जीवन व समाज की विद्रुपताओं, विडंबनाओं और विरोधाभासों पर तीखी नजर । यही तीखी नजर हास्य-व्यंग्य रचनाओं के रूप में परिणत हो जाती है । यथा नाम तथा काम की कोशिश की गई है । ये रचनाएं गुदगुदाएंगी भी और मर्म पर चोट कर बहुत कुछ सोचने के लिए विवश भी करेंगी ।

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शुक्रवार, 9 सितंबर 2016

आदर्श बनने की राह

                     
   घर में आने वालों का ताँता लगा हुआ था । किसी के हाथ में गले में डालने के लिए फूलों की माला थी, तो किसी के हाथ में थमाने के लिए पुष्पगुच्छ । कोई चमकीले कागजों से आवरणबद्ध अपनी पसंद के उपहार लाया था, तो कोई यूँ ही आ खड़ा हुआ था...खाली हाथ, मगर मन के कोने में कई ऐसे शब्द सजने-सँवरने लगे थे, जो किसी को विभूषित करने के काम आते हैं ।
   सुबह से शाम हो आई थी, मगर आने वाले थे कि रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे । हालांकि संख्या तरल होती गई थी । शाम का झुरमुटापन बढ़ता गया था और लोगों का छिटपुटापन भी । लोगों की इतनी रेलम-पेल के बावजूद घर के सदस्यों का दिन हँसी-खेल में बीता था । मुस्कान की मेल पूरे दिन चेहरे की ट्रैक पर भावी बुलेट-सी दौड़ती रही थी । समाज में सम्मान का सेंसेक्स अचानक उछल गया जो था । हैसियत की हनक तो उसी वक्त अपने तंबू-कनातों के लिए खूँटे गाड़ने के काम में लग गई थी, जब वह सूचना आई थी ।
   सूचना सुख और खुशी का वाहक बन कर आई थी । शर्मा जी को सरकार की ओर से आदर्श शिक्षक घोषित किया गया था । शर्मा जी से अधिक उनके परिवार वाले खुश थे । बैठे-बिठाए रुतबे में असंख्य गुना वृद्धि हो गई थी । परिवार वालों की खुशी का एक और भी कारण था...शर्मा जी को प्राप्त हुआ दो वर्ष का सेवा-विस्तार । दो वर्ष का अतिरिक्त वेतन...मतलब दो वर्ष और मौज-मस्ती के । पेंशन तो टेंशन ही लाएगा । जो मिलेगा, वह कितना काम आएगा । बच रही बेटी की शादी, दवा-दारू के लिए अस्पताल को चंदा, छीजते शरीर के लिए पौष्टिक खुराक, अब तक दमित तीर्थाटन की इच्छा, मंदिरों में अनगिनत बकाए रह गए चढ़ावे तथा और भी बहुत कुछ-इनका सामना बाकी परिवार वालों के लिए इतना आसान भी तो नहीं था ।
   लोगों की आमद खत्म होते ही शर्मा जी ड्राइंग-रूम से निकल कर अपने कमरे में आ गए । कुछ समय बाद भोजन भी आ गया था उनका । अनमने भाव से एकाध रोटी खाकर थाली को टरका दिया था । घर खुशी से लोट-पोट था, पर उनके चित्त में खोट की चोट आकार लेने लगी थी । दिल की धड़कन बढ़ चली थी । बिस्तर पर लेटने का कोई लाभ न हुआ । नींद अपने लोक में जिद्दी बन अड़ी रही । वह उठकर खिड़की तक चले आए । बाहर तेज ठंडी हवा चल रही थी । अचानक एक झोंका उनसे टकराया और मन में छिपे रहस्य की गाँठ को खोलता चला गया ।
   उस दिन पहली पेशी थी छुटके शिक्षा अधिकारी के यहाँ । यह पेशी अधिकारी के घर पर ही हुई थी । उसी ने बुलवाया था । उन्हें देखते ही बोला, ‘आदर्श-वादर्श बनना है कि नहीं आपको...आदर्श बनने की बात करके एकदम्मे से भूमिगत काहे हो गए इधर हम कलम-दवात लेके डेढ़ किलो मक्खियां मार चुके हैं । गणेश-पूजन के लिए क्या आपके पूर्वजों को न्योतना पड़ेगा?’
   ‘नहीं सर, हमीं करेंगे गणेश-पूजन ।’ वह हड़बड़ाते हुए बोले थे, ‘आज्ञा दीजिए, क्या-क्या तैयारी करूँ उसके लिए ।’
   ‘भइये, फल-फूल तो लाओगे ना या...?’
   ‘नहीं-नहीं सर, आप आज्ञा तो दीजिए ।’ अपनी ऊर्जा समेटते हुए उन्होंने कहा था ।
   ‘वैसे तो हम अन्य लोगों से चालीस पुष्प मंगवाते हैं, पर चूँकि आप बुजुर्ग हैं, अतः तीस पुष्प ही यहाँ समर्पित कर दीजिए ।’ कहते हुए उसकी हँसी रहस्य के आवरण में लिपटती चली गई थी ।
   ‘पर सर, तीस फूल कुछ ज्यादा...’
   ‘निकलिए आप ।’ वह बीच में ही बोल पड़ा था, ‘आप जैसे लोगों की स्तुति लिखकर मैं अपने कलम को खोटा नहीं कर सकता ।’
   इसके बाद उनके रजामंद होने पर ही उन्हें आदर्श बनाने की नींव पड़ी थी । उस अधिकारी ने अपने स्तर से लिख-पढ़कर फाइल को आगे बढ़ा दिया था । कुछ ही दिनों के बाद उन्हें जिले के शिक्षा अधिकारी के दरबार में उपस्थित होने का हुक्म प्राप्त हुआ था । वहाँ सामना अधिकारी के स्टेनो से हुआ था । उसने एक साँस में बता दिया था ‘कि उन्हें आदर्श बनाने के लिए साहब जबर्दस्त परिश्रम कर रहे हैं । आदर्श बनना या बनाना परिश्रम की मांग करता है । गुण-गान के लिए अच्छे शब्दों की खातिर साहब कई ज्ञान व समांतर कोषों को छान रहे हैं । परिश्रम भूखे पेट नहीं होता । भूख मिटाने के लिए अधिक नहीं, बस पचास ठो कउनो फल की दरकार होगी । कल हमको फल रिसीभ करवा दीजिए, परसों आपकी फाइल रिलीभ करवा दूँगा साहब से टंच करवा के । ऐसा टिप्पणी होगा कि फाइल एकदम मंडले पर जाकर रुकेगी ।’
    इसके बाद मंडल की तीर्थ-यात्रा भी उन्हें करनी पड़ी थी । उनकी फाइल को देखते ही अधिकारी ने कहा था, ‘वैसे तो आपकी उम्र आदर्श शिक्षक बनने लायक हो चुकी है, पर वो क्या है कि अभी आप चवन्नी जितना आदर्श ही बन पाए हैं । अकेले अठन्नी आदर्श हम बना देंगे आपको । इतना अधिक आदर्श एकसाथ बनने के लिए आपको पहले की भाँति अपना आदर्श काम जारी रखना होगा । बल्कि यूँ कहें कि आपको पहले से अधिक आदर्श कर्म हमारे सामने प्रस्तुत करना होगा ।’
   अपना आदर्श कर्म अधिकारी की दराज में प्रस्तुत करते ही उनकी फाइल को पंख  लग गए । वह किसी अंतरिक्ष यान की रफ्तार से राजधानी जा पहुँची । पीछे किसी ट्रेन ने उन्हें भी राजधानी पहुँचाकर ही दम लिया । वहाँ उपस्थित पैनल के एक अधिकारी ने निशाना साधा था । वह मारक अंदाज में बोला, ‘आपको आदर्श शिक्षक क्यों कहा जाए?’ ‘क्योंकि हम आदर्श हैं ।’ ‘गलत, आपको एक मौका और दिया जाता है अपना जवाब सुधारने के लिए ।’
   एक पल के बाद इनके मुँह से निकला था, ‘क्योंकि हम बारह आने आदर्श बन चुके हैं । गुड, अ वेरी प्रैक्टिकल आंसर ! आपका आत्मविश्वास आपके आदर्श का सबूत है । निश्चय ही आप सोलह आने आदर्श बनेंगे । अब आपको आदर्श बनने से कोई नहीं रोक सकता ।’
   ‘कब तक खड़े रहोगे खिड़की पर?’ अचानक आई पत्नी की आवाज ने उन्हें वापस आज में लाकर पटक दिया था । बिस्तर पर लेटने के बावजूद नींद नहीं आई थी । अपनी ही नजर में गिरने की यह शायद पहली प्रतिक्रिया थी । पत्नी की प्रेमपूर्ण नजर उन्हें आकाश की ऊँचाई में लिए जा रही थी, जबकि उनकी अपनी नजर पाताल की असीम गहराइयों को खोजने में निमग्न थी ।

मंगलवार, 12 जुलाई 2016

कहीं नासा का बैंड न बज जाए !

           
   उत्तम प्रदेश और उसके पड़ोसी राज्य पाटलीपुत्र में जश्न का सिलसिला जारी है । होना भी चाहिए । लोग दूसरे राज्यों को टेलीस्कोप लेकर दौड़ लगाते हैं रोजगार की तलाश में । ऐसा नहीं है कि इनके अपने राज्यों में रोजगार की व्यवस्था नहीं है । उत्तम व्यवस्था है और इनकी उत्तमता के दर्शन आप नियमित सरकारी विज्ञापनों में कर सकते हैं । उत्तमता को कोई आँच न आए, इसके लिए ये जिधर देखिए उधर रेस लगाए रहते हैं । सूरत, लुधियाना, दिल्ली, मुम्बई को जाने वाली ट्रेनें इसका गवाह बनती हैं । ट्रेन अपने अंतिम स्टेशन पर पहुँच कर रुक न जाए और इनसे हाथ जोड़कर माफी न मांग ले, तब तक ये उसकी जान नहीं छोड़ते । ऐसे में अमेरिका से अगर रोजगार की खुशखबरी शटल यान पर चढ़कर इनके आँगन में उतरे, तो जश्न तो बनता ही है ।
   दरअसल नासा मंगल पर मानव बस्ती बसाने की योजना को अंतिम रूप देने वाला है । वहाँ वह शिक्षकों को भी ले जाना चाहता है । यही वह खबर है जो यहाँ के लोगों को जश्न के जलाशय में डूबने के लिए प्रेरित कर रही है । दुनिया का कोई भी व्यक्ति शिक्षक बनने की मंडी में इनका मुकाबला नहीं कर सकता । शिक्षक बनना सबके वश की बात भी नहीं होती । लोग समझते हैं कि इसके लिए पढ़ा-लिखा होना जरूरी होता है । योग्य व्यक्ति ही शिक्षक बन सकता है । अब अगर पढ़ा-लिखा आदमी शिक्षक बन गया, तो इसमें योग्यता वाली कौन सी बात हुई? योग्यता तो तब दिखाई देती है, जब कम पढ़ा-लिखा या न पढ़ा-लिखा आदमी शिक्षक बने । एक अयोग्य जब शिक्षक बन रहा होता है, तो वह अपनी योग्यता ही प्रदर्शित कर रहा होता है । सौभाग्य की बात है कि इन राज्यों में ऐसे ही लोग शिक्षक बनाए जाते हैं ।
   जाहिर सी बात है कि मंगल ग्रह को जाने वाले रास्ते में वही लोग दिखाई देंगे, जिनमें प्रतिभा कूट-कूट कर भरी होगी । इन राज्यों के अधिकांश वर्तमान एवं भावी शिक्षकों को पार पाना किसी के लिए भी समंदर को तैर कर पार करने के समान होगा । किसी और जगह के शिक्षकों के पास, हो सकता है, एकाध प्रतिभाएं हों, पर यहाँ के शिक्षक तो प्रतिभाओं की खान हैं । अब प्रतिभा है, तो उसे छिपाना गैर-न्यायसंगत है । प्रतिभा की ढोल तो बजती रहनी चाहिए ।
   अयोग्य शिक्षक में सबसे बड़ी प्रतिभा यह होती है कि वह अपने पोषक सरकार के प्रति उसी तरह स्वामीभक्त होता है, जैसे कुत्ता अपने पोषक स्वामी के प्रति । कुत्ते के स्तर को छूना आसान नहीं होता । वह पक्का योगाचार्य होता है । जिस तरह सूर्य के सामने सूर्य-नमस्कार किया जाता है, उसी तरह यह अफसर-नमस्कार करता है । पूँछ-मूवमेंटासन इसके द्वारा किया जाने वाला सर्वकालिक आसन है । अन्य लाभों के साथ संकट के बादल छँटने का महालाभ होता है इस आसन से ।
   यह बिल्डर भी है । तमाम ठेके इसकी झोली में अनायास गिरते रहते हैं । मंगल पर तो अभी खाली-का-खाली मैदान है । वहाँ रहने के लिए बिल्डिंग तो चाहिए ही चाहिए । यह हलवाई भी है । इज्जत देने का मूड हो, तो आप इसे कैटरर भी कह सकते हैं । यह खाना बनाने से लेकर खाना खिलाने, बर्तन मांजने व जूठन की साफ-सफाई का उस्ताद है । गाय-भैंसों की गिनती करना, राजनीति करना, चुनाव की बैलगाड़ी हांकना, बच्चों को टीका पिलाकर समाजसेवा करना...अनगिनत प्रतिभाएं छिपी हैं इसके अंदर । इन सब चीजों की मंगल ग्रह पर जरूरत होगी ।
   शिक्षक...माने जिसे पढ़ना-पढ़ाना आता हो, वह किस खेत की मूली खाकर इन शिक्षकों का मुकाबला करेगा ! प्रतिभाओं की संपदा के मामले में कहाँ गंगू तेली और कहाँ राजा भोज ! इन सब चीजों से एक बात तो एकदम स्पष्ट है कि जिस दिन मंगल के लिए चयन शुरु होगा, यहाँ बस मंगल ही मंगल होगा ।

   यहाँ के जश्न की खबर के बाद नासा अलर्ट-मोड में आ गया है । उसके सामने सबसे बड़ी समस्या शिक्षक को परिभाषित करने की है । जिन लोगों ने यहाँ कबाड़ा कर रखा है, वे वहाँ पर क्या करेंगे । इनकी जुगाड़ की प्रतिभा इनके मंगल पर पहुँचने की संभावना के द्वार खोलती है । नासा ने अभी से इस संभावना को नष्ट करने के लिए एक विकट जंतुनाशी पर अनुसंधान शुरु कर दिया है । अगर ऐसा नहीं हुआ, तो नासा का लासा निकलने से ( मिट्टी पलीद होने से ) कोई नहीं रोक सकता । अब देखना है कि जश्न मनाने वाले नासा का बैंड बजा पाते हैं या नहीं ।
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