जीवन व समाज की विद्रुपताओं, विडंबनाओं और विरोधाभासों पर तीखी नजर । यही तीखी नजर हास्य-व्यंग्य रचनाओं के रूप में परिणत हो जाती है । यथा नाम तथा काम की कोशिश की गई है । ये रचनाएं गुदगुदाएंगी भी और मर्म पर चोट कर बहुत कुछ सोचने के लिए विवश भी करेंगी ।

मंगलवार, 21 मार्च 2017

सूरज का एक और उजाला

                   
                
   ट्रेन स्टेशन पर आ लगी थी । उन्होंने खिड़की से बाहर झांका । अगवानी के लिए कोई उपस्थित नहीं था । यात्रियों की भीड़ छँटने के बाद अपना सामान समेटा और दरवाजे तक आ गये । उन्हें लगा कि उनके आने से पहले ही उनकी छवि पहुँच गई है । एक ईमानदार अधिकारी आ रहा है, यह सोचकर ही सबके जोश की हवा निकल गई होगी । एक्जिट से बाहर निकलते ही कोई दौड़कर आता दिखाई दिया । उसने उनके नाम की तख्ती अपने हाथ में ले रखी थी ।
   ‘कौन हो भाई तुम ?’ उनके ऐसा पूछते ही सामने वाले को समझते देर न लगी । वह हाँफते हुए बोला-‘आप ही को लेने आया हूँ साब, मैं आपका स्टेनो अखिलेश...’
   और वह सामान उठाने लगा था । पन्द्रह मिनट बाद वे अपने सरकारी आवास में पहुँच गए । तीन कमरों का फ्लैट...दरवाजों में दीमक लगे हुए । एकाध खिड़कियाँ टूटी हुईं...कहीं-कहीं फर्श उखड़े हुए । तसल्ली हुई कि उन्हें असली सरकारी आवास ही मिला है । अंदर से हँसी बाहर निकलने को हुई, पर स्टेनो की उपस्थिति ने उसे अंदर ही रोक दिया । रात का खाना लाने की बात कहकर वह चला गया और वे रास्ते की थकान मिटाने के लिए स्नानघर की ओर बढ़ गए ।
  नहाने के बाद ताजगी महसूस होने लगी थी । हल्की-हल्की भूख भी लग आई थी । बैग में से घर का बना शक्करपारा निकालकर कुतरने लगे थे । चलते वक्त माँ ने खास हिदायत के साथ उन शक्करपारों को बैग में रखा था । जब तक खाने की समुचित व्यवस्था नहीं हो जाती, वे शक्करपारे ही उनके पेट के अग्निकुंड में होम होने वाले थे । कितनी खुश थी माँ और अन्य लोग । जिले का सबसे बड़ा शिक्षा अधिकारी बनकर जा रहा है वह । हाय, कितना बड़ा रुतबा होगा । उन्होंने भी शिक्षा के लिए बहुत कुछ करने के सपने सँजो लिए थे ।
   अगले रोज कार्यालय में बैठकर कामकाज निपटा रहे थे कि तभी स्टेनो अंदर आया था । वह कुछ कहना चाहता था, किन्तु हिचक रहा था । उसके मन की स्थिति को भाँपते ही उन्होंने उत्साह बढ़ाया-‘हाँ..हाँ कहो, यूँ हिचकने या छिपने-छिपाने की जरूरत नहीं है ।’
   ‘साब, कल गंगोत्री के दर्शन कर आते । सौभाग्य से वे इस वक्त जिले में ही मौजूद हैं ।’ इतना कहते ही उसकी नजर उनके चेहरे पर जा जमी थी, क्योंकि वहाँ पर आश्चर्य के घनघोर बादल अचानक उमड़ आए थे । उनके मुख से बस इतना ही निकला-गंगोत्री...!’
   ‘गंगोत्री...शिक्षा की गंगोत्री...माने शिक्षा मंत्री । पुराने साब कहा करते थे कि शिक्षा की नदी वहीं से निकलती है । वे नियमित दर्शन-पूजन किया करते थे ।’
   वे तनिक हँसे, फिर कुछ रुककर बोले-‘चलो, तुम कहते हो तो कर ही लेते हैं । वहाँ से कमंडल-भर जल भी साथ लाएंगे । और वे ठठाकर हँसने लगे ।’
   उधर उन्होंने ठहाका लगाया, इधर स्टेनो की मुख-मुद्रा गंभीर हो गई । बोला-‘साब, आप सतयुग की बात करते हैं, पर हम कलियुग में खड़े हैं । हर दर्शन के समय कमंडल भरकर जल गंगोत्री में डालना पड़ता है ।’
   उसकी अंगुष्ठा और तर्जनी की निरन्तर घर्षण मुद्रा ने बात को एकदम स्पष्ट कर दिया, फिर भी उन्हें लगा कि स्टेनो शायद उपहार की बात कर रहा है । मंत्री हैं, मिलते समय कुछ उपहार तो चाहिए ही ।
   अगले ही दिन वे मंत्री के निवास पर पहुँच गए । एक घंटा इंतजार के बाद उन्हें अंदर बुलाया गया । सामने सोफे पर बैठे शिक्षा मंत्री खैनी मल रहे थे । उन्हें बैठने का इशारा करते हुए बोले-‘उ का है कि मलने से बहुते फड़कदार बनती है खैनी...एकदम्मे ससुरी शिक्षा की माफिक । मलते रहा जाए, तो शिक्षा को कउनो चकाचक होने से नहीं रोक सकता ।’
   ‘आपके लिए एक छोटी सी भेंट है’-कहते हुए हाथ में लिया लिफाफा सोफे पर रख दिया था । मंत्री ने उस पर एक्सरे निगाह डाली थी । ‘बहुते छोटा कमंडल है आपका । इतने छोटे कमंडल से शिक्षा की धारा केतना दूर ले जा पाएंगे । देखने में आप बुड़बक तो नहीं लगते । पिछला अधिकारी बहुते चालाक था । खूब भर-भरके कमंडल लाया और निधड़क होकर जिला में राज किया । खैर, अभी आप नए-नए हैं...समझ जाएंगे ।
   उनका मन खिन्न था अभी तक । मंत्री से मिलकर आए हुए चार घंटे गुजर चुके थे । शाम हो चुकी थी । सेवक चाय बनाकर रख गया था, पर उन्होंने उसे हाथ तक नहीं लगाया था । चाय में मक्खी न जाने कब आ पड़ी थी । कहीं वे भी इस मक्खी की तरह यहाँ तो नहीं आ गिरे हैं । उन्हें दया आई थी, मक्खी पर भी...शायद खुद पर भी ।
   अभी एक महीना भी नहीं बीता था कि मंत्री जी का दूत नमूदार हुआ था । आते ही बोला-‘मालिक ने कहलवाया है कि शिक्षा को सजाने की तुरंत व्यवस्था कीजिए । सज-धज कर ही शिक्षा सुंदर लगती है ।’
   तभी स्टेनो आ गया था अंदर । समझाते हुए बोला-‘पुराने साब ने तीस लाख का ज्वेलरी सेट दिया था मंत्री जी की पत्नी को । शायद वैसा ही कुछ...’
   हद हो गई...क्या मैं यहाँ डाके डाल रहा हूँ ? अंदर कोई ज्वालामुखी सक्रिय हो उठा था । बाहर से शांत बने रहे । वहाँ चिल्लाने से भी कौन सी समस्या हल हुई जाती थी ।
   एक और महीना बीतते-बीतते बीत गया । न चाहते हुए भी इस वक्त वे मंत्री जी के सामने बैठे हुए थे । उनके बगल में रखे पीकदान में फिच्च करते हुए मंत्री जी ने माहौल में व्याप्त टेंशन को तोड़ा । नजर को हवा में टाँगकर बोले-‘उ का है कि शिक्षा के लिए आप कउनो कोशिश नहीं कर रहे हैं । पिछला अधिकारी हमरे घर का आदमी जइसा हो गया था । भतीजी की शादी में अतिथियों को खूब मिठाई-पानी पिलाया । हमको तो कुछ करने ही नहीं दिया । खैर, आपसे उ सब का कहना । आप आदमी भी तो दूसरा हैं ।’
   चाय की दो घूँट सुड़कने के बाद फिर बोले-उ का है कि गोवा में एक ठो बड़ा-सा होटल बनवा रहा हूँ । अब अइसे वक्त में शिक्षा के विकास की जिम्मेदारी आपही के कंधे पर है । कउनो ना-नुकुर नहीं चलेगा । एकदम ईमानदारी से काम पे लग जाइए ।’
   अंदर का ज्वालामुखी यह सुनते ही धधक उठा था । लावा मंत्री को बहा ले जाने को बेताब था, पर उन्हें लगा कि अपने जीवन के इस क्षण को किसी ज्वालामुखी के हवाले नहीं किया जा सकता । वे चुपचाप लौट गए थे ।
   उस रात पूरी दुनिया नींद के आगोश में थी, पर उनकी नींद उनसे कोसों दूर थी । नौकरी करें या घर लौट जाएं-इसी उधेड़बुन में पूरी रात बीत गई । अगली सुबह सूरज के उजाले ने एक और व्यक्ति को घर के लिए निकलते देखा । वे स्टेशन पर ट्रेन की प्रतीक्षा में खड़े थे ।  

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