जीवन व समाज की विद्रुपताओं, विडंबनाओं और विरोधाभासों पर तीखी नजर । यही तीखी नजर हास्य-व्यंग्य रचनाओं के रूप में परिणत हो जाती है । यथा नाम तथा काम की कोशिश की गई है । ये रचनाएं गुदगुदाएंगी भी और मर्म पर चोट कर बहुत कुछ सोचने के लिए विवश भी करेंगी ।

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मंगलवार, 12 जुलाई 2016

कहीं नासा का बैंड न बज जाए !

           
   उत्तम प्रदेश और उसके पड़ोसी राज्य पाटलीपुत्र में जश्न का सिलसिला जारी है । होना भी चाहिए । लोग दूसरे राज्यों को टेलीस्कोप लेकर दौड़ लगाते हैं रोजगार की तलाश में । ऐसा नहीं है कि इनके अपने राज्यों में रोजगार की व्यवस्था नहीं है । उत्तम व्यवस्था है और इनकी उत्तमता के दर्शन आप नियमित सरकारी विज्ञापनों में कर सकते हैं । उत्तमता को कोई आँच न आए, इसके लिए ये जिधर देखिए उधर रेस लगाए रहते हैं । सूरत, लुधियाना, दिल्ली, मुम्बई को जाने वाली ट्रेनें इसका गवाह बनती हैं । ट्रेन अपने अंतिम स्टेशन पर पहुँच कर रुक न जाए और इनसे हाथ जोड़कर माफी न मांग ले, तब तक ये उसकी जान नहीं छोड़ते । ऐसे में अमेरिका से अगर रोजगार की खुशखबरी शटल यान पर चढ़कर इनके आँगन में उतरे, तो जश्न तो बनता ही है ।
   दरअसल नासा मंगल पर मानव बस्ती बसाने की योजना को अंतिम रूप देने वाला है । वहाँ वह शिक्षकों को भी ले जाना चाहता है । यही वह खबर है जो यहाँ के लोगों को जश्न के जलाशय में डूबने के लिए प्रेरित कर रही है । दुनिया का कोई भी व्यक्ति शिक्षक बनने की मंडी में इनका मुकाबला नहीं कर सकता । शिक्षक बनना सबके वश की बात भी नहीं होती । लोग समझते हैं कि इसके लिए पढ़ा-लिखा होना जरूरी होता है । योग्य व्यक्ति ही शिक्षक बन सकता है । अब अगर पढ़ा-लिखा आदमी शिक्षक बन गया, तो इसमें योग्यता वाली कौन सी बात हुई? योग्यता तो तब दिखाई देती है, जब कम पढ़ा-लिखा या न पढ़ा-लिखा आदमी शिक्षक बने । एक अयोग्य जब शिक्षक बन रहा होता है, तो वह अपनी योग्यता ही प्रदर्शित कर रहा होता है । सौभाग्य की बात है कि इन राज्यों में ऐसे ही लोग शिक्षक बनाए जाते हैं ।
   जाहिर सी बात है कि मंगल ग्रह को जाने वाले रास्ते में वही लोग दिखाई देंगे, जिनमें प्रतिभा कूट-कूट कर भरी होगी । इन राज्यों के अधिकांश वर्तमान एवं भावी शिक्षकों को पार पाना किसी के लिए भी समंदर को तैर कर पार करने के समान होगा । किसी और जगह के शिक्षकों के पास, हो सकता है, एकाध प्रतिभाएं हों, पर यहाँ के शिक्षक तो प्रतिभाओं की खान हैं । अब प्रतिभा है, तो उसे छिपाना गैर-न्यायसंगत है । प्रतिभा की ढोल तो बजती रहनी चाहिए ।
   अयोग्य शिक्षक में सबसे बड़ी प्रतिभा यह होती है कि वह अपने पोषक सरकार के प्रति उसी तरह स्वामीभक्त होता है, जैसे कुत्ता अपने पोषक स्वामी के प्रति । कुत्ते के स्तर को छूना आसान नहीं होता । वह पक्का योगाचार्य होता है । जिस तरह सूर्य के सामने सूर्य-नमस्कार किया जाता है, उसी तरह यह अफसर-नमस्कार करता है । पूँछ-मूवमेंटासन इसके द्वारा किया जाने वाला सर्वकालिक आसन है । अन्य लाभों के साथ संकट के बादल छँटने का महालाभ होता है इस आसन से ।
   यह बिल्डर भी है । तमाम ठेके इसकी झोली में अनायास गिरते रहते हैं । मंगल पर तो अभी खाली-का-खाली मैदान है । वहाँ रहने के लिए बिल्डिंग तो चाहिए ही चाहिए । यह हलवाई भी है । इज्जत देने का मूड हो, तो आप इसे कैटरर भी कह सकते हैं । यह खाना बनाने से लेकर खाना खिलाने, बर्तन मांजने व जूठन की साफ-सफाई का उस्ताद है । गाय-भैंसों की गिनती करना, राजनीति करना, चुनाव की बैलगाड़ी हांकना, बच्चों को टीका पिलाकर समाजसेवा करना...अनगिनत प्रतिभाएं छिपी हैं इसके अंदर । इन सब चीजों की मंगल ग्रह पर जरूरत होगी ।
   शिक्षक...माने जिसे पढ़ना-पढ़ाना आता हो, वह किस खेत की मूली खाकर इन शिक्षकों का मुकाबला करेगा ! प्रतिभाओं की संपदा के मामले में कहाँ गंगू तेली और कहाँ राजा भोज ! इन सब चीजों से एक बात तो एकदम स्पष्ट है कि जिस दिन मंगल के लिए चयन शुरु होगा, यहाँ बस मंगल ही मंगल होगा ।

   यहाँ के जश्न की खबर के बाद नासा अलर्ट-मोड में आ गया है । उसके सामने सबसे बड़ी समस्या शिक्षक को परिभाषित करने की है । जिन लोगों ने यहाँ कबाड़ा कर रखा है, वे वहाँ पर क्या करेंगे । इनकी जुगाड़ की प्रतिभा इनके मंगल पर पहुँचने की संभावना के द्वार खोलती है । नासा ने अभी से इस संभावना को नष्ट करने के लिए एक विकट जंतुनाशी पर अनुसंधान शुरु कर दिया है । अगर ऐसा नहीं हुआ, तो नासा का लासा निकलने से ( मिट्टी पलीद होने से ) कोई नहीं रोक सकता । अब देखना है कि जश्न मनाने वाले नासा का बैंड बजा पाते हैं या नहीं ।

शनिवार, 4 जून 2016

आधी छोड़ सारी को धावे

              
   दोपहर हो आई थी, अतः काम बंद हो गया था । भीषण गर्मी में दो-तीन घंटे का ब्रेक स्वाभाविक ही था । उसके बाद देर शाम तक काम । आठ घंटे पूरे जो करने होते थे । काम लेने वाला इतना दयालु नहीं होता कि आधे काम के पूरे पैसे दे दे । इस ब्रेक में खाने-पीने के बाद सुस्ताने को पर्याप्त समय मिल जाता था । उसने अपनी पोटली खोल ली थी । मोटी-मोटी लिटि्टयों के साथ प्याज भी संगत देने को तैयार था । लिट्टी और प्याज की जुगलबंदी हमेशा से मधुर राग छेड़ती रही है गरीब के आँगन में, पर इधर प्याज बहुत भाव खाने लगा है । वह रह-रहकर जुगलबंदी को तोड़ दे रहा है । इस साल उसे ऐसी पटकनी मिली है कि अभी तक मुँह के बल गिरा धूल फाँक रहा है । लिट्टी ने बिना कोई शिकायत किए उसे अपने साथ रख लिया है ।
   हथेलियों में प्याज को दबाकर उसका छिलका उतार ही रहा था कि मंगनू इधर ही आता दिखाई दिया । पास आते ही बोला,ʻआज अकेले ही अकेले...यारी भी और होशियारी भी ! वाह, अँचार की खुश्बू तो गजब ढा रही है...खाए बिना रहना अब तो नामुमकिन है ।ʼ
   ʻखाने से तुझे रोका ही किसने है ? आजा मेरे यार...मिलकर खाने का मजा लेते हैं ।ʼ वह भी चहक उठा था । मंगनू उसका लंगोटिया यार था । बड़े होने पर साथ ही काम करते, साथ ही खाते । दो साल पहले वह दिल्ली चला गया था अपने किसी रिश्तेदार के साथ । तब से यह याराना लगभग टूटा हुआ ही था ।
   मंगनू दुखी होते हुए,ʻयार तुझे देखकर अच्छा नहीं लगा । तू आज भी वही प्याज-लिट्टी...ʼ बोला,ʻमेरी मान, तू शहर चला चल । वहाँ दुगुनी-तिगुनी मजदूरी मिलती है यहाँ से । देखते-ही-देखते कायापलट हो जाएगी ।ʼ
   ʻपर यहाँ का छोड़कर जाना...? ठीक ही मिल जाता है यहाँ भी ।ʼ इसके बाद दोनों में अच्छी-खासी बहस हुई थी । सपने किसे अच्छे नहीं लगते ! अंततः वह यहाँ का छोड़कर जाने को तैयार हो गया था ।
    दिल्ली पहुँचते ही उसे हल्का झटका लगा था । इस वक्त वह एक दड़बे में बैठा हुआ था । कमरा कहना ज्यादती होगी । कमरा अत्यन्त छोटा था और रहने वाले थे बीस । हरेक के हिस्से में बस अपने शरीर के बराबर सोने की जगह । घर छोड़ने पर इतना कष्ट तो उठाना ही पड़ता है, यह सोचकर उसने अपने मन को सांत्वना देने की कोशिश की ।
   अगली सुबह तड़के ही वे एक चौराहे पर आ गए । इतनी सुबह क्यों? उसने पूछा भी था, पर मंगनू मुस्कुराकर रह गया था । चौराहे पर पहले ही अच्छी-खासी भीड़ इकट्ठा हो चुकी थी । किसी की नजर आसमान में कुछ ढूँढ रही थी, तो कोई आती-जाती गाड़ियों को निहार रहा था । सभी ने अपने हाथों में दफ्तियाँ ले रखी थीं । उन पर कुछ लिखा हुआ था । ʻक्या कोई जुलूस निकलने वाला है?ʼ मैंने पूछा ।
   ʻअरे नहीं यार । इन्होंने अपने रेट लिख रखे हैं इन दफ्तियों पर ।ʼ
   ʻमगर रेट किसलिए? यहाँ की मजदूरी तो पहले ही से निर्धारित होगी ।ʼ ʻतू समझा नहीं । यहाँ वैसे नहीं चलता । दफ्ती पर इन लोगों ने अपनी बेस-प्राइस लिख रखी है । बोली लगाने वाले उतने से शुरुआत करेंगे । आगे जितने अधिक पर बोली लग जाए ।ʼ
   ʻमतलब ये लोग अपने को बेचने वाले हैं?ʼ उसकी आँखें फैलती चली गईं । मुँह खुला-का-खुला रह गया ।
   ʻसिर्फ दिन भर के लिए ।ʼ मंगनू ने इत्मीनान से जवाब दिया । उसकी नजर वहाँ आए एक खरीदार पर रेंगती चली गई थी ।
   ʻएक दिन के लिए भी बेचना...यह तो सरासर गलत है ।ʼ कोई जर्जर नैतिकता उसके होठों के कोनों तक घिसटती हुई चली आई थी ।
   ʻबिकना फख्र की बात है आजकल ।ʼ नजरों को उसकी तरफ खींचते हुए कहा मंगनू ने,ʻतूने आईपीएल नहीं सुना । जमकर बोली लगती है वहाँ पर । बिकने वाला ही आज बड़ा कहलाता है । चुपचाप अपनी दफ्ती उठा ले और बिकने को...ʼ अपनी बात अधूरी छोड़ वह एक खरीदार की ओर बढ़ गया था ।
   उसे भी एक कार वाली खरीदकर अपने घर ले आई थी । अभी रंगरोगन समाप्त ही हुआ था उस घर में और सारे सामान घर के सम्पूर्ण अराजक मुद्रा में दिखाई दे रहे थे । उन्हें व्यवस्थित व नियमबद्ध करने के लिए ही उसे लाया गया था । वह तुरंत काम पर लग गया था । दो घंटे तक कोई बाधा उत्पन्न नहीं हुई । इस बीच एक प्याली चाय भी गटकने को मिल गई । यहाँ तो सचमुच ही मजा है भाई-सोचते हुए उसके चेहरे पर मुस्कान-सी पसर गई । मगर यह खुशी क्षणिक ही साबित हुई । गृहस्वामिनी की सखियां आई हुई थीं घर पर और जमकर दावत उड़ाने के बाद वे अब विदा ले रही थीं । तभी उसे सबको सैंडल पहनाने का फरमान जारी हुआ था । एक पल को वह हिचका, फिर इसमें ʻऐसी-वैसी कौन सी बात हैʼ सोचते हुए सैंडल पहनाने लगा । उनके जाने के बाद दावत के सारे जूठे बर्तन उस पर एक साथ पिल पड़े । चलो, घर का ही काम है...मजदूरी तो खरी-खरी बन जाएगी न !
   वह फिर सामानों को व्यवस्थित करने में जुट गया था । दोपहर हो आई थी और उसे भूख भी लग रही थी । दावत की बची भोजन-सामग्री के बारे में सोचते ही मुँह में दरिया-सी बहने लगी । वह कनखियों से देखता, मगर कोई उसे पूछने नहीं आया । आई, तो गृहस्वामिनी की जवान बेटी आई । नुक्कड़ वाले बड़ी-सी दुकान से विदेशी ब्रांड की चॉकलेट लानी थी...तुरंत ।
   चॉकलेट देखते ही उसका गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया । उसने ʻईडियट कहीं काʼ कहते हुए जोरदार तमाचा रसीद कर दिया । दरअसल वह कोई दूसरी चॉकलेट उठा लाया था । गृहस्वामिनी बीच में न पड़ती, तो वह और पिट गया होता । क्षतिपूर्ति के लिए वह तुरंत चिप्स और पापड़ के कुछ टुकड़े एक प्लेट में रखकर ले आई थी । उसने एक टुकड़ा भी मुँह में नहीं डाला । अपमान ने पेट की भूख को पिघला दिया था ।
   शाम होते-होते फिर एक फरमान जारी हुआ था । उसे डॉगी को नाले के पास ले जाना था । उसे बड़े जोर की बैड फीलिंग हो रही थी । यह सुनते ही वह चकराया । आदमी तो आदमी, अब कुत्ते की भी चाकरी?

   रात में वह सोच रहा था । पैसा अधिक है, तो खर्च और अपमान भी अधिक हैं यहाँ । आधी छोड़कर आया था, अब...?   
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