जीवन व समाज की विद्रुपताओं, विडंबनाओं और विरोधाभासों पर तीखी नजर । यही तीखी नजर हास्य-व्यंग्य रचनाओं के रूप में परिणत हो जाती है । यथा नाम तथा काम की कोशिश की गई है । ये रचनाएं गुदगुदाएंगी भी और मर्म पर चोट कर बहुत कुछ सोचने के लिए विवश भी करेंगी ।

रविवार, 31 जनवरी 2016

खबरी खरगोश हाजिर है...

 
        
          लेकर खबरों की खबर !

बुंदेलखंड पर भी दो बूँद आँसू बहा दीजिए मोदी जी—राहुल गाँधी की अपील ।

राहुल बाबा, आप नहीं जानते...आपने क्या कह दिया है । प्लीज, यह अपील सभी नेताओं से कीजिए । सभी एकसाथ आँसू बहाएंगे, तो बुंदेलखंड का सूखा खत्म होने में कितनी देर लगेगी ।
अब मजदूरों को भी मिड-डे-मील प्रदान करेगी उत्तम प्रदेश की सरकार ।
यह खबर सुनकर कीड़े-मकोड़े, छिपकलियां और तिलचट्टे खुशी से झूम उठे हैं । मिड-डे-मील के लिए एक ही जगह यानी स्कूल जाते-जाते ये ऊब गए थे । अब कहीं और सैर-सपाटे का आनंद प्राप्त होगा ।
अब शिकायतें दौड़ेंगी, शिकायतकर्ता को नहीं दौड़ना होगा-एक सरकार की कोशिश ।
शिकायतकर्ताओं के दिन अब सचमुच लौटने वाले हैं । उन्हें मेहनत के नाम पर सिर्फ अपने तलवे में तेल लगाकर बैठना है । इलाके में बारिश नहीं हो रही है, इसकी शिकायत ऑनलाइन करनी है और टकटकी लगाए कम्प्यूटर को देखना है । आप की शिकायत का स्टेटस आपको पता चलता रहेगा । अंत में कम्प्यूटर-स्क्रीन पर संदेश कुछ इस तरह होगा-आप की शिकायत फाइनली बादलों तक पहुँचा दी गई है । बादल हमारे डिपार्टमेन्ट के अन्तर्गत नहीं आते, अत: हम असमर्थ हैं । शिकायत करने के लिए धन्यवाद !
एक राज्य की सरकार का दावा है कि गत वर्ष मरने वाले किसानों की संख्या बहुत कम यानि एक हजार के लगभग रही है ।
विपक्ष का आरोप है कि सरकार झूठ बोल रही है । इतनी व्यवस्था के बाद इतने कम किसान ही कैसे मर सकते हैं ! पर विपक्ष भी तो झूठ बोल रहा है । उसे क्या नहीं पता कि किसान दो किस्म के होते हैं । एक, हाड़-माँस वाले ; दूसरे, सरकारी दस्तावेज वाले । सरकार है, तो सरकारी दस्तावेज से ही काम चलाएगी ना !
पिछले चुनाव में जनता ने वोट मेरे नाम पर दिया था-नेताजी का बयान ।
पर नेताजी आप यह बताना क्यों भूल गए कि अगले चुनाव में जनता किसके नाम पर वोट देगी । सरकार ने तो इतना काम किया है कि अखबारों के पन्ने कम पड़ जा रहे हैं । विकास-ही-विकास है चारों तरफ । राजनीति में भी राजनीति, जाति की राजनीति...आप सेक्यूलरवाद के तो इतने बड़े झंडाबरदार हैं कि इस धर्म को लतियाते रहे और उस धर्म से बतियाते रहे । आप ही बता दें वोट कैसे...
एक नेता ने अपना कुर्ता फाड़कर अपने नेताजी की तस्वीर दिखाई ( अंदर टी-शर्ट पर नेताजी की तस्वीर बनी थी । )
श्री हनुमान ने कभी छाती फाड़कर अपने आराध्य की तस्वीर दिखाई होगी, पर कुर्ता फाड़कर अपने नेता की तस्वीर दिखाना आज का स्टाइल है । उस वक्त भक्तिभाव मन में धारण करना होता था, अब बस टी-शर्ट शरीर पर धारण करना होता है । छाती फाड़ने का इनाम श्री हनुमान को पता नहीं मिला कि नहीं, पर इस भक्त को तत्काल मिल जाएगा । आज का आराध्य ऐसे ही भक्तों को खोजता है ।
दुनिया के पचास दौलतमंदों की सूची में तीन भारतीयों ने जगह बनाई ।


भारतीयों के लिए यह जश्न की घड़ी है । इतनी विशाल गरीबी की प्रशांतमहासागरीय जलराशि के बीच ये एकाध अमीरी के टापू...फख्र करना तो बनता है । तभी तो सारी मीडिया इस खबर को उछाल-उछालकर उछल रही है । 

शुक्रवार, 29 जनवरी 2016

धुँआ छोड़ने वाली किस्म

                                                                                                                                                                     
   पड़ोसी ने आते ही मुझे कुरेदा, जैसे ऊपर से ठंडी पड़ चुकी राख को कुरेद रहा हो । वैसे भी यह पड़ोसी का धर्म होता है कि वह इधर-उधर सतत चिंगारी की तलाश में मशगूल रहे । मुँह मेरे कान के पास लाकर फुसफुसाया-अमां यार, जीवन में मर्दों वाली कुछ बात भी रही या फिर यूँ ही जिन्दगी तमाम होती रही ? मैंने भी उसे निराश नहीं किया । तपाक से बोला-शादी कर चुका हूँ और अभी तक उसी से निभा रहा हूँ । यह क्या मर्दों वाली बात नहीं है ?
   शादी करके गधा बन जाना भी कोई मर्दों वाली बात है ! मेरा मतलब था...कभी किसी साँड से सींगजोरी किया है  ? घोड़े की दुलत्ती खाकर भी कभी ठहाका लगाया है या फिर किसी को छेड़ा हो और पिटते-पिटते रह गए हो ?
   मैंने ऐसा कुछ नहीं किया-मेरे मुँह से यह बात निकलने की देर थी कि वह झपट पड़ा । जोश में आते हुए बोला-तो फिर किया क्या ? मर्द होकर भी जीवन की दीवार को सादा पन्ना बना दिया । कोई इबारत तो लिखते उसपर ।
   मैं कुछ समझा नहीं-कहने की कोशिश करनी चाही मैंने, किन्तु वह पहले ही बोल पड़ा-पर मैं समझ गया । तुम जैसे लोगों से प्रेरणा लेकर ही हमने वह कर दिया, जो कोई नहीं कर सका आजतक । एकदम मौलिक शोध...मर्द के किस्म पर अनुसंधान !
   चार किस्म के मर्द होते हैं आजकल । पहले किस्म के मर्द में नारी-ही-नारी होती है । उसे अपना अस्तित्व माँ का वरदान प्रतीत होता है । वह किसी को छेड़कर इस वरदान का अपमान नहीं कर सकता, क्योंकि...उठी थी नजर उसकी जानिब मगर, अपनी बेटी की याद आ गई
   दूसरे किस्म के मर्द में नारी का अंश अति सीमित होता है । वीर-भोग्या-वसुंधरा उसका आदर्श-सूत्र होता है । वह नारी सहित हर चीज को इसी नजरिए से देखता है ।
   तो क्या उसका वीरत्व-बोध उसे गुंडत्व-प्रदर्शन के लिए ललकारता है ? मैंने उसे रोकने की कोशिश की । वीरत्व-बोध में ऐसे प्रदर्शन स्वत: हो जाते हैं, ऐसा कहते हुए उसने बात आगे बढ़ाई-तीसरे किस्म के मर्द में नारी का अंश सीमित होता है । वैसे तो ये सामान्य होते हैं, किन्तु मौका मिलते ही असामान्य हो उठते हैं । वीरत्व पर पड़ी राख हट जाती है और नंगत्व मैदान में आ जाता है ।
   चौथे किस्म के लोग खतरनाक तो नहीं होते, किन्तु जबर्दस्त प्रदूषणकारक होते हैं । मर्द होकर भी इन्हें अपने मर्द होने पर शक रहता है । ये बरसाती कंडे की तरह सदैव धुंआ फेकते रहते हैं । पराई नारी के गुडबुक में बने रहने की लालसा इनमें प्रबल होती है ।

   मर्द तो वही होता है, जो खुद पर वीरत्व का प्रदर्शन करता है-ऐसा मैंने कहना चाहा, पर पड़ोसी जा चुका था ।

मंगलवार, 26 जनवरी 2016

उनके अपने-अपने असमंजस

                  
   असमंजस की बवाली बेला है, मगर यहाँ पंछी अकेला नहीं है । यहाँ तो शत्रु भी है और शत्रु की पार्टी भी । दोनों एक तरफ भी हैं । दोनों आमने-सामने भी हैं । शत्रु को लगता है कि पार्टी तो उसकी अपनी ही है । अगले ही क्षण यह भाव-बोध भी होता है कि पार्टी तो कब से बेगानी है । वे तो पार्टी के मामले में इधर बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना...बने बैठे हैं । उधर पार्टी का हाल भी बेहाल है । रिंग के बाहर जमे विपक्षी खुशहाल हैं । पार्टी को मलाल है कि शत्रु अपना होकर भी शत्रु बना हुआ है । उसके सामने यह सवाल भी है कि मित्र को शत्रु मान बैठने पर कहीं स्थाई चूक न हो जाए । दोनों के लिए कष्ट और कठिनाई का दौर है । यह निर्णय नहीं हो पा रहा है कि शत्रु में मित्र है या मित्र में शत्रु ।
   वैसे शत्रु का मानना है कि वह अकेला ही काफी है । पार्टीरहित होकर भी यदि वह मैदान में डट जाए, तो किसी को भी परास्त कर सकता है । मैदान में विपक्ष के रूप में मित्र खड़ा हो या शत्रु-हारना दोनों का नसीब होगा । तुरही तोड़कर मैदान में उतरना और डटे रहना वीरता का सबूत है । हो सकता है कि उसके द्वारा छोड़े गए शब्द-बाण के मुखाग्र पर सत्य का तेज अवलेपित हो । सत्य में ही दृढ़ता के साथ खड़े होने की ताकत होती है । यह सत्य मानने की इच्छा तो होती है, किन्तु असत्य की वास्तविकता सामने आ खड़ी होती है । नेता तो नेता, तथाकथित बुद्धिजीवियों की एक बड़ी जमात असत्य की उद्घोषक है । असत्य तेजी से नैतिक होता जा रहा है ।
   शत्रु का यह भी दावा है कि हर तरफ उसके लिए निमंत्रण पत्र छपवाए जा रहे हैं । साधो, ऐसा भी क्या भाव ! स्वीकार कर ही लो किसी का निमंत्रण । मगर वह ऐसा नहीं करेगा । ऐसा करके वह अपने पैरों पर कुल्हाड़ी नहीं मार सकता । खुद पार्टी से निकलने पर गद्दार की गद्दी नसीब होगी । पार्टी निकाल दे, तो शहीद का दर्जा ! शहीद होने के अपने ही फायदे हैं । राजनीतिक शहादत में शख्स जीवित भी रहता है और शहीद होने के मजे भी लूटता है ।
   उधर पार्टी शत्रु को नहीं निकालती, तो विपक्ष आरोप लगा सकता है कि जो पार्टी अपने भीतर के शत्रु से नहीं निपट सकती, वह देश-बाहर के शत्रु से क्या खाक निपटेगी । यदि वह निकाल देती है, तो विपक्ष बढ़ती असहिष्णुता का नगाड़ा बजाने लगेगा । आखिर वह करे, तो करे क्या ? असमंजस यही है ।


शुक्रवार, 22 जनवरी 2016

विकास का सरकारी नुस्खा

                           
   पास नामक जंगल के ऊपर बादलों की रेलमपेल मची हुई है । निश्चय ही उनकी वक्र दृष्टि इस जंगल की ओर घूम गई है । उनकी भाव-भंगिमा गर्जन-तर्जन करने की ही अनुभूति नहीं देती, बल्कि ऐसा लगता है मानो बहुत कुछ डुबो देने पर आमादा हो । ये बिना मौसम के बादल नहीं हैं । ये चुनावी मौसम के अग्रदूत हैं । बादलों का रौद्र रूप देख महाराज सियार चिंता के वशीभूत हैं । हालांकि वे सदा सत्ता और सिंहासन के वशीभूत रहे हैं । प्रधान मंत्री लकड़बग्घा भी अपनी कुर्सी पर विराजमान हैं और परेशान हैं ।
   प्रधानमंत्री जी, क्या इन बादलों के लिए भी हमें कोई योजना बनानी पड़ेगी,अचानक बोल फूटने लगते हैं महाराज के मुख-कमल से,आखिर योजनाएं बनानी ही क्यों पड़ती हैं ?’
   क्योंकि योजनाएं बनाना सरकार का धर्म होता है महाराज,प्रधानमंत्री नम्रतापूर्वक जवाब देते हैं,सरकार योजनाएं न बनाए, तो वह काम करती हुई नहीं दिखती और काम करते हुए  दिखना उसके लिए अनिवार्य होता है ।
   अच्छा...मगर यह विकास का क्या लफड़ा है ?’
   कोई नहीं महाराज, योजना ही असली चीज होती है । इसका महत्व इसी से लगाया जा सकता है कि योजना के लिए भी योजना की दरकार होती है ।
   तभी खबरी खरगोश दरबार-ए-खास में प्रवेश करता है । घुटनों तक सिर झुकाते हुए जय बोलता है महाराज की और खामोश खड़ा हो जाता है ।
   महाराज सियार से रहा नहीं जाता । बेचैनी मुँह से फूट पड़ती है,‘खबरी, तुम्हारी चुप्पी अच्छी नहीं लगती हमें । तत्काल राज्य का हाल सुनाओ । क्या बूँदा-बाँदी शुरू हो गई है ?’
   हाँ हुजूर, लगभग पूरे जंगल में ऐसा होने लगा है । जनता विकास की राह तकते-तकते थक गई है । उसे चिंता है कि विकास कहीं इस पानी से भीग न जाए ।
   फिर विकास ?’ महाराज झुँझला उठते हैं । प्रधानमंत्री की ओर मुखातिब होते हुए,‘जल्दी से हमें सारी बात बताइए ।
   ‘आप तो जानते ही हैं कि सारी योजनाएं बैलगाड़ी पर लादकर तत्काल रवाना कर दी गई थीं । विकास भी दूसरी बैलगाड़ी पर था । फिर कुछ सोचते हुए,कहीं विरोधी दलों ने गाड़ी को हाइजैक तो नहीं कर लिया ?’
   खबरी खरगोश बीच में आते हुए कहता है,जान की अमान हो, तो कुछ कहूँ हुजूर ?  विकास को हमने मंत्रियों और नेताओं के घरों की ओर जाते देखा था ।
   महाराज खबरी को झिड़कते हैं,चुप रह । नेता जनता का प्रतिनिधि है । तुझे उसी के विकास पर आपत्ति है ?’ फिर प्रधानमंत्री की ओर मुड़कर,कोई तो रास्ता होगा, जिससे सरकारी योजनाओं को आम जन तक पहुँचा दिया जाए ?’
   है महाराज, अखबारों में सरकारी विज्ञापन पर हमने चार साल तक अथक परिश्रम किया है । वहाँ योजनाएं भी हैं और विकास भी कितना खूबसूरत दिखता है ।

   बहुत खूब ! अब जनता तक विकास पहुँचने से कोई नहीं रोक सकता । महाराज सियार हर आम जन तक एक-एक अखबार पहुँचाने का हुक्म जारी करते हैं ।

मंगलवार, 19 जनवरी 2016

वह हम पर भारी, हम उसके आभारी

             

   साधो, यह हमारे लिए अति सौभाग्य की बात है कि पाकिस्तान जैसा मुल्क हमारा पड़ोसी है । यह किसी के भाग्य पर निर्भर करता है कि उसका पड़ोसी कैसा होगा । पर हमारे इस पड़ोसी को बनाने में हमारे कर्म ही मुख्य रूप से जिम्मेदार हैं । उदारता, आजादी पाने की उत्कंठा, सत्ता-भोग की अदम्य लालसा जैसे तत्वों ने इस पड़ोसी के अस्तित्व को सम्भव बनाया है । हमारे भाग्य प्रबल थे, तभी तो पाक रूप में यह पड़ोसी नसीब हुआ ।
   यह हमारा पड़ोसी ही है, जिसने हमारे लिए क्या नहीं किया । हमें ढेरों अवसर उपलब्ध कराए—सामान्य से लेकर असामान्य तक, अजब से लेकर गजब तक, गर्व से लेकर शर्म तक, आह से लेकर वाह तक । उसी की उदारता है कि हमारे नेताओं को कुछ करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है । पड़ोसी को सबक वाला अध्याय पढ़ाने की जरूरत है । कितने फख्र की बात है कि इसके लिए स्थान का निर्धारण हमारे नेता करेंगे । कब पाठ पढ़ाया जाए...मतलब समय की सेटिंग भी इनके कामों की वेटिंग लिस्ट में है । अब स्थान भी हमारा होगा, वक्त भी हमारा होगा । जरूरत है कि पड़ोसी पाक साजिश करता रहे, निरंतर करता रहे, ताकि हमें उन्हें पाठ पढ़ाने का यूँ ही मौका मिलता रहे ।
   पड़ोसी अपना पाक हमला करता है, तो बहुत से विद्वान मानने लगते हैं कि वह हमारे धैर्य की परीक्षा ले रहा है । मगर ऐसा सोचना भी हमारी क्षुद्रता का परिचायक है । वह तो हमें पुण्य लूटने का सुख देना चाहता है । वह अपने आतंकवादी रुपी असुरों को भेजता है, ताकि उनका वध कर हम सुरों की जमात में शामिल हो सकें । उन आतंकवादियों के हाथों हमारे सैनिक वीर-गति को प्राप्त होते हैं । अगर पड़ोसी अपने आतंकवादियों को नहीं भेजता, तो हमारे सैनिक शहीद कैसे होते ? शहीद होने की हमारी कामना किसी अन्य ना-पाक पड़ोसी के कारण धरी-की-धरी रह जाती ।
   विरोधी दल वाले आरोप लगाते रहे हैं कि अपने देश की विदेश नीति में परिवर्तन हो गया है, जब से कमल वाली पार्टी सत्ता में आई है । मगर देश की जनता जानती है कि ऐसा-वैसा कुछ नहीं हुआ है । पड़ोसी की हरकतों पर पहले वाली सरकारें भी मुँह-तोड़ जवाब देने की मौखिक कसरत किया करती थीं, यह वाली भी ठीक वही करती है ।

   अत: पड़ोसी हम पर कितना भी भारी पड़े, इन अवसरों के लिए हमें उसका आभार मानना चाहिए ।

शुक्रवार, 15 जनवरी 2016

उल्लूगीरी के हवाले भविष्य–निर्माण का सपना



         

    ʻ पास ʼ के जंगल में काफी आपाधापी है । महाराज सियार की सरकार हरकत में है । भविष्य–निर्माण उसके एजेंडे में सबसे ऊपर है । महाराज सियार अपने राजसिंहासन पर यों तो चिपक कर बैठते हैं, किन्तु इस वक्त पता नहीं क्यों, पहलू पे पहलू बदल रहे हैं । शायद उन्हें अपने मनपसंद किसी खबर का इंतजार है । तभी खबरी खरगोश दरबार–ए–खास में प्रवेश करता है । ʻ महाराज की जय हो ʼ, घुटनों तक झुकते हुए महाराज के प्रशस्ति–गान को आगे बढ़ाता है, ʻजो औरों ने नहीं किया, वह महाराज ने कर दिखाया ।ʼ
    ʻअरे कुछ फूटेगा भी या यूँ ही पहेलियां बुझाता रहेगा ।ʼ प्रधानमंत्री लकड़बग्घा की बेचैनी सतह पर आ जाती है ।
    ʻ महाराज, गुरुकुल और आश्रम गुलजार हो उठे हैं । गुरुओं का बाना पहन उल्लूगण आपके विकास का ताना–बाना बुनने को पहुँच गये हैं । योग्यता को तो सभी पूछते हैं, परन्तु अयोग्यों की सुध लेकर आपने मिसाल कायम कर दी है । युग–युगांतर तक लोग आपका नाम लेने को विवश होंगे ।ʼ
    ʻपर महाराज !ʼ एक नेता उठ खड़ा होता है और झुकते हुए अपनी बात रखता है,ʻ गुरू के रूप में उल्लू ! क्या इसमें विरोधाभासी विचित्रता नहीं है ʼ
    ʻविचित्रता तो आपमें है नेताजी ।ʼ महाराज सियार लानत भरे स्वर में कहते हैं, ʻनेता होकर आप ताने मारते हैं । निश्चय ही आपकी दूर की दृष्टि बहुत कमजोर है । आप भविष्य में भला क्या और कैसे ताक सकते हैं !ʼ
    ʻमहाराज !ʼ प्रधानमंत्री बीच में घुसते हुए कहते हैं, ʻनिश्चय ही कोई ऊँची सोच आपकी शाही खोपड़ी में हिलोरें मार रही है । क्या दरबार का सौभाग्य इतना भी नहीं कि वह महाराज के मुख–कमल से भविष्य के राज की बात सुन सके ʼ
    अवश्य है प्रधानमंत्री जी । उल्लू को दिन में उचित–अनुचित कुछ भी दिखाई नहीं देता । वह हमारे हर इशारे को चोंच उठाकर स्वीकार करता है । रात में उसे दिखता भी है तो बाकी जानवर तो उस समय नींद में ही होते हैं । उल्लू अपने शिष्यों को अपना ही गुण प्रदान कर सकता है । अगर हमें अपना भविष्य–निर्माण करना है, तो हमें उल्लुओं की सख्त जरूरत है । सोचने समझने वाले जानवर हमारे भविष्य के सपने को पलीता लगा सकते हैं ।ʼ
    ʻपर हुजूर, हंस में क्या बुराई है वह गुरू के लिए अर्ह सारी योग्यताएं रखता है ।ʼ एक और नेता एक और प्रश्नवाचक चिह्न को दरबार में ला खड़ा करता है ।
    ‘बुराई न केवल हंस में है, बल्कि आप में भी है नेताजी । यह बुराई आप में न होती, तो शायद आज आप मंत्री पद का सुख लूट रहे होते ।ʼ महाराज सियार की क्रोधाग्नि भड़क उठती है । वे ऊँची आवाज में कहते हैं, ‘हंस की बुराई सुनना चाहते हैं, तो सुनिए । हंस नीर–क्षीर विवेकी होता है । वह पानी और दूध को अलग कर देता है, जबकि हमारा सत्ता का धंधा दूध में पानी, बल्कि पानी में दूध की मिलावट पर टिका हुआ है ।ʼ
    ‘वाह हुजूर वाह, आपने तो सत्ता का दर्शन ही निचोड़ कर रख दिया ।ʼ प्रधानमंत्री के मुँह से बेसाख्ता निकल पड़ता है । वे आगे कहते हैं, ‘हंस सतयुग के हो सकता है गुरू रहे होंगे, पर कलयुग के गुरू तो उल्लू ही होंगे ।ʼ

    महाराज सियार प्रसन्न मुद्रा में सिर हिलाते हैं । खबरी खरगोश अपने मिशन पर निकलता है ।

मंगलवार, 12 जनवरी 2016

मुस्कुराइए कि आप विकसित हो गए

              
   अहा, ग्राम-जीवन भी क्या है !-लिखने वाले कवि की याद स्मृतियों के मुंडेर पर आ बैठी । मन में एक हलचल-सी हुई, जैसे स्थिर तालाब में कोई पत्थर जा गिरा हो । शहरी जीवन की रोज की लगभग एक-सी आपाधापी में एक अजीब-सी स्थिरता आ गई है । नदी-सा बहता ग्राम्य-जीवन की तलाश में मैं निकल पड़ा । तलाश इसलिए कि कुछ लोगों ने बताया कि नदी-सा बहता ग्राम्य-जीवन अब कहाँ है । वहाँ तो जीवन के अस्तित्व पर ही संकट आन पड़ा है ।
   सिर मुंडाते ही ओले पड़े । यहाँ तो घर से निकलते ही जाम के संग्राम में फँस गया । लगा, जैसे शहर मुझे नहीं छोड़ना चाहता । तभी मेरी नजर आज के अखबार पर पड़ी । छ: पृष्ठों का सरकारी विज्ञापन तैनात था । वह बड़ी मुस्तैदी व गर्व से विकास की गाथा बयान कर रहा था । ये चौड़े-चमचमाते-शानदार राजपथ...गाड़ियाँ बस भागती चली जा रहीं हैं । दस घंटे का सफर बस तीन घंटे में । सुखद ! मुझे तीन घंटे का सफर पूरा करने में दस घंटे लग गए । पर उस अखबारी विज्ञापन की सत्यता...
   गाँव पहुँचते-पहुँचते रात के ग्यारह बज गए । नेताओं की तरह रथयात्रा तो नसीब नहीं हुई, पर पगयात्रा का सुख जरूर नसीब हुआ । यहाँ यह बता दें कि यह नेताओं वाली पगयात्रा भी नहीं थी, क्योंकि उसमें उनके चमचे साथ होते हैं । आश्चर्य ! मेरे भी आगे-पीछे अचानक चार-पाँच लोग चलने लगे । गर्व के वशीभूत होकर मैं अभी कुछ बोलता कि उन लोगों ने मेरी बोलती बंद कर दी । भुशुण्डगुटिका के सहारे मेरे सारे सामान अपने बना लिए । उनके जाते-जाते मैंने पूछा-पराया माल अपना करने वाले भाईसाहबों, सरकार इतना रोजगार बाँट रही है, फिर भी आप रात को कष्ट उठाते हैं ? जवाब तो कुछ न मिला, किन्तु उनकी फिस्स-सी हँसी बहुत कुछ कह गई । विज्ञापनों के दावे और रात का यह सच...   
   देश के बाबा यदा-कदा किसानों के घर धमक जाते हैं, ताकि उनके घर रोटियाँ खाकर देश का भला कर सकें । मैं भी उनका अनुसरण करता अपने किसान मित्र के यहाँ पहुँचा । अपना जानकर रोटी की जगह खरी-खोटी सुना दी उसने । उसके हाथों में सूखा राहत का तीस रूपये का चेक था । इधर अखबार में बड़े सरकारी दावे का केक था । किसी तरह दो रोटी खाकर लेट गया । अखबार में गाँवों में सोलह घंटे बिजली की चकाचौंध फैली हुई थी, पर यहाँ सोलह घंटे से गायब थी । मच्छर मुझ पर टूट पड़े । मुझ आयातित चीज के खून का स्वाद लेने के लिए उनमें जबर्दस्त मारामारी थी ।

   रात्रि-जागरण के बाद मैं वापस अपनी राह पर था । शहर का जाम तैयार बैठा था मेरी अगवानी को । मेरे हाथ में वह अखबार अब भी मौजूद था । मुझे लगा, विकास दो तरीके से होता है । एक धरातल पर और दूसरा अखबार में । अखबार में विकास पसरा पड़ा है । नासमझ मैं ही हूँ कि उसे धरातल पर खोज रहा हूँ । मुझे मुस्कुराना चाहिए कि अखबार में विकास की रफ्तार बढ़ गई है ।

शुक्रवार, 8 जनवरी 2016

सूट-बूट में किसान

                          

   एक मुख्यमंत्री की इच्छा है कि किसान और कुछ पहनें या न पहनें, पर सूट-बूट जरूर पहनें । किसानों के सूट-बूट पहनने से सबसे पहला संदेश दुनिया भर में यह जाएगा कि यहाँ के किसान रातों-रात विकसित हो गए । दूसरा लाभ होगा यह कि सरकार को इनके लिए कुछ करना नहीं पड़ेगा । तीसरा फायदा यह होगा कि इनको दी जाने वाली सब्सिडी की धनराशि जी-खोलकर अपने पारिवारिक महोत्सवों में खर्च की जा सकेगी । ऊपर से बोनस का मजा यह होगा कि नैतिकता के गिरेबान में हाथ डालने की कोशिश कोई भी विरोधी नहीं कर सकेगा । एक फायदा और होगा कि किसानों की मृत्यु के लिए अब सीधे भगवान जिम्मेदार होंगे, सरकार नहीं ।
   अब सवाल है कि किसान सूट-बूट कैसे पहनेंगे । पहला विकल्प है कि जिस तरह सरकार बहुत कुछ यूँ ही हुआ मान लेती है, उसी तरह यह भी मान ले कि किसान अब फटेहाल नहीं रहे, बल्कि सूट-बूट धारी हो गए हैं । न्यायपालिका भी इस पर मुहर लगा देगी, क्योंकि वह अक्सर सरकार की आँखों से ही देखती है । वह पूछती है कि सरकार बताए कि अमुक चीज हुई है या नहीं । सरकार बोल देती है । उसने कब अपने खिलाफ बोला है ?
   दूसरा विकल्प यह है कि किसान जिस तरह खाद-बीज-पानी के लिए कर्ज लेता है, उसी तरह सूट-बूट के लिए भी कर्ज ले । कर्ज का भुगतान न करने की स्थिति में उसे मरने का विकल्प अनिवार्य रूप से चुनना ही है । ऐसे में अगर वह सूट-बूट के लिए कर्ज ले ले, तो कौन सी आफत आ जाएगी । कर्ज में डूबकर तो वह मरता ही है, थोड़ा और डूबकर मरेगा । पर इस बार उसका मरना अधिक गौरवपूर्ण और सुकून देने वाली होगी । सूट-बूट में मरकर वह न केवल स्वयं के जीवन को राहत प्रदान करेगा, बल्कि सरकार की साख के सेंसेक्स को जबर्दस्त उछाल भी इनायत करेगा ।
   हमारे जैसे लोकतंत्र में एक विकल्प और मौजूद है । हमारा मतदाता इतना जागरूक है कि किसी भी नेता के बहकावे में आकर मुफ्त में वोट नहीं देता । वह साड़ी, धोती, पैसा और न जाने क्या-क्या उपहार लेता है । मुख्यमंत्री को चाहिए कि वह अगले चुनाव के मुहूर्त्त पर किसानों को सूट-बूट का उपहार दें, ताकि चुनाव बाद नई सरकार का तोहफा वे नेताजी को उनके जन्मदिन के उपलक्ष्य में दे सकें ।

   लगता है कि किसानों के अच्छे दिन अब आने ही वाले हैं ।

मंगलवार, 5 जनवरी 2016

बाबा का महल

                                           

   साधो, रेत का महल बनाना कोई आसान काम नहीं है । इसके बावजूद रेत का महल बनाने वाले को लोग विवेकहीन मानते हैं । उनकी नजर में यह काम वही कर सकता है, जिसके दिमाग में रेत ही रेत हो...एक पूरा विस्तार हो वहाँ समंदर के किनारे का । मगर कोई यह क्यों नहीं सोचता कि इस वंडर को सृजित करने वाला व्यक्ति पक्का वंडरफुल होगा । अपने देश के बाबा एक रेत का महल बनाना चाहते हैं । उनके विवेक पर उंगली उठाने से पहले किसी को अपने विवेक की एक्स-रे करानी होगी । मैं ऐसा खतरा मोल नहीं ले सकता था । उनसे मुलाकात होते ही पूछा-क्या बहुत जरूरी हो गया था रेत का महल बनाना ? छूटते ही जवाब मिला-जरूरी !...अजी, बहुत जरूरी हो गया था । पूर्वजों का बनाया महल अब ध्वस्त हो चुका है । एकाध खंभे ही बचे हैं गिरने को ।
   परंतु रेत का महल ही क्यों ?-मैंने पूछा । उन्होंने फिर तत्परता से जनाब दिया-ईंट और पत्थर का महल तो कोई भी बना सकता है । मैं कुछ हटके काम करना चाहता हूँ । अत: रेत का महल ही मुझे सबसे मुफीद लगा ।
   रेत का महल बनाने के लिए सबसे पहले क्या करना चाहिए ?-मैंने आगे पूछा । इसके लिए एक ऐसी योजना बनानी चाहिए, जिसमें मूर्खता के लिए कहीं-कोई जगह न हो ।
   एक मूर्खतापूर्ण काम के लिए फूल-प्रूफ योजना ! मैं पूछना चाहता था, मगर बाबा से पूछने की हिम्मत न हुई । मैं पहले ही कह चुका हूँ कि उनके विवेक पर शक नहीं किया जा सकता । उन्होंने खुद ही बात आगे बढाई-आपको याद होगा, चुनाव बाद अचानक मेरे विदेश-भ्रमण पर खूब हो-हल्ला मचा था । उसके बाद भी मैं कई बार विदेश गया । काफी परिश्रम के बाद इस योजना की आइडिया मेरे दिमाग में कौंधी...ठीक आसमानी बिजली की तरह ।
   महल के निर्माण के लिए तकनीक का जुगाड़ कहाँ से किया है आपने...क्या कोई देशी तकनीक... ?-मैंने पूछा । अभी हमारे इतने बुरे दिन भी नहीं आए कि देशी जुगाड़ पर चलना पड़े । गारंटीड विदेशी तकनीक है हमारे साथ-वे तनिक आहत होकर बोले ।
   निर्माण-सामग्री के बारे में कुछ बताइए । मेरे यह पूछने पर वे मुस्कराए । थोड़ी देर बाद एक निपुण वास्तुकार की तरह बोले-रेत का महल बनाने के लिए कल्पनाशीलता का सीमेंट जरूरी है । कल्पना की उड़ान जितनी ऊँची होगी, यह सीमेंट उतना ही उम्दा किस्म का होगा । दूसरी आवश्यक सामग्री झूठ है । कुछ सच्चे टाइप के झूठ और उनकी धुँआधार आवृत्ति इस महल के लिए ईंट के समान हैं ।

   और लोहा... ?-मेरा आखिरी प्रश्न था । उन्होंने मुझे अजीब नजरों से निहारा और गम्भीर स्वर में प्रतिप्रश्न किया-रेत के महल को लोहे की क्या दरकार...?

शुक्रवार, 1 जनवरी 2016

हम न मरब, मरिहें बेचारा

                    
   पुराने साल की बैलगाड़ी अतीत की पगडंडियों पर बढ़ चली है । नया साल बुलेट ट्रेन पर सवार होकर राजपथ की तलाश करता चला आ रहा है । लोगों ने आशाओं और इच्छाओं की गठरियाँ बैलगाड़ी से उतारकर बुलेट ट्रेन पर लाद दिया है । निराशाओं-हताशाओं-नाउम्मीदियों की गठरियाँ बैलगाड़ी पर ही छूट गई हैं । कुछ ने ऐसा अपने अन्तर की आवाज सुनकर किया है, तो कुछ ने देखा-देखी । बहुत से लोग दूसरों को देखकर ही काम करने के अभ्यस्त होते हैं । अन्य लोगों से पीछे न रहने का सवाल जो ठहरा !
   हमारे देश में मान्यताओं की कमी नहीं है । एक मान्यता है कि साल की अगवानी-बेला में जो हासिल, उपलब्ध या प्राप्त होता है, वह साल भर अपने उपलब्ध और सुलभ रहने की गारंटी देता है । योगी भले आज कुछ निष्क्रिय हो जाएं, पर भोगी भोग के सारे संसाधन अवश्य जुटाता है और उनका भोग करने के लिए मानवीय मर्यादाओं को तोड़ता तथा दानवीयता के किसी भी हद तक जाता है । सुरा सुर लगाती है, तो मुर्गों की शामत आती है । बाबू आज अपने बाप से भी रिश्वत के रूप में पैसे ऐंठता है, ताकि पूरा साल रिश्वतमय बना रहे । लड़की छेड़ने के फील्ड में आने के नव-इच्छुक इस पावन बेला में छेड़ने की शुरुआत करते हैं, ताकि आगामी समय पुलिस के डंडों से निरापद व महफूज रहे । शिव सैनिक प्रेमियों को सूँघते फिरते हैं-उनकी कुटाई के लिए, ताकि साल भर में कूटने के अच्छे रिकॉर्ड बन सकें ।
   आज सभी अपनी इच्छाओं और आशाओं का मानसिक संकीर्तन करते हैं । इच्छाएं दो श्रेणियों में आती हैं । एक उचित, दूसरी अनुचित । अनुचित किस्म की इच्छा कभी पूरी न हो, इसके लिए लोगों को मिलकर नए साल पर दबाव बनाना होगा । आईएस इच्छा करे कि नए साल में पूरी दुनिया उसके अधीन आ जाए । साल और समय का क्या है ! वे किसी के सगे नहीं होते । हमें ही देखना होगा कि साल वैसा न कर पाए । दुनिया हर तरह की गंदगी और प्रदूषणों से मुक्त हो, ऐसी उचित इच्छा केवल गठरी बनकर न रह जाए साल की पीठ पर । गधा ढोता जरूर है, पर साफ नहीं करता ।
   योग्य बेरोजगार लोग नौकरियों की तलाश अंध गुफाओं में करते हैं । नया साल एक बार फिर अंगूठा दिखाएगा । अक्षम और अयोग्य सरकारें अयोग्य लोगों को ही काम देती हैं । सरकार की कृपा-प्राप्त अयोग्य  आदमी कुत्तों से भी बढ़कर स्वामिभक्त होते हैं । वे सरकार के समक्ष न केवल पूँछ हिलाते हैं, वरन वक्त आने पर आक्रामकता भी दिखाते हैं । अत: नए साल पर अयोग्य लोगों की इच्छाओं की गठरियाँ खुलेंगी । यकीन न हो, तो उत्तर प्रदेश सरकार का तमाशा कब काम आएगा !

   कुछ भी हो, मगर आशा तो आशा ही है, जो मृतप्राय होकर भी नए साल पर जीवित खड़ी हो जाती है । यह तो आम आदमी है, जो बेचारा बना रहता है । नया साल भी उसका हर क्षण मरना नहीं रोक पाता ।   
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