जीवन व समाज की विद्रुपताओं, विडंबनाओं और विरोधाभासों पर तीखी नजर । यही तीखी नजर हास्य-व्यंग्य रचनाओं के रूप में परिणत हो जाती है । यथा नाम तथा काम की कोशिश की गई है । ये रचनाएं गुदगुदाएंगी भी और मर्म पर चोट कर बहुत कुछ सोचने के लिए विवश भी करेंगी ।

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मंगलवार, 16 अगस्त 2016

तलाश अभी भी है आजादी की

                   
   हमारे पड़ोसी आँधी की तरह आए और हमें उड़ाते हुए तूफान की तरह ले गए । इज्जत से बोले तो हमें लगभग घसीटते हुए ले गए । खली की तरह उनका शरीर और मैं सिंकिया पहलवान । असहमति जताने या किसी किस्म का प्रतिरोध करने की तनिक भी गुंजाइश नहीं थी । ऊपर से आजादी के जश्न का मौसम । वह आजाद-खयाली से उसी तरह लबालब दीख रहे थे, जिस तरह मूसलाधार बारिश से हमारे आज के शहर । लबालब होने के लिए हमारे शहरों के पास आजादी-ही-आजादी है ।
   ‘अरे, बताइए तो सही कि हमें कहाँ उड़ाए लिए जा रहे हैं?’ उनकी पकड़ से थोड़ा आजाद होते हुए हमने पूछा ।
   ‘लो कर लो बात ।’ वह तनिक आश्चर्य से बोले, ‘जनाब को इतना भी नहीं पता कि हम आजादी के जश्न में शरीक होने जा रहे हैं ।’
   ‘क्या आजादी भी रहती है इस मुल्क में, हमें क्यों नहीं दिखाई देती?’ हमने अपनी ओर इशारा करते हुए कहा ।
   ‘अरे हाँ, लगता है कि मैंने आपको पकड़ रखा है ।’ उनके इतना कहते ही शायद मेरी आजादी मेरे पास लौट आई थी । इधर हमने दो-चार लम्बी-लम्बी साँसें खींची, उधर वह आवाज को और ऊँचा करते हुए बोले, ‘इस देश में अन्न-जल तो दुर्लभ हो सकते हैं, पर जो एक चीज इफरात में है, उसे आजादी ही कहते हैं । आजादी यहाँ हमेशा सरप्लस में है ।’
   ‘चलिए, मान लेते हैं आपकी बात ।’ हमने थोड़ा मुँह बिचकाते हुए बोला, ‘पर उसका कोई रूप-स्वरूप तो होगा...वह दिखती किस तरह है?’
   ‘है न । उसके रूपों की क्या कमी है ! उसे देखने के लिए ज्ञान-चक्षु की जरूरत होती है । बंद आँखों से आप दुनिया को नहीं देख सकते ।’
   मेरी आँखें भी तो खुली हैं । फिर बंद आँखों की बात...हमें उनकी बात अच्छी नहीं लगी, पर हमने अपने मुँह पर विराम लगाए रखा । उन्होंने बोलना जारी रखा, ‘प्राण-रक्षा के लिए खाना बहुत जरूरी है और हमारे देश में खाने की आजादी-ही-आजादी है । संतरी से लेकर मंत्री तक, चपरासी से लेकर अधिकारी तक, छोटे बाबू से लेकर बड़े बाबू तक, ठेकेदार से लेकर कोटेदार तक, सेवादार से लेकर मेवादार तक, समाजसेवी से लेकर देशसेवी तक, चोर से लेकर पुलिस तक-सभी खा रहे हैं । चारा से लेकर अलकतरा तक, टूजी से लेकर कोयला तक, हेलीकॉप्टर से लेकर तोप तक, साबुत चीजों से लेकर ताबूत तक- खाने की आजादी के चंद नमूने हैं ।’
   ‘सभी कहाँ खा रहे हैं?...पर सबके लिए आजादी दिख जरूर रही है ।’ मैंने बीच में बोलते हुए कहा, ‘भूखे पेट को भूखा रहने की आजादी है और भरे पेट को खाने की ।’
   ‘खाने के साथ पीना भी मूलभूत आवश्यकता है ।’ हमारी बात ने उनमें और जोश डाल दिया । वह हामी भरते हुए बोले, ‘बिल्कुल ठीक फरमाया आपने । खाना अटक न जाए, इसके लिए कुछ गटकना जरूरी होता है । सादा पानी प्रभाव में नगण्य होता है, इसीलिए रंगीन पानी की हर तरफ आजादी है । निषेध मजबूरी हो सकती है, पर छिपा कर पीने की पूरी आजादी है । सत्तानवीस इज्जत पी गए, नौकरशाह मर्यादा । हर तरफ ‘पानी’ की कमी पीने की आजादी का साक्षात प्रतिफल है ।’
   ‘ठीक कहा आपने । सादा पानी भले नसीब न हो, पर कोका-कोला गटकने की जबर्दस्त आजादी है ।’ हमने एक बार फिर अपनी बात को टैग करते हुए कहा ।
   ‘खाने-पीने के बाद जो ऊर्जा उत्पन्न होती है, उसके सुरक्षित निर्मुक्ति के लिए बोलने की आजादी एक निरापद युक्ति है । बोलने की आजादी के लिए सर्वश्रेष्ठ पवित्र स्थान संसद है । वहाँ जितने हंगामें होते हैं, बोलने की आजादी उतनी ही मजबूत होती है । गाली-गलौज, असहिष्णुता-असहिष्णुता, गाय-गाय, दलित-दलित-बोलने की आजादी के नवीनतम उदाहरण हैं । भारत तेरे टुकड़े होंगे...इंशाअल्लाह-इंशाअल्लाह-बोलने की आजादी का नायाब नमूना है ।’ वह तनिक रुककर फिर बोले, ‘इतनी आजादियाँ हैं, फिर भी आपको आजादी दिखाई नहीं देती ।’
   ‘वह तो ठीक है, पर आजादी...’
   ‘आजादी इतने पर ही आकर नहीं रुक जाती । मनुष्य को रहने के लिए मकान चाहिए और मकान के लिए जमीन । प्राण-रक्षा की आजादी का तभी कोई मतलब है, जब मकान और जमीन पर कब्जे की आजादी हो । आज हर तरफ कब्जा हो रहा है । आदर्श सोसायटी, बुलंदशहर ही नहीं, असंख्य इलाके इसी आजादी से सराबोर हैं । इस आजादी की कीमत नेता तो नेता, टुटपूँजिए कार्यकर्त्ता तक समझ गए लगते हैं । आजादी के इतने सालों में उन्होंने बहुत कुछ के साथ यह भी सीख लिया है ।’
   ‘कोई और आजादी, जो आप...’
   ‘आजादी-ही-आजादी है ।’ वह बीच में ही टपकते हुए बोले, ‘खाने-पीने-बोलने-सोने की आजादी क्या कम आजादी है, जो आप कोई और...’
   ‘पर हमें क्यों लगता है कि आजादी की कुछ कमी है । आप ‘संचित’ की बात कर रहे हैं, पर ‘वंचित’ तो आजादी तलाश रहा है । यहाँ जीने की आजादी पर सैकड़ों रोक-टोक हैं, पर मरने की पूरी आजादी है ।’

   इतना सुनते ही वह रुके, एक पल को सोचा । अगले ही पल वह हमें छोड़कर अपने घर की ओर बढ़ रहे थे ।

शनिवार, 13 अगस्त 2016

जो डराए, वह आजादी तो नहीं

              
   यकीन नहीं था कि गली के नुक्कड़ पर पहुँचते ही मुझे नुक्कड़-नाटक के दर्शन साक्षात होने लगेंगे । सौभाग्य इतना होगा कि मुझे भी उस नुक्कड़-नाटक में शामिल कर लिया जाएगा । हुआ यह कि नुक्कड़ पर पहुँचते ही मेरी साइकिल को किसी ने ठोंक दिया । ठुँकना अच्छा नहीं लगता, पर वहाँ यह देखकर अच्छा लगा कि चलो, साइकिल या रिक्शा से तो नहीं ठुँके । वो क्या है कि हीनता महसूस होती है । ठुँके भी, तो साइकिल से...रिक्शा से । सामने एक ही बाइक पर चार नौजवान सवार थे । शायद यह कहना अब सही नहीं था, क्योंकि बाइक तो मुँह के बल गिरी जमीन सूँघ रही थी । चारों नौजवान चारों खाने चित्त पड़े हुए थे । मैं उन पर हँसने की स्थिति में नहीं था । जो गति तोरी, सो गति मोरी । पर एक बात जरूर था । मैं धूल झाड़कर उनसे पहले उठ खड़ा हुआ था । मेरा जीवन-अनुभव उस वक्त मेरे काम आया था । ऐसे मौकों पर बिजली की गति से उठ जाना ही फायदेमन्द होता है, वरना आपके ऊपर हँसी के पटाखे फूटते देर नहीं लगती ।
   जिस नुक्कड़-नाटक की भूमिका बँध गई थी, उसका आनन्द लेने के लिए बीसियों लोग इकट्ठा हो गए थे । गम कम, हँसी के ज्यादा छींटे पड़ते ही नौजवान अपने आपे से बाहर हो गए । पर तुरंत ही उन्हें अपनी गलती का अहसास-जैसा हुआ । इस मौके का फायदा उठाते हुए मैंने उन पर हमला बोल दिया । ‘देख कर नहीं चल सकते क्या.. मेरी टांग टूट जाती तो?’
   ‘ओए अंकल, ज्यादा नहीं टर्राने का । अपनी टांग खुद बचाने का । हमें अपने फ्रीडम से समझौता नहीं करने का । समझ गए या समझाने का?’
   मुझे समझते देर नहीं लगी कि उनकी भी आजादी है । मैं अपनी साइकिल को समेटने लगा । अब वह मुझे नहीं, बल्कि मैं उसे खींच रहा था । घर पर आकर अभी घुटनों पर हल्दी-चूने का लेप लगा ही रहा था कि बाहर दरवाजे पर दस्तक होने लगी । बिना लेप के लगाए जाना मुझे अच्छा नहीं लगा । वैसे भी वह दस्तक मेरी आजादी पर सवाल बनकर उत्पन्न हुआ था । मैं अपनी आजादी के गुमान में लेप लगाता रहा । उधर आगन्तुक को भी अपनी आजादी का मुझसे अधिक गुमान था । वह तबले की थाप-सा दस्तक देता रहा । आजादी के बीच कर्त्तव्य का भान मुझे तब हुआ, जब लगा कि अब दरवाजा नहीं बचने वाला । मैंने लपकते हुए दरवाजा खोल दिय़ा । सामने पड़ोसी खड़ा था । उसने मुझे हिंसक निगाहों से घूरा । गोया पूछ रहा हो कि किस कब्र में दफन पड़े थे अब तक । फिर प्रकटतः पूछा, ‘आजादी का जश्न मनाना है शर्मा जी, बोलिए कितना दे रहे हैं?’ मेरे बोलने से पहले ही वह फिर बोला, ‘नहीं-नहीं, चिरकुटई नहीं चलेगी इस बार । पूरे दो हजार ढीले करने होंगे ।’
   मैं दो सौ तक अपनी मर्जी से देने वाला था, किन्तु आजादी के नाम पर नाक-कटाई का दबाव बनाकर दो हजार हड़प ले गया । वह हँसते हुए निकल गया और मैं मन ममोस कर हल्दी-चूने के लेप को खा जाने वाली निगाह से घूरने लगा ।
   अभी आजादी के उधेड़-बुन से ठीक से बाहर भी नहीं निकला था कि पड़ोस में हंगामा मच गया । घर से बाहर आते ही रोंगटे खड़े हो गए । पड़ोसन अपनी आजादी का खुल्लम-खुल्ला प्रदर्शन कर रही थी । वह दौड़ा-दौड़ाकर अपने पति की ठुकाई कर रही थी । पति ने अपनी आजादी के बेजा इस्तेमाल की चेष्टा की थी । वह इस वक्त दौड़-दौड़कर अपनी प्राण-रक्षा के कर्त्तव्य-निर्वहन में संलग्न था । ठीक इसी समय मुझे उन लोगों की याद आई, जो स्त्री की आजादी के लिए अक्सर विलाप करते रहते हैं । यह दृश्य उन्हें निश्चय ही राहत प्रदान करेगा । आजादी अब बहुत दूर की बात नहीं रही ।
   वापस घर में घुसते ही एक और कोहराम का सामना हुआ । कहना गलत न होगा कि एक बार फिर आजादी से मुठभेड़ हुई । दृश्य कुछ यूँ था-पत्नी रोए जा रही थी । पुत्रवधु भुनभुना रही थी और पुत्र मौन की मूर्ति बन खड़ा था । पत्नी आजादी का पूर्ण उपभोग करना चाहती थी । यह तभी सम्भव था, जब पुत्रवधु इसी घर में रहकर चौका-चूल्हा करे । पुत्रवधु आजादी की नई हवा में साँस लेना चाहती थी, जो उसके अनुसार अलग घर में रहकर ही सम्भव था । उधर पुत्र का मौन इन आजादियों से निपटने का रास्ता तलाश रहा था ।

   बिना कुछ बोले मैं अपने कमरे में चला आया । मैं आजादी के साथ विचार करना चाहता था हर उस आजादी पर, जिसका सामना हमें सुबह से लेकर रात तक करना पड़ता है । क्या आजादी के पीछे आतंक की ही अभिव्यक्ति होती है? जब आजादी किसी गली के नुक्कड़ पर खड़ी होकर अट्टहास करने लगे, तो क्या उसे आजादी ही कहेंगे?
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