जीवन व समाज की विद्रुपताओं, विडंबनाओं और विरोधाभासों पर तीखी नजर । यही तीखी नजर हास्य-व्यंग्य रचनाओं के रूप में परिणत हो जाती है । यथा नाम तथा काम की कोशिश की गई है । ये रचनाएं गुदगुदाएंगी भी और मर्म पर चोट कर बहुत कुछ सोचने के लिए विवश भी करेंगी ।
रविवार, 30 मई 2021
सोमवार, 17 मई 2021
शहर का उनपर ध्यान नहीं है
लाखों ऐसे लोग यहाँ पर, जिनका कहीं मकान नहीं है
कब कोई कारों के नीचे, शहर का उनपर ध्यान नहीं है ।
इस धरा पर मिलता सबको, कष्टों का अंबार यहाँ पर
जहाँ केवल खुशियाँ ही मिलती ऐसी कोई दुकान नहीं है ।
आदमी ही आदमी का दुश्मन, हजारों फंदे-जाल बिछाए
फिर भी अच्छे इंसानों से धरती अभी वीरान नहीं है ।
हर घर में खुशियों का मेला, ना किसी आँख में पानी हो
ख्वाबों की तस्वीर यही है, सच में कोई जहान नहीं है ।
रब है अब मुट्ठी में, कुछ लोग यही तो कहते हैं
रब से बढ़कर रब है केवल, मानव कभी महान नहीं है ।
क्या हक है इनको कुछ भी कहने की, जब हो मर्जी उनकी
सच को सच कहती हो ऐसी ज्यादा अभी जुबान नहीं है ।
शुद्ध मिट्टी, पानी स्वच्छ और खुली हवा में साँसें होंगी
जीना होगा आसान यहाँ पर, सरकारी यह बयान नहीं है ।
एक-एक साँसों को लड़ते जब से देखा उस रईस को
अपने होने का सच में यारों कोई अब गुमान नहीं है ।
कैसा भी कठिन काल है, इसको भी जाना है इक दिन
हम डर जाएं जिसके डर से, ऐसा उठा तूफान नहीं है ।
उधर गाँव की रौनक गायब, इधर थम गया भले शहर हो
कोई रो ना, यूँ ही रह जाए हरदम, ऐसा कोई इमकान नहीं है ।
मंगलवार, 19 मई 2020
आप आए, बहार आई
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| Courtesy - www.shutterstock.com |
मंगलवार, 21 अप्रैल 2020
संकट काल परमार्थ का
दुकान पर अफरा-तफरी है । लोगों का हुजूम है । लंबा रेला है यहां से वहां तक । मगर यह सब दिखाई नहीं देता नंगी आंखों से । जैसे किसी जादूगर ने अपने जादू से गायब कर रखा हो पूरी भीड़ को, जबकि समूची भीड़ वास्तव में वहीं मौजूद है । पूरी भीड़ फोन में छिपकर दुकान पर दबाव बनाए हुए है । जितना अधिक दबाव होता है अंदर, ज्वालामुखी का विस्फोट भी होता है उतना भयंकर । इधर जितना दबाव बढ़ता है, उधर उतना ही मूल्य का लावा तेजी से धधकते हुए बाहर निकलता है और लोगों की ठंडी पड़ती जा रही कमाई पर जा गिरता है ।
सेठ इस वक्त अपनी दुकान में बैठे हुए हैं और मैं उनके सामने माइक लेकर मौजूद हूँ । माइक उनके मुंह के पास करते हुए, 'संकट की इस घड़ी में आप कैसा महसूस कर रहे हैं ?' पूछता हूँ ।
'बहुत ही अच्छा ।' वह जवाब देते हैं और चेहरे पर एक गंभीर मुस्कान उभर जाती है । थोड़ी देर रुककर, 'संकट भी एक अवसर है...एकता बनाने के लिए, नई चीजों को खोजने के लिए, और त्याग करने के लिए ।'
'त्याग का समय है, तो रोटी की कीमत क्यों बढ़ गई है ? यह तो दो तरफा मार है जनता पर । एक तरफ वायरस की मार, दूसरी तरफ रोटी की मार ।'
'एक अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता । पूरी जनता को मिलकर त्याग करना होगा । संकट सामूहिक त्याग की मांग करता है ।'
'मतलब की जनता पैसे का त्याग करे ।' मैं पूछता हूँ, 'पर आप का त्याग किधर है ?'
'समूची जनता घरों में दुबकी हुई है वायरस के डर से और हम अपनी जान को दांव पर लगाकर परमार्थ के लिए डटे हुए हैं । आपको हमारा त्याग क्यों नहीं दिखता ?'
सेठ ने बड़ी चतुराई से परमार्थ की दीवार खड़ी कर दी थी । उसे भेदने का अभिलाषी नहीं था मैं, अत: वहां से रुखसत होकर उन तक आ पहुंचता हूँ, जिन पर व्यवस्था को अमल में लाने की जिम्मेदारी है । सेठ की शिकायत उनके सामने प्रस्तुत करता हूं ।
शिकायत सुनकर वह खुश नहीं होते । 'क्या कहते हैं आप ?' वह चौंकते हुए पूछते हैं, 'सेठ जी तो बड़े धर्मात्मा व्यक्ति हैं । वह तो सब का कल्याण करते हैं ।'
'आपका भी ?' इस प्रतिप्रश्न से वह अचानक ही सतर्क हो उठते हैं और प्रशासन का संकट मोचक वाक्य प्रस्तुत करते हैं आवेश के साथ, 'किसी को मनमानी करने की छूट नहीं दी जाएगी, चाहे वह कोई भी हो ।'
मैं इस जवाब का आकांक्षी नहीं था, अत: उन तक जा पहुंचता हूँ, जिनके कंधों पर व्यवस्था को बनाने की जिम्मेदारी है । वह जागरूक हैं, इसलिए सतर्क भी । वह हमारे चैनल के माध्यम से अपील जारी करते हैं आम जनता के कल्याणार्थ । 'संकट का यह समय शिकायत करने का समय नहीं है । सभी एक दूसरे का ख्याल रखें । सभी के अधिकारों की रक्षा हो ।'
फिर वह मुझसे कहते हैं, 'चिंता की कोई बात नहीं है । सेठ हमारे आपदा कोषों में दान भी तो करते हैं । दो-चार पैसों का शोर मचाकर परमार्थ को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता ।'
मैं पुन: सेठ की दुकान पर हूँ । मालवाले की हंसी पर एक फर्क अवश्य पड़ता है कि वह बढ़ जाती है । यह उनका तरीका है संकट का मुकाबला करने का । आपको भी करना है । अत: यह फैसला आपके ऊपर है कि रोटी के नाम पर आप स्वार्थ को तरजीह देते हैं या फिर सेठ के परमार्थ को ।
शुक्रवार, 13 मार्च 2020
अंग्रेजी बोलने वाली बहू
शनिवार, 1 जुलाई 2017
उसको टॉपर ही बनना है
![]() |
| साभार-hazrat-ji-md-shakeel-bin-hanif |
एक गधा जिद कर बैठा
जीवन
में कुछ करना है,
जो
भी हो,
उपाय
करो
उसको
टॉपर ही बनना है ।
मैंने उसको लाख मनाया
बाप बन उसको समझाया,
वह कानों पर हाथ रख बोला
उसको टॉपर ही बनना है ।
![]() |
| साभार-indiatimes.com |
बेटा देख कठिन डगर है
लाखों
इसमें अगर-मगर
है,
अगर
है ऐसा,
तो
फिर पक्का
उसको
टॉपर ही बनना है ।
पुस्तक का तो बड़ा महत्व है
इंटरनेट भी नया तत्व है,
हाथों में मोबाइल लेकर
उसको टॉपर ही बनना है ।
![]() |
| साभार-indiatimes.com |
दिन भर मेहनत का अफसाना
रातों
को भी चैन न पाना,
भले
आँख में रात कटे
उसको
टॉपर ही बनना है ।
नहीं गधों का पढ़ना काम
समझो
फिर शिक्षा तमाम,
शिक्षा से क्या लेना-देना
उसको
टॉपर ही बनना है ।
![]() |
| साभार-bhootworld.com |
मैंने पूछा-टॉपर देखा है
झट
वह बोला-पूरा
लेखा है,
नहीं
कभी वे फेल हुए
उसको
टॉपर ही बनना है ।
तू नहीं समझता तिकड़म सारी
गधों को मिलती अक्सर गारी,
यही
नियति है,
हरदम
देखा
उसको
टॉपर ही बनना है ।
मैंने कहा-तू जेल जाएगा
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| साभार-amarujala.com |
वापस कभी न घर आएगा,
ऐसे
जेलों की ढेंचू-ढेंचू
उसको
टॉपर ही बनना है ।
तब गधे को गुस्सा आया
रौद्र
अपना वह रूप दिखाया,
जल
मरें चाहे जलने वाले
उसको
टॉपर ही बनना है ।
सोमवार, 19 जून 2017
चोरलैंड का महा-प्रस्ताव
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| साभार-hindustantimes |
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| साभार-TeluguOne.com |
![]() |
| साभार-india today |
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साभार- hazrat-ji-md-shakeel-bin-hanif एक गधा जिद कर बैठा जीवन में कुछ करना है , जो भी हो , उपाय करो उसको टॉपर ही बनना है । ...










