जीवन व समाज की विद्रुपताओं, विडंबनाओं और विरोधाभासों पर तीखी नजर । यही तीखी नजर हास्य-व्यंग्य रचनाओं के रूप में परिणत हो जाती है । यथा नाम तथा काम की कोशिश की गई है । ये रचनाएं गुदगुदाएंगी भी और मर्म पर चोट कर बहुत कुछ सोचने के लिए विवश भी करेंगी ।

मंगलवार, 1 नवंबर 2016

नाटक का छल

                   

                      
   महाराज सियार इस वक्त अपने सिंहासन पर मौजूद हैं । पिछली रातों में बिन बुलाए मेहमान की तरह आ धमके सपनों ने उन्हें परेशान कर रखा है । प्रत्येक सपना चीख-चीख कर यही संदेश दे रहा है कि सिंहासन पर उनके बैठने के दिन अब लद चुके । सिंहासन उन्हें लात मारकर निकालने को संकल्पबद्ध होकर जैसे बैठा हो । ऐसे में महाराज सियार का सिंहासन को मजबूती से पकड़कर बैठना स्वाभाविक ही है । प्राणी जब अंदर से भयभीत होता है, तो वह कुछ ज्यादा ही बढ़-बढ़ के बोलता है । वह ऐसा इसलिए करता है, ताकि उसके भय का आभास किसी को न हो सके । हालांकि उसकी ऐसी स्थिति ही उसकी पोल खोल रही होती है ।
   सार्वजनिक मंचों से महाराज सियार अनगिनत बार यह दावा कर चुके हैं कि अगला महाराज बस वही बनने वाले हैं । सिंहासन के एकमात्र उत्तराधिकारी वही हैं । सत्ता रुपी दुल्हन के लिए उनसे अधिक सुयोग्य दूल्हा कोई और नहीं है । पर पता नहीं क्यों, जितना वह चिल्लाते जाते हैं, अंदर बैठा भय का भूत उतना ही अपना आकार बढ़ाते जाता है । भय के भूत को मार भगाने के लिए अपने लोगों की जरूरत पड़ती है । इस वक्त दरबार-ए-खास में वही लोग मौजूद हैं, जिनका दावा है कि अगर उनकी छाती फाड़ दी जाए, तो वहाँ भगवान श्रीराम नहीं, बल्कि महाराज सियार के दर्शन होंगे । ऐसे सूरमा भी मौजूद हैं, जो महाराज के प्रति भक्ति दिखाने के लिए थप्पड़ चला चुके हैं और जूतम-पैजार कर चुके हैं । ऐसे मौसम-विज्ञानी भी उपस्थित हैं, जो हवा के रुख का सटीक आकलन करते हुए सुरक्षा के लिहाज से महाराज से चिपक गए हैं ।
   दरबार-ए-खास को ठस्सम-ठस्सा देख महाराज सियार का छाती अकड़ाकर बैठना बनता ही बनता है । भीड़ सत्ता को बड़ी राहत देती है । यहाँ तो सब ठीक-ठाक लग रहा है, किन्तु बाहर की खबर जब तक नहीं मिल जाती, तब तक मन के चैन पर बैन लगा रहेगा । मन को इंतजार है, तो सिर्फ खबरी खरगोश का । आने वाले तो सभी आ चुके हैं, किन्तु वह है कि आने का नाम नहीं लेता । महाराज सियार की नजरें बाहर से आने वाली राह पर अटकी हुई हैं ।
   तभी खबरी खरगोश धड़धड़ाता हुआ दरबार में प्रवेश करता है । महाराज के सामने आकर वह घुटनों तक झुकते हुए कहता है, ‘महाराज की जय हो । एक खुशखबरी पकड़ के लाया हूँ महाराज । आदेश हो तो सभी के समक्ष पेश करूँ ।’
   ‘तुझे आदेश की क्या जरूरत है । इधर-उधर न कर और जल्दी से सुना । अब मुझसे रहा नहीं जाता ।’ कहते-कहते महाराज की अधीरता सतह पर आ जाती है ।
   ‘महाराज, पिछला सर्वे जहाँ आपको पिछड़ते हुए दिखा रहा था, वहाँ अब नया सर्वे आपकी बढ़त को बता रहा है । यह तो चमत्कार हो गया महाराज । आपने तो कुछ किया भी नहीं और...’
   ‘सब राजपिता का कमाल है । उनका लिखा नाटक सुपर-डुपर हिट रहा ।’ इतना कहते ही महाराज के चेहरे पर एक रहस्यमयी मुस्कान लोटम-लोट होने लगती है ।
   ‘पर हुजूर, पिछले साढ़े चार साल से नाटक तो खेला ही जा रहा था ।’ खबरी के चेहरे पर आश्चर्य के भाव हैं । वह अपनी बात आगे बढ़ाता है, ‘एक नाटक के चलते हुए भी दूसरा नाटक !...बात कुछ समझ में नहीं आई ।’
   ‘तेरी जितनी औकात होगी, तू उतना ही सोच पाएगा न । बात सबकी समझ में आ जाए, तो नाटक का मजा ही क्या है ।’
   ‘मैं फिर पूछता हूँ महाराज, एक नए नाटक की जरूरत क्या थी आखिर?’
   ‘चुनाव सिर पर है और हमारा ही गणित हमको पिछड़ते दिखा रहा था । वैसे भी अब जनता से वोट लेना उतना आसान नहीं रहा । आज उसे सबसे बड़ा मूर्ख बनाने वाला ही उसके वोट का हकदार होता है ।’
   ‘मतलब यह नाटक जनता को...?’
   ‘और नहीं तो क्या । तू कुछ और तो नहीं समझ बैठा था?’ महाराज के चेहरे पर एक प्रश्न-सा उभरता है ।
   ‘हाँ महाराज, मुझे लगा था कि सभी आपही को घेरकर...उस अभिमन्यु के जैसा ।’ खबरी खरगोश की आवाज मद्धिम होती जाती है कहते हुए ।
   ‘तू समझदार है । अभिमन्यु वाली सहानुभूति ही नए सर्वे में ललकार रही है । ख्याल रहे, यह बात जनता तक कतई न पहुँचे । चुनाव होने तक तो कतई नहीं । उसके बाद कोई क्या उखाड़ लेगा अपना ।’
   खबरी खरगोश को महसूस होता है कि यह और कुछ नहीं, छल है जनता के साथ । पर इसे जनता समझे, तब न !

4 टिप्‍पणियां:

  1. जय मां हाटेशवरी...
    अनेक रचनाएं पढ़ी...
    पर आप की रचना पसंद आयी...
    हम चाहते हैं इसे अधिक से अधिक लोग पढ़ें...
    इस लिये आप की रचना...
    दिनांक 03/11/2016 को
    पांच लिंकों का आनंद
    पर लिंक की गयी है...
    इस प्रस्तुति में आप भी सादर आमंत्रित है।

    उत्तर देंहटाएं

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