जीवन व समाज की विद्रुपताओं, विडंबनाओं और विरोधाभासों पर तीखी नजर । यही तीखी नजर हास्य-व्यंग्य रचनाओं के रूप में परिणत हो जाती है । यथा नाम तथा काम की कोशिश की गई है । ये रचनाएं गुदगुदाएंगी भी और मर्म पर चोट कर बहुत कुछ सोचने के लिए विवश भी करेंगी ।

रविवार, 21 मई 2017

कोई लौटा दे बीते हुए दिन


चित्र साभार - cartoon baotinforum.com
   पहलू-दर-पहलू बदलने के बाद भी मुझे नींद नहीं आई थी । अंततः बिस्तर छोड़कर कमरे से बाहर निकल आया था । इधर मेरे कदम तेज हुए थे, उधर तेज हवा का झोंका आकर टकराया था मेरे बदन से । अगले ही पल मैं पार्क में था । नींद आँखों में नहीं थी, लेकिन उसका आलस-तंत्र बरकरार था अब तक । फूलों से टकराकर आती हवा ने इस तंत्र को पलक झपकते ध्वस्त कर दिया । मैं एक बेंच की ओर बढ़ा । यह क्या, बेंच पर कोई पहले से ही मौजूद था । वह एकदम निकट आने पर ही नजरों में समाने लायक था । ऐसा होने के पीछे उस रोशनी का कुसूर था, जो उस जगह पर नहीं पहुँच रही थी ।
   थोड़ा और निकट आया, तो आश्चर्य कम झटका ज्यादा लगा । वहाँ मौजूद प्राणी और कोई नहीं, छाया बहिनजी थीं । उनका दावा था कि ईश्वर ने किसी और को नहीं, बल्कि केवल उन्हें भेजा है अपने लोगों पर शासन करने के लिए । अतः यह लोगों का दायित्व है कि वह उन्हें ही वोट देकर सत्ता तक पहुँचने में उनकी मदद करे । वह साक्षात ईश्वर की छाया हैं, अतः कम से कम अपने राज्य में सत्ता का सुख लूटने का ठेका भगवान ने केवल उन्हें ही प्रदान कर रखा है ।
   एक आश्चर्य और हुआ । बहिनजी तो मौजूद थीं, किन्तु छाया नदारद थी उनकी । अनगिनत छायाओं के आवरण में रहने वाली के पास इस वक्त कोई छाया नहीं थी । मुझे समझ में नहीं आया कि लानत-मलामत इस रोशनी की हठधर्मिता को भेजूँ या वक्त के तमाशे को । वह मुझे देखकर थोड़ी भयभीत-सी हुईं । कारण उनको घेरे रहने वाला सुरक्षा-दस्ता वहाँ नहीं था और सामने एक आम आदमी खड़ा था । वह चिल्लातीं, इसके पहले ही मैं पीछे हटते हुए बोला, 'आप सुरक्षित हैं, क्योंकि एक आम आदमी आपके साथ है ।'
   ' क्या खाक साथ है ।' वह पहले से ही तैयार बैठी थीं शायद, इसीलिए यह सुनते ही उबल पड़ीं । चीखते हुए बोलीं, 'वह साथ होता, तो आज मैं इस एकान्त में पड़ी होती? आज तो बिस्तर में मेरी नींद भी मेरे साथ नहीं है ।'
   मेरी नजर उनके बदन पर लदे सोने और हीरे पर जा फँसी थी । एक नजर उनकी जूतियों से भी रू--रू होकर चली आई थी । मुझे एहसास हुआ कि सोने आदमी के 'सोने' की गारंटी नहीं होते, अन्यथा बहिनजी अपने आलीशान बंगले में जबर्दस्त मुलायम बिस्तर पर इस वक्त नींद के मजे लूट रही होतीं । मुझे यह देखकर भी दुख का एहसास हुआ कि बदन के हीरे तो जुगनुओं की तरह चमक रहे थे, किन्तु उनके चेहरे की चमक गायब थी ।
   'मैं कुछ समझा नहीं ।' वास्तव में उनके मन की बात को पकड़ नहीं पाया था मैं । अतः बेंच के एक तरफ बैठते हुए मैंने पूछा, 'आप कहना क्या चाहती हैं?'
   'पिछले हर चुनाव में मुझे हार का मुँह देखना पड़ रहा है । मैं कुछ भी करती हूँ, लेकिन हार मेरे ही गले में आकर गिरती है । ऐसा क्यों होता है?'
   हार भी तो आपको बहुत पसंद है । वह नोटों का हार...आप रंग में होती थीं, आम आदमी दंग होता था । यह मेरे मुँह से निकलते-निकलते रह गया । उनके सुनते ही आपे से बाहर होने के पूरे आसार थे । रात के इस सन्नाटे में मैं कोई खतरा मोल नहीं ले सकता था । बहिनजी के सामने तो दिन में भी खतरा है । मैंने उन्हें राहत देने की नीयत से कहा, 'हो सकता है विपक्षियों ने आपके लोगों को भरमा दिया हो या वे लोग वोट के समय जागते-जागते रह गए हों ।'
   'एकदम नहीं । मुझे लगता है कि जिस हद तक उन्हें मूर्ख बनाना चाहिए था, उस हद तक मैं नहीं बना पाई । उन्हें बनाने की कोशिशों में कुछ कमी रह गई ।' कहते-कहते उनके चेहरे पर अफसोस के भाव उभर आए थे । अंदर उनके मन में एक अज्ञात भय भी समा रहा था कि कहीं मूर्ख बनाने के दिन लदने तो शुरु नहीं हो गए !
   'लोकतंत्र में बनाना...' मैंने मूर्ख सा मुँह खोलते हुए पूछा ।
   'बनाना पड़ता है, तभी सारे आम अपनी मुट्ठी में होते हैं । सत्ता को आम आदमी यूँ ही नहीं देता ।'
   उनकी बात मुझे नागवार गुजरी थी, क्योंकि मैं भी एक आम आदमी हूँ । लोग झूठ तो नहीं बोलते कि आम आदमी समझदार होता है और वह मूर्ख कतई नहीं बनता कभी-चाहे वह खुद कोशिश करे या कोई और उसे बनाए ।
   'आज तो यह है कि सत्ता दूर-दूर जा रही है, तो कुछ और भी पीछे छूट रहा है ।' मुझे चुप देख उन्होंने खुद ही बात आगे बढ़ाई थी । कुछ पल रुक कर बोलीं, 'आज संगी-साथी भी मेरा साथ छोड़ चले हैं । जिन्होंने मेरे आशीर्वाद से सत्ता की मलाई जम कर खाई, अब वह भी मीडिया में आँखें तरेरने लगे हैं ।'
   'यही माया है बहिनजी । मैं तो कहता हूँ कि निकल जाइए इस माया के जाल से । माया खुद जीती है, पर औरों को ठीक से जीने नहीं देती ।'
   'आपके कहने का मतलब कि मैं संन्यास ले लूँ? अपनी आज तक की मेहनतों को यूँ ही समर्पण कर दूँ? छाया को उससे', हाथ ऊपर उठाकर, 'आदेश मिला है कि वह अपने लोगों पर शासन करे । छाया उस आदेश की अवमानना नहीं कर सकती ।'
   'तो फिर इतने सालों तक प्रतीक्षा...एकान्त-राग भी आपको संन्यास की ओर ले जाएगा । आपके छोड़ चले साथी आपको इस ओर धकेलें, आप खुद ही...'
   'मैं समझी नहीं आपका मतलब?'
   'सीधा सा है ।' मैंने जवाब दिया, ' आप अपने बंगले को 'माया-आश्रम' नाम दे दीजिए । शेष आपके चेले-चपाटी कर देंगे । यहाँ किसी को मूर्ख बनाना नहीं पड़ता । लोग खुद ही मूर्ख बने चले आते हैं । वहाँ तो आम आदमी शीश झुकाता था, यहाँ तो सत्ता वाले भी झुकते हैं । यहाँ की सत्ता अधिक बलवान है, परन्तु मौन रहकर काम करती है ।'

   बहिनजी असमंजस में दिखाई पड़ती हैं । हालांकि अब उन्हें एहसास होने लगा है कि पुराने दिन अब नहीं लौटने वाले । कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन की याचना करने से तो यही अच्छा है कि दूसरे विकल्प को चुन लिया जाए । कम से कम इज्जत तो बची रह जाएगी । वह मेरी पीठ पर हाथ रखती हैं और उठकर आगे बढ़ जाती हैं । मैं उधर उन्हें बढ़ते हुए देखता हूँ, इधर रात तेजी से आगे बढ़ती है ।        

2 टिप्‍पणियां:

  1. हास्य व्यंग्य मेरी पसंदीदा विधाओ में से एक हे। बहुत ख़ूब लिखा आपने। सुंदर रचना।

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