में छप्पन भोग थे, तो किसी की थाली में खाने के अवसरों के सारे जोग । जो चीज उसे सुकून और राहत दे रही थी दूर से, वह निकट आते ही आफत में बदल गई ।
    सारे ढाबे वाले एक साथ उसकी इज्जत करने लगे । पता नहीं क्यों उसके दिल को ऐसा कब लग गया कि अरे, ये तो इज्जत उतारने पर आमादा हैं । एक ढाबे वाले ने उसका बायां हाथ पकड़ा, दूसरे ने दायां । हाथ अपने हाथ से निकलता देख बाकी ढाबे वाले उसके पैरों पर गिर पड़े...बोले तो पैरों पर टूट पड़े । कोई चाहता था कि वह पूरब की ओर चले । किसी की चाहत थी कि उसे पश्चिम की ओर जाना चाहिए । सभी चाहते थे कि वह आगे बढ़े और अपनी भूख को मिटाए । वह सचमुच आगे बढ़ा । सरककर पैर पीछे की ओर सैर के लिए निकल गए तथा खाने के लिए मुँह आगे की ओर बढ़ते हुए जमीन पर लोटम-लोट हो गया । शायद इसी स्थिति के लिए अनुभवी लोगों ने वो धूल फाँकने वाला मुहावरा इजाद किया है ।
    उसके धूल चाटते ही दो पल के लिए ढाबे वाले भूल गए कि वे किस बात के लिए तूल दे रहे थे । सभी दो-दो कदम पीछे हट गए । पर हाथ सभी के आगे बढ़ गए और छाती तक पहुँचते ही आपस में चिपक गए । शुष्क नयनों ने ही निमंत्रण की पाती को आगे बढ़ाया और स्वागत के पुष्प-हार को लहराया । उसने भी एक तरफ जाने का बिगुल बजाया । अगले ही पल उसके हाथों में एक फूल-सा आया और उधर ढाबा फूला न समाया ।
    वह बैठ गया और थाली का इंतजार करने लगा । कुछ देर बाद थाली भी आई । थाली के साथ कटोरियों की भरमार । सब में चमचे ही चमचे । ‘भइया, क्या मैं थाली ही खाउँगा...भोजन कहाँ है?’
    ‘भोजन तो आप कर चुके...थोड़ी देर पहले ।’ ढाबे वाले ने जवाब दिया ।
    यह सुनते ही उसका माथा ठनका । अपने को काबू करते हुए बोला, ‘मैं भोजन कर चुका और यह बात मुझे ही नहीं पता...आश्चर्य !’
    ‘पर हमें तो पता है कि आप भोजन कर चुके । वो क्या है कि हम आपकी टाइप वाले भुलक्कड़ नहीं हैं ।’ ढाबे वाले के चेहरे पर इत्मीनान के भाव थे ।
    वह भड़क उठा और चिल्लाया, ‘मैं अभी सब को इकट्ठा करता हूँ और तुम्हारे झूठ की पोल-पट्टी खोलता हूँ ।’
    ‘शौक से बुलाइए, ताकि हम उन्हें बता सकें कि खाना डकारने के बाद आपकी नीयत में बेइमानी आ गई है ।’ ढाबे वाला मुस्कराते हुए बोला, ‘वो अपनी ही बिरादरी के लोग हैं । अतः तुम्हारी बात का यकीन वो कदापि नहीं कर सकते । एक चोर इतना बेइमान कभी नहीं होता कि दूसरे चोर का साथ छोड़ दे ।’ कुछ देर रुकने के बाद वह फिर बोला, ‘तुम्हारी इज्जत इसी में है कि चुपचाप पैसा दे दो या फिर बर्तनों की घिसाई करो ।’
    वह उठकर अंदरखाने चला गया और बर्तनों की घिसाई करने लगा । सांझ बीतने से पहले निर्दयी ढाबे वाले ने दया नहीं दिखाई । उसकी निर्दयता के पीछे भी दया का ही भाव छिपा था । वह चाहता था कि उसकी इज्जत को और बाट न लगे । अंधेरा इज्जत बचाने में भरपूर मदद करता है । वह बाहर निकला कि एक और ढाबे वाला टकरा गया । अनुभव कितना भी कटु और बलवान ही क्यों न हो, भूख के आगे वह पछाड़ खा ही जाता है । वह अगले ही पल उस दूसरे ढाबे की कुर्सी पर बैठा हुआ था । भूख जोर की लग रही थी । अतः जमकर भरी हुई थाली लाने का इशारा कर दिया । यह क्या ! थाली में कुछ-एक टुकड़े पड़े हुए थे रोटी के । वह लगभग याचक की मुद्रा में बोला, ‘भइया, भरी हुई थाली लाइए हमारे सामने । बहुत जोर की भूख लगी है ।’
    ‘थाली तो एकदम फुल ही दी थी हमने तुमको ।’ ढाबे वाले ने जवाब दिया, ‘लगभग सारा डकारने के बाद अब नकारने पर आ गए । हाय-हाय, कितना बेइमान आदमी है यह ।’ और इतना कहते ही वह चिल्लाने लगा था ।

    ढाबे वाले ने जितना पैसा मांगा, वह उसकी औकात से बाहर की बात थी । कुछ भी काम न आया था । इस विषम परिस्थिति में बर्तन-घिसाई ने ही उसका साथ दिया था । अन्यथा कुटाई की मारक बेला को टालना लगभग नामुमकिन ही था । बाहर निकलते ही उसे आजादी का अहसास हुआ । उसे लगा कि वह अब सोच पा रहा है । ढाबे वाले इसीलिए उस पर टूट पड़े, क्योंकि उसने उन्हें टूटने का मौका दिया । ज्यादा पाने की इच्छा ही उसकी परीक्षा बन गई । वह आज पूरे दिन ‘म’ अक्षर से शुरु होने वाला एक समुदाय ही तो बना रहा । वैसे सोचने वाली बात यह है कि ‘म’ से मना भी होता है, जिसका इस्तेमाल न यह समुदाय करता है, न वह ही कर सका था । उसने सोचा । काश, वह उन लोगों को मना करने का आत्मबल दिखा पाया होता !

शुक्रवार, 8 जुलाई 2016

कुत्ता नहीं...आदमी गिर रहा था नीचे !

           
   साधो, दिल को आघात पहुँचाने वाली एक घटना अभी हाल ही में घटित हुई है । सोशल मीडिया पर यदि यह वायरल न हुई होती, तो शायद ही कोई जान पाता इस घटना के बारे में । अखबारों में वैसे भी ऐसी घटनाओं के लिए जगह नहीं होती । हाँ, टीवी चैनल वाले जरूर इस तरह की घटनाओं को सूँघते फिरते हैं, ताकि ब्रेकिंग न्यूज में वे आगे रह सकें । अगर इस तरह की घटनाओं को न पकड़ें, तो चौबीसों घंटे चैनल किस तरह चलेंगे और टीआरपी का मायाजाल किस प्रकार बुना जा सकेगा ।
   दरअसल समाज में महत्व के हिसाब से देखा जाए, तो यह एक अति न्यून महत्व की घटना थी । हमारे समाज में कुत्ते कितना महत्व रखते हैं? हम आते-जाते कुत्तों पर अनावश्यक पत्थर फेंककर मुस्कुराते हैं, सड़क पर सोए कुत्तों को लात मारकर बहादुरी का बोध ग्रहण करते हैं, उनपर अपने मुँह की गन्दगी फेंककर तथा विपरीत मौसम में गरम या ठंडा पानी डालकर असीम सुख का अनुभव करते हैं । इन तथ्यों के बावजूद उस घटना का वायरल होना कम-से-कम इस बात की तस्दीक अवश्य करता है कि थोड़ी ही सही, आदमियत अब भी बरकरार है ।
   वरना उस कुत्ते को फेंकने वाले आदमी ही थे, रूप-रंग और आकार-प्रकार के हिसाब से । संयोग से दोनों भविष्य के डॉक्टर हैं । करुणा, दया, सेवा-जिस पेशे के आत्मतत्व हैं, उन्हीं ने ऐसी हरकत की । पैसा जब संस्कार बन जाए, तो इन चीजों को छूटते देर ही कितनी लगती है ! खैर, कुत्ते को उछाल दिया गया उतनी उँचाई से । लोगों ने जान लिया कि कुत्ता नीचे गिर रहा है...गिर गया, पर कुत्ता नहीं गिर रहा था वहाँ । वहाँ तो आदमी गिर रहा था...नीचे...और नीचे ।
   कुत्ते को मैंने गिरते नहीं देखा है कभी । निकट से परिचय तब हुआ था, जब पहली बार इस मुहल्ले में रहने आया था । मुझे देखते ही किसी आँधी की तरह मेरी ओर बढ़ा था । मेरी ऊपर की साँस ऊपर और नीचे की नीचे ही अँटक गई थी । उस एक पल में यह भी अहसास हो गया था कि बेटा रैबीज के चौदह टीके ठुँकवाने से अब तुझे कोई नहीं रोक सकता । अफसोस ! आँधी निकट आते ही अचानक थम गई थी । थोड़ी दूरी से ही उसने मुझे सूँघा था और पूँछ झटकारते हुए वापस चला गया था । तब का दिन और आज का दिन । मैं अकसर देर रात को घर आता-जाता हूँ । वह मुझे दूर से ही देखता है । उसका जागरण और अलर्ट-भाव मुझे एक अजीब-सी सुरक्षा का अहसास प्रदान करता है । हालांकि उसके और मेरे बीच के सम्बन्ध को मैं आज तक समझ नहीं पाया हूँ, क्योंकि न तो वह मेरे दरवाजे कभी आया, न मैंने कभी किसी रोटी का टुकड़ा ही उसकी ओर फेंका ।
   उसके प्रति मेरे मन में सम्मान हो, ऐसा मैंने कभी नहीं सोचा । वह तो दिल के किसी कोने में बैठा हुआ है और व्यवहार तो दिल का ही आईना होता है । उसे देखते ही मेरी नजर झुक जाती है । यही सम्मान का भाव रहा होगा, जब उन निर्माता-निर्देशक ने एक कुत्ते पर फिल्म बनाने की सोची होगी । तेरी मेहरबानियां फिल्म हमारे सामने आई केवल उसके कारण । कुत्ता क्या चीज होता है, इसे जानने के लिए एक फिल्म कभी पर्याप्त नहीं हो सकती । इसके लिए तो एक लम्बी श्रृँखला बनानी होगी ।
   महाभारत काल में जब पांडवों को लगा कि अब इस दुनिया से कूच करना चाहिए, तो वे दुर्गम पहाड़ों की ओर निकल पड़े । जब तक जीवन है, तब तक उसकी सुरक्षा की चाह भी होती है मनुष्य में । हालांकि अपनी सुरक्षा करने में वे हर तरह से सक्षम थे, फिर भी उनके साथ एक कुत्ता चल रहा था । उन्हें यकीन था कि वह न केवल निष्कंटक पथ को दिखलाएगा, बल्कि चौकन्ना रहकर सुरक्षा को भी मजबूत करेगा । यह बात कुत्ते के महत्व और सम्मान को ही दिखलाती है ।

   अक्सर हम किसी को गाली देते हुए कहते हैं कि अमुक अपने कुत्तेपन पर उतर गया है । उस आदमी ने जो किया, उसे देखते हुए गाली यह होनी चाहिए कि अमुक अपने आदमीपने पर उतर गया था । कुत्ता होना कोई गाली नहीं, आदमी होना ही एक बड़ी गाली है ।
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